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भाई बहन पठन समय: 9 मिनट पढ़ा गया: 777 बार

एक भाई की वासना -2

जूजाजी

08 Apr 2018 को प्रकाशित

एक भाई की वासना -2
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सम्पादक – जूजा जीहजरात आपने अभी तक पढ़ा..शहर में आने के बाद फैजान ने उसे खूब शहर की सैर करवाई। हम लोग फैजान की बाइक पर बैठ कर घूमने जाते.. मैं फैजान के पीछे बैठ जाती और मेरे पीछे जाहिरा बैठती थी।हम लोग खूब शहर की सैर करते.. और जाहिरा भी खूब एंजाय करती थी।

बाइक पर बैठे-बैठे मैं अपनी चूचियों को फैजान की बैक पर दबा देती और उसके कान में ख़ुसर-फुसर करती जाती- क्यूँ फिर फील हो रही हैं ना मेरी चूचियां तुमको?मेरी कमर पर फैजान भी जानबूझ कर अपनी कमर से थोड़ा-थोड़ा हरकत देता और मेरी चूचियों को रगड़ देता। कभी मैं उसकी जाँघों पर हाथ रख कर मौका मिलते ही उसकी पैन्ट के ऊपर से ही उसके लण्ड को सहला देती थी.. जिससे फैजान को बहुत मज़ा आता था।

हमारी इन शरारतों से बाइक पर पीछे बैठे हुई जाहिरा बिल्कुल बेख़बर रहती थी।

फैजान अपनी बहन से बहुत ही प्यार करता था.. आख़िर वो उसकी सबसे छोटी बहन थी ना.. कम से कम भी उससे 18 साल छोटी थी.. और वो मुझसे 10 साल छोटी थी।

रोज़ाना फैजान खुद ऑफिस जाते हुए जाहिरा को कॉलेज छोड़ कर जाता और वापसी पर साथ ही लेता आता था। मुझे भी कभी भी इस सबसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी। जैसा कि ननद-भाभी में घरों में झगड़ा होता है.. मेरे और जाहिरा कि बीच में ऐसा कभी भी नहीं हुआ था.. बल्कि मुझे तो वो अपनी ही छोटी बहन लगती थी।अब आगे लुत्फ़ लें..

फिर एक दिन वो वाकिया हुआ जो इस कहानी के आगे बढ़ने की वजह बना, उससे पहले ना कुछ ऐसा-वैसा हुआ हमारे घर में, और ना ही किसी के दिमाग में था.. लेकिन उस वाकिये के बाद मेरा दिमाग एक अजीब ही रास्ते पर चल पड़ा और मैंने वो सब करवा प्रिया जो कि कभी नहीं होना चाहिए था।

वो इतवार का दिन था और हम सब लोग घर पर ही थे। दोपहर के वक़्त हम सब लोग टीवी लाउंज में ही बैठे हुए टीवी देख रहे थे कि फैजान ने चाय की फरमाइश की.. इससे पहले कि मैं उठती.. हस्ब ए आदत.. जाहिरा फ़ौरन ही उठी और बोली- भाभी आप बैठो.. मैं बना कर लाती हूँ।

मैंने उसे ‘थैंक्स’ बोला और दोबारा टीवी देखने लगी, फैजान भी मेरा पास ही बैठा हुआ था।

अचानक ही रसोई से जाहिरा की एक चीख की आवाज़ सुनाई दी और साथ ही उसके गिरने की आवाज़ आई। मैं और फैजान दोनों ही फ़ौरन ही उठ कर रसोई की तरफ चिल्लाते हुए भागे।‘क्या हुआ है जाहिरा?’

