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Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din – Ep 27

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08 Nov 2020 को प्रकाशित

Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din – Ep 27
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दोनों जवाँ बदन एक दूसरे की कामवासना में झुलस रहे थे। नीतू कुमार के मुंह की लार चूस चूस कर अपने मुंह में लेती रही। कुमार भी अपनी जीभ नीतू के मुंह में डाल कर उसे ऐसे अंदर बाहर करने लगा जैसे वह नीतू के मुंह को अपनी जीभ से चोद रहा हो।

इस तरह काफी देर तक चिपके रहने के बाद नीतू ने काफी मशक्कत कर अपना सर कुमार से अलग किया और बोली, “कुमार! चलो भी! अब तो खुश हो ना? अब बहोत हो गया। अब प्लीज जाओ और आराम करो। मेरी कसम अब और कुछ शरारत की तो!”

कुमार ने कहा, “ठीक है तुमने कसम दी है तो सो जाऊंगा। पर ऐसे नहीं मानूंगा। पहले यह वचन दो की रात को सब सो जाएंगे उसके बाद तुम चुपचाप मेरी बर्थ पर निचे मेरे पास आ जाओगी।”

नीतू ने कुमार को दूर करते हुए कहा, “ठीक है बाबा देखूंगी। पर अब तो छोडो।”

कुमार ने जिद करते हुए कहा, “ना, मैं नहीं छोडूंगा। जब तक तुम मुझे वचन नहीं दोगी।”

नीतू ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, “ठीक है बाबा मैं वचन देती हूँ। अब तुम छोडो ना?”

कुमार ने कहा, “ऐसे नहीं, बोलो क्या वचन देती हो?”

नीतू ने कहा, “रातको जब सब सो जाएंगे, तब मैं चुपचाप निचे उतर कर तुम्हारी बर्थ पर आ जाऊंगी। बस?”

कुमार ने कहा, “पर अगर तुम सो गयी तो?”

नीतू ने अपना सर पटकते हुए कहा, अरे भगवान् यह तो मान ही नहीं रहे! अच्छा बाबा अगर मैं सो गयी तो तुम मुझे आकर उठा देना। अब तो ठीक है?”

कुमार ने धीरे से कहा, “ठीक है जानूं पर भूलना नहीं और अपने वादे से मुकर मत जाना.”

नीतू ने आँख मारकर कहा, “नहीं भूलूंगी और किये हुए वादे से मुकरूंगी भी नहीं। पर अब तुम आराम करो वरना मैं चिल्लाऊंगी, की यह बन्दा मुझे सता रहा है।”

कुमार ने हँसते हुए नीतू का हाथ छोड़ दिया और जैसे डर गए हों ऐसे अपना मुंह कम्बल में छिपा कर एक आँख से नीतू की और देखते हुए बोले, “अरे बाबा, ऐसा मत करना। मैं अब तुम्हें नहीं छेड़ूँगा। बस?”

कुमार की बात सुन नीतू बरबस ही हंसने लगी। अपने दोनों हाथ जोड़कर कुमार को नमस्ते की मुद्रा कर मुस्काती हुई नीतू कुमार के साथ हो रही कामक्रीड़ा के परिणाम रूप अपनी दोनों जाँघों के बिच हुए गीलेपन को महसूस कर रही थी।

काफी समय के बाद अपनी दो जाँघों के बिच चूत में हो रही मीठी मचलन नीतू के मन में कोई अजीब सी अनुभूति पैदा कर रही थी।

नीतू जब अपना घाघरा अपनी जाँघों के उपर तक उठाकर अपनी टाँगों को ऊपर उठा कर अपनी ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ने लगी तो कुमार धीरे से बोला, “अपने आपको सम्हालो! निचे वाला (यानी कुमार) सब कुछ देख रहा है!”

लज्जित नीतू ने अपने पाँव निचे किये। कुमार की हरकतों से परेशान होने पर कुछ भी ना कर पाने के कारण मजबूर, नीतू अपना घाघरा ठीक ठाक करती हुई अपने आपको सम्हाल कर अपनी ऊपर वाली बर्थ पर पहुंची और लम्बे हो कर लेट कर पिछले चंद घंटों में हुए वाक्योँ के बारेमें सोचने लगी।

ट्रैन मंजिल की और तेजी से अग्रसर हो रही थी।

कम्पार्टमेंट में शामके करीब पांच बजे कुछ हलचल शुरू हुई। कुमार के अलावा सब लोग बैठ गए। नीतू ने कुमार के लिए चाय मंगाई। कुछ बिस्किट और चाय पिलाकर नीतू ने कुमार को डॉक्टर की दी हुई कुछ दवाइयाँ दीं। दवाइयाँ खाकर कुमार फिर लेट गए।

