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कोई मिल गया पठन समय: 11 मिनट पढ़ा गया: 1,103 बार

वासना की न खत्म होती आग-9

सारिका कंवल

16 Dec 2023 को प्रकाशित

वासना की न खत्म होती आग-9
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नमस्ते.. मेरे सभी प्रसंशकों की मैं भारी आभारी हूँ कि आप सभी को मेरी पिछली कहानी काफी पसंद आई।मेरी आगे की कहानी उसी कड़ी से जुड़ी है। मैं अपने उस दोस्त से मिलकर काफी संतुष्ट थी और उनसे उस दिन के बाद भी याहू चैट पर बातें चलती रहीं।

हमारे मिलन को एक हफ़्ता गुजर चुका था.. और तारा भी वापस चली गई थी।

हम दोनों यूँ ही चैटिंग के जरिए अपने मन की मंशा शब्दों के जरिए एक-दूसरे को बताते रहे।

करीब दो महीने बीतने के बाद उन्होंने फिर से मिलने की जिद शुरू कर दी.. पर मेरे लिए ये मुमकिन नहीं था। फिलहाल तारा जा चुकी थी और मैं कोई बहाना नहीं बना सकती थी.. क्योंकि मुझे किसी और पर भरोसा नहीं था।

वो रोज मुझसे मिलने की बात करते.. पर मैं हमेशा बस कुछ बहाना बना कर टाल देती या उनको दिलासा देती ‘मौका निकाल कर मिलूंगी।’

फिर एक दिन उन्होंने मुझे एक उपाय बताया। शुरू में तो मुझे बड़ा अटपटा सा लगा.. फिर सोचा कि चलो इसी बहाने कुछ नया अनुभव होगा।

उनके कुछ दोस्त एक व्यस्क दोस्तों को खोजने की साईट पर थे.. पहले तो उन्होंने मुझे एक दम्पति से वहाँ मिलवाया। फिर एक लड़की जो जबलपुर की थी उससे मिलवाया।मैं उनसे बातें करने लगी और कुछ ही दिनों में दोस्ती भी हो गई पर अब भी मुझे भरोसा नहीं हो रहा था.. क्योंकि मैंने किसी को देखा नहीं था।

फिर एक दिन मेरे फ़ोन पर एक सन्देश आया कि अगर मैं मिलना चाहती हूँ तो वो लोग हजारीबाग आ जाएंगे।मैंने सन्देश से पूछा- कौन?तो जवाब आया- मेरा नाम शालू है, मैं आपसे मिलने के लिए आपको घर से ले सकती हूँ।

शालू और वे दम्पति एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

मैं पहले तो सकपका गई कि ये क्या हो रहा है.. क्योंकि मैं किसी मुसीबत में नहीं पड़ना चाहती थी।मैं रात का इंतज़ार करने लगी ताकि मैं उस दोस्त से बात करके सब सच जान सकूँ।

रात के करीब 12 बजे हमारी बात शुरू हुई। मैंने सबसे पहले वही पूछा.. तब उन्होंने बताया- आपका नंबर शालू को मैंने ही प्रिया था।मैं थोड़ा विचलित हो गई।

उन्होंने कहा- अगर आपकी राजी हों.. तो हम लोग आपसे आपके घर पर शालू को आपकी सहेली बना कर भेज सकते हैं, वो आपको बाहर ले जा सकती है।

मुझे पहले तो अटपटा सा लगा.. मैंने इंकार कर प्रिया.. क्योंकि इसमें बहुत खतरा था। वो मेरे बारे में आखिर जानती क्या थी.. जो मुझे यहाँ से निकाल कर ले जाती.. मेरे पति को क्या जवाब देती अगर वे कोई सवाल करते तो?