जैसे ही हम लोग अन्दर गए तो देखा कि जाहिरा नीचे रसोई कि फर्श पर गिरी हुई है और अपने पैर को पकड़ कर दबा रही है और वो दर्द के मारे कराह रही थी।

हम फ़ौरन ही उसके पास बैठ गए और मैं बोली- क्या हुआ जाहिरा.. कैसे गिर गई?जाहिरा- बस भाभी.. पता ही नहीं चला कि कैसे मेरा पैर मेरी पायेंचे में फँस गया और मैं नीचे गिर पड़ी।फैजान- अरे यह तो शुक्र है कि अभी इसने चाय नहीं उठाई हुई थी.. नहीं तो गर्म-गर्म चाय ऊपर गिर कर और भी नुक़सान कर सकती थी।

मैंने आहिस्ता-आहिस्ता जाहिरा को पकड़ कर उठाना चाहा.. उसका दूसरा बाज़ू फैजान ने पकड़ा और हमने जाहिरा को खड़ा किया.. तो वो अपना बायाँ पैर नीचे ज़मीन पर नहीं रख पा रही थी। बड़ी ही मुश्किल से वो अपना एक पैर ऊपर उठा कर मेरी और अपने भैया की सहारे पर लंगड़ाती हुई टीवी लाउंज में पहुँची।इतने से रास्ते में भी वो कराहती रही- भाभी नहीं चला जा रहा है.. बहुत दर्द हो रहा है।

टीवी लाउंज में लाकर हम दोनों ने उसे सोफे पर ही लिटा प्रिया और मैं उसके पास बैठ गई।फैजान- लगता है कि इसके पैर में मोच आ गई है।मैंने जाहिरा को सीधा करके सोफे पर लिटाया और उसके पैर की तरफ आकर उसके पैर को सहलाती हुए बोली- हाँ.. लगता तो ऐसा ही है..मैंने फैजान से कहा- आप जाहिरा के बेडरूम में जाकर मूव तो उठा लायें.. ताकि मैं इसके पैर की थोड़ी सी मालिश कर सकूँ।

मेरी बात सुन कर फैजान फ़ौरन ही कमरे में चला गया और मैं आहिस्ता-आहिस्ता उसके पैर को सहलाती रही। अभी भी जाहिरा दर्द के मारे कराह रही थी।चंद लम्हों के बाद ही फैजान वापिस आया और उसने मूव मुझे दी। मैंने थोड़ी सी ट्यूब से मलहम निकाली और उसे जाहिरा के पैर के ऊपर मलने लगी।

फिर मैंने फैजान से कहा- जरा रसोई में जा कर रबर की बोतल में पानी गरम करके ले आओ.. ताकि थोड़ी सी सिकाई भी की जा सके।फैजान भी अपनी बहन के पैर में मोच आने की वजह से बहुत ही परेशान था। इसलिए फ़ौरन ही रसोई में चला गया।

जाहिरा के पैर के ऊपर मूव लगाने के बाद मैंने उसकी सलवार को थोड़ा ऊपर घुटनों की तरफ से उठाया.. ताकि उसकी टांग के निचले हिस्से पर भी मूव लगा दूँ।जाहिरा ने उस वक़्त एक बहुत ही लूज और खुली पाएचों वाली सलवार पहनी हुई थी और शायद यही वजह थी कि वो रसोई में इसके पाएंचे से उलझ कर गिर गई थी।जैसे ही मैंने जाहिरा की सलवार को उसकी घुटनों तक ऊपर उठाया तो जाहिरा की गोरी-गोरी टाँगें मेरी आंखों के सामने नंगी हो गईं।

उफफ्फ़.. जाहिरा की टाँगें कितनी गोरी और मुलायम थीं.. जैसे ही मैंने उसकी नंगी टाँग को छुआ.. तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैंने मक्खन में हाथ डाल प्रिया हो.. मैं उसकी टांग की मालिश का भूल कर आहिस्ता-आहिस्ता उसकी टाँग को सहलाने लगी।

धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी नंगी टाँग पर फेरने लगी। कभी पहले ऐसा नहीं हुआ था.. लेकिन आज मुझे एक अलग ही मज़ा आ रहा था। मुझे उसकी मखमली टाँग को सहलाने का मौका जो मिल गया था।फिर मैंने अपने ख्यालों को झटका और उसकी टाँग पर मूव लगाने लगी।