कुमार ने कहा की उनका दर्द कुछ कम हो रहा था। डॉक्टर ने टिटेनस का इंजेक्शन पहले ही दे दिया था। नीतू कुमार के पाँव के पास ही बैठी बैठ कुमार को देख रही थी और कभी पानी तो कभी एक बिस्कुट दे देती थी।

अन्धेरा होते ही शामका खाना आ पहुंचा। फिर नीतू ने अपने हाथों से कुमार को बिठा कर खाना खिलाया। सुनीता, ज्योतिजी, कर्नल साहब और सुनील ने भी देखा की नीतू कुमार का बहोत ध्यान रख रही थी।

सब ने खाना खाया और थोड़ी सी गपशप लगाकर ज्यादातर लोग अपने अपने मोबाइल में व्यस्त हो गए। कई यात्रियों ने कान पर ईयरफोन्स लगा अपने सेल फ़ोन में कोई मूवी, या गाना या कोई और चीज़ देखने में ही खो गए।

रात के नौ बजते ही सब अपना अपना बिस्तर बनाने में लग गए। सुबह करीब ६ बजे जम्मू स्टेशन आने वाला था। नीतू ने कुमार को उठाया और उसका बिस्तर झाड़ कर अच्छी तरह से चद्दर और कम्बल बिछा कर कुमार को लेटाया।

कुमार अब धीरे धीरे बैठने लगा था। शामको एक बार नीतू के पति ब्रिगेडियर खन्ना साहब भी आये और कुमार को हेलो, हाय किया। इस बार उन्होंने कुमार के साथ बैठकर कुमार का हाल पूछा और फिर नीतू के गाल पर हलकी सी किस करके वह अपनी बर्थ के लिए वापस चले गए।

कुमार को फिर भी अंदेशा ना हुआ की नीतू ब्रिगेडियर साहब की पत्नी थी। रात का अँधेरा घना हो गया था। काफी यात्री सो चुके थे। एक के बात एक बत्तियां बुझती जा रहीं थीं।

नीतू ने भी जब पर्दा फैलाया तब कुमार ने फिर नीतू का हाथ पकड़ा और अपने करीब खिंच कर कानों में पूछा, “अपना वादा तो याद है ना?”

नीतू ने बिना बोले अपनी मुंडी हिलाकर हामी भरी और मुस्काती हुई अपना घाघरा सम्हालते हुए अपनी ऊपर की बर्थ पर चढ़ गयी।

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सुनीता निचे की बर्थ पर थी और जस्सूजी उसकी ऊपर वाली बर्थ पर। ज्योतिजी निचे वाली बर्थ पर और सुनील उसके ऊपर वाली बर्थ पर।

रात के साढ़े नौ बजे सुनीता ने अपने कम्पार्टमेंट की बत्तियां बुझा दीं। उसे पता था की आजकी रात कुछ ना कुछ तो होगा ही। कोई ना कोई नयी कहानी जरूर बनेगी।

सुनीता को पति को किये हुए वादे की याद आयी। सुनीता को तो अपने पति से किये हुए वादे को पूरा करना था। सुनीलजी अपनी पत्नी से लिए हुए ट्रैन में रात को सुनीता का डिनर करने के वादे को पूरा जरूर करना चाहेंगे।

सुनीलजी की प्रियतमा जस्सूजी की पत्नी ज्योतिजी क्या सुनीता के पति सुनील को रातको अपने आहोश में लेने के लिए नहीं तड़पेगी?

क्या जस्सूजी कुछ ना कुछ हरकत नहीं करेंगे? उधर सुनीता ने चोरी छुपी नीतू और कुमार के बिच की काम वार्ता भी सुनी थी।

उसे पता था की नीतू को रात को निचे की बर्थ में कुमार के पास आना ही था। जरूर उस रात को ट्रैन में कुछ ना कुछ तो होना ही था। क्या होगा उस विचार मात्र के रोमांच से सुनीता के रोंगटे खड़े होगये।

पर सुनीता भी राजपूतानी मानिनी जो थी। उसने अपने रोमांच को शांत करना ही ठीक समझा और बत्ती बुझाकर एक अच्छी औरत की तरह अपने बिस्तर में जा लेटी।

कम्पार्टमेंट में सब कुछ शांत हो चुका था। जरूर प्रेमी प्रेमिकाओं के ह्रदय में कामाग्नि की धधकती आग छुपी हुई थी। पर फिर भी कम्पार्टमेंट में वासना की लपटोँ में जलते हुए बदनों की कामाग्नि भड़के उसके पहले छायी शान्ति की तरह सब कुछ शांत था।

कुछ शोर तब होता था जब दो गाड़ियाँ आमने सामने से गुजरती थीं। वरना वातानुकूलित वातावरण में एक सौम्य सी शान्ति छायी हुई थी।