मैंने साफ़ मना कर प्रिया.. पर वे लोग मुझे रोज जोर देने लगे। कभी कभी उनकी मादक इच्छाओं को देख मेरा भी मन होने लगता.. पर मुझे बहुत डर लगता।

कुछ दिनों के बाद उस लड़की शालू का फिर से सन्देश आया और वो मुझे याहू पर बात समझाने लगी.. अपनी तरकीब बताने लगी।फिर उस दम्पति ने भी मुझे अपनी बातों में उलझाने का प्रयास शुरू कर प्रिया, वो लोग मुझे रोज कहने लगे कि मैं बस अपनी मर्ज़ी ‘हाँ’ बता दूँ.. बाकी वो लोग तरकीब निकाल लेंगे।

तभी मेरी जेठानी के पिता के मरने की खबर आई और वो लोग सपरिवार चले गए। अब घर में बस मैं.. मेरे बच्चे और देवर थे।मुझे लगा कि ये सही मौका है मेरे लिए और मैंने ‘हाँ’ कह प्रिया।

उन्होंने अपनी सारी तरकीब मुझे बता दी और मैंने भी अपनी सारी बातें बता दीं ताकि कोई सवाल करे.. तो वो लोग सही जवाब दे सकें।उन्होंने दो दिन के बाद मुझे सन्देश भेजा कि वो लोग हजारीबाग में हैं और अगले दिन मेरे घर मुझे लेने वो दो औरतें आएँगी।

मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा कि भगवान जाने क्या होगा।

मैंने वासना की आग में भूल कर ये क्या कर प्रिया। कहीं किसी को शक हुआ तो क्या होगा।कहीं मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं जाएगी.. बस यही सभी बातें सोचती हुई.. मैं रात भर सोई नहीं।

सुबह करीब 4 बजे मेरी आँख लगी और रोज की आदत होने के वजह से 6 बजे उठ गई। मेरे दिमाग में बस उनकी ही बातें थीं।मैंने अब सोच लिया कि मैं उन्हें मना कर दूँगी।

करीब 9 बजे उनका फ़ोन आया.. तब मैंने पहली बार उस जबलपुर वाली लड़की से बात की।उसने मुझसे कहा- मैं और एक और औरत तुम्हें लेने आ रही हैं.. तुम तैयार रहना।

मैंने तुरंत जवाब प्रिया- मत आओ मुझे डर लग रहा है.. कहीं मेरी चोरी पकड़ी न जाए।पर उन्होंने मुझे बहुत भरोसा प्रिया कि कुछ नहीं होगा.. वो सब कुछ संभाल लेंगी।

मैंने उनको बहुत समझाया.. पर वो नहीं मानी। तब मैंने तुरंत जा कर अपनी देवरानी को बताया- मुझसे मिलने मेरी दो सहेलियां आ रही हैं। हो सकता है कि मैं उनके साथ थोड़ा घूमने और बाज़ार करने शहर जाऊं.. क्या तुम चलोगी मेरे साथ?

मैं जानती थी कि बच्चों की वजह से वो बाहर नहीं जा सकती और घर पर वो अकेली भी है.. पर उसे शक न हो इसलिए मैंने उससे जानबूझ कर साथ चलने के लिए कहा था।

उसने कहा- दीदी अगर मैं भी चली जाउंगी.. तो घर पर कौन रहेगा और बच्चों को अकेला कौन देखेगा और आपके देवर भी काम पर चले जायेंगे।ये कह कर उसने मुझसे कहा- आप अकेली चली जाओ।मैंने कहा- जरूरी नहीं कि मैं जाऊं ही.. मैंने इसलिए कहा कि हो सकता है वो मुझे साथ चलने के लिए कहें।

इतना कह कर मैं अपने देवर के पास गई और सारी बातें बता दीं।

देवर ने कहा- भाभी घर पर बड़े भैया और भाभी नहीं हैं.. सो मैं कुछ नहीं कह सकता.. पर अगर जाओ तो शाम तक लौट आना।

मैंने भी ज्यादा जोखिम न उठाते हुए तुरंत जेठानी को फ़ोन कर सारी बातें बता दीं.. तो उन्होंने