थोड़ी ही देर में फैजान गरम पानी की रबर की बोतल ले आया और मेज पर रख दी।

अब वो दूसरी सोफे पर बैठ कर दोबारा से टीवी देखने लगा.. जाहिरा की टाँग पर मूव लगाते हुए अचानक ही मेरी नज़र फैजान की तरफ गई.. तो हैरानी से जैसे मेरी आँखें फट सी गईं। मैंने देखा कि फैजान की नजरें टीवी की बजाय अपनी सग़ी बहन की नंगी टाँगों को देख रही हैं।मुझे इस बात पर बहुत ही हैरत हुई कि फैजान कैसे अपनी छोटी बहन की नंगी टाँग को ऐसे देख सकता है।उसकी आँखों में जो हवस थी.. वो मैं अच्छी तरह से पहचान सकती थी.. आख़िर मैं उसकी बीवी थी।

यह देख कर एक लम्हे के लिए तो मेरे हाथ जाहिरा की टाँग पर रुक से गए.. लेकिन मुझमें हिम्मत ना हुई कि मैं अपने शौहर से नजरें मिलाऊँ या उसको रोकूँ या टोकूँ.. मैंने अपनी नजरें वापिस जाहिरा की टाँग पर जमा दीं और आहिस्ता-आहिस्ता मूव मलने लगी।

जाहिरा को किसी बात का होश नहीं था.. वो तो बस अपनी आँखें बंद किए हुए पड़ी हुई थी। जाहिरा की नंगी गोरी टाँग को सहलाते सहलाते मेरे दिमाग में एक शैतानी ख्याल आया.. कि क्यों ना मैं इसकी टाँग को थोड़ा और एक्सपोज़ करूँ और देखूँ कि तब भी फैजान अपनी बहन की गोरी टाँगों को नंगा देखता रहता है या नहीं..

यही सोच कर मैंने आहिस्ता से जाहिरा की सलवार उसके घुटनों के ऊपर सरका दी.. और अब उसकी खुली पायेंचे वाली सलवार उसके घुटनों से ऊपर आ गई थी.. जिसकी वजह से जाहिरा का घुटना और उसकी जाँघ का थोड़ा सा निचला हिस्सा भी नंगा हो गया था।

मैंने उसके घुटनों पर भी आहिस्ता-आहिस्ता मूव लगानी शुरू कर दी और मसाज करती हुई.. मैंने तिरछी नज़र से अपने शौहर की तरफ देखा.. तो पता चला कि अब भी वो चोर नज़रों से अपनी बहन की नंगी टाँग की ओर देख रहे थे।मैं दिल ही दिल में मुस्करा दी।

कितनी अजीब बात थी कि एक भाई भी अपनी सग़ी छोटी बहन की नंगी टाँग को ऐसी प्यासी नज़रों से देख रहा था.. जैसे कि वो उसकी बहन ना हो.. बल्कि कोई गैर लड़की हो!

मुझे इस गंदे खेल में अजीब सा मज़ा आ रहा था और मैं इसलिए इस मसाज को एक्सटेंड करती जा रही थी.. ताकि फैजान ज्यादा से ज्यादा अपनी बहन के जिस्म से अपनी आँखों को सेंक सके।

अब मेरे दिमाग में एक और शैतानी ख्याल आया।

आप सब इस कहानी के बारे में अपने ख्यालात इस कहानी के सम्पादक की ईमेल तक भेज सकते हैं।अभी वाकिया बदस्तूर है।support@mohakkisse.com

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कहानी श्रृंखला (STORY SERIES)

एक भाई की वासना

कुल भाग: 49
भाग 1
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भाग 2
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भाग 3
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भाग 4
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भाग 5
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भाग 6
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भाग 7
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भाग 8
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भाग 9
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भाग 10
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भाग 11
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भाग 12
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भाग 13
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भाग 14
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भाग 15
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भाग 17
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भाग 18
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भाग 19
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भाग 20
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भाग 21
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भाग 22
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भाग 23
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भाग 24
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भाग 25
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भाग 26
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भाग 27
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भाग 28
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भाग 29
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भाग 30
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भाग 31
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भाग 32
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भाग 33
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भाग 34
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भाग 35
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भाग 36
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भाग 37
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भाग 38
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भाग 39
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भाग 40
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भाग 41
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भाग 42
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भाग 43
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भाग 44
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भाग 45
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भाग 46
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भाग 50
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