जब ट्रैन कोई स्टेशन पर रूकती तो कहीं दूर कोई यात्री के चढ़ने उतर ने की धीमी आवाज के सिवाय कहीं किसीके खर्राटे की तो कहीं किसी की हलकी लयमय साँसे सुनाई दे रहीथीं।

सारी बत्तियाँ बुझाने के कारण और सारे परदे से ढके होने के कारण पुरे कम्पार्टमेंट में घना अँधेरा छाया हुआ था। कहीं कुछ नजर नहीं आता था।

एक कोने में टिमटिमाती रात्रि बत्ती कुछ कुछ प्रकाश देने में भी निसहाय सी लग रही थी। कभी कभी कोई स्टेशन गुजरता तब उसका प्रकाश परदे में रह गयी पतली सी दरार में से मुश्किल ही अँधेरे को हल्का करने में कामयाब होता था।

काम वासना से संलिप्त ह्रदय बाकी यात्रियों को गहरी नींद में खो जाने की जैसे प्रतीक्षा कर रहे थे। बिच बिच में नींद का झोका आ जाने के कारण वह कुछ विवश सा महसूस कर रहे थे।

नीतू की आँखों में नींद कहाँ? उसे पता था की उसका प्रियतम कुमार जरूर उसके निचे उतर ने प्रतीक्षा में पागल हो रहा होगा।

आज रात क्या होगा यह सोच कर नीतू के ह्रदय की धड़कन तेज हो रही थीं और साँसे धमनी की तरह चल रहीं थीं। नीतू की जाँघों के बिच उसकी चूत काफी समय से गीली ही हो रही थी।

कुमार काफी चोटिल थे। तो क्या वह फिर भी नीतू को वह प्यार दे पाएंगे जो पानेकी नीतू के मन में ललक भड़क रही थी? पर नीतू कुमार को इतना प्यार करती थी और कुमार की इतनी ऋणी थी की अपनी काम वासना की धधकती आग को वह छुपाकर तब तक रखेगी जब तक कुमार पूरी तरह स्वस्थ ना हो जाएँ। यह वादा नीतू ने अपने आपसे किया था।

उससे भी बड़ा प्रश्न यह था की क्या नीतू को स्वयं निचे उतर कर कुमार के पास जाना चाहिए? चाहे कुमार ने नीतू के लिए कितनी भी कुर्बानी ही क्यों ना दी हो, क्या नीतू को अपना मानिनीपन अक्षत नहीं रखना चाहिए? पुरुष और स्त्री की प्रेम क्रीड़ा में पहल हमेशा पुरुष की ही होनी चाहिए इस मत में नीतू पूरा विश्वास रखती थी।

स्त्रियां हमेशा मानिनी होती हैं और पुरुष को ही अपने घुटने जमीं पर टिका कर स्त्री को रिझाकर मनाना चाहिए जिससे स्त्री अपने बदन समेत अपनी काम वासना अपने प्रियतम पर न्योछावर करे यही संसार का दस्तूर है, यह नीतू मानती थी।

पर नीतू की अपने बदन की आग भी तो इतनी तेज भड़क रही थी की क्या वह मानिनीपन को प्रधानता दे या अपने तन की आग बुझाने को? यह प्रश्न उसे खाये जा रहा था।

क्या कुमार इतने चोटिल होते हुए नीतू को मनाने के लिए बर्थ के निचे उतर कर खड़े हो पाएंगे? नीतू के मन में यह भी एक प्रश्न था। वह करे तो क्या करे? आखिर में नीतू ने यह सोचा की क्यों ना कुमार को उसे मनाना कुछ आसान किया जाए? ताकि कुमार को बर्थ से उठकर नीतू को मनाने के लिए उठना ना पड़े?

यह सोच कर नीतू ने अपनी चद्दर का एक छोर धीरे धीरे सरका कर निचे की और जाने दिया ताकि कुमार उसे खिंच कर उस के संकेत की प्रतीक्षा में जाग रही (पर सोने का ढोंग कर रही) नीतू को जगा सके।

कुछ देर बीत गयी। नीतू बड़ी बेसब्री से इंतजार में थी की कब कुमार उसकी चद्दर खींचे और कब वह अपना सर निचे ले जाकर यह देखने का नाटक करे की क्या हुआ? जिससे कुमार को मौक़ा मिले की वह नीतू को निचे उतर ने का आग्रह करे।

पर शायद कुमार सो चुके थे। नीतू ऊपर बेचैन इंतजार में परेशान थी। काफी कीमती समय बितता जा रहा था।

पढ़ते रहिये, क्योकि यह कहानी आगे जारी रहेगी!

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Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din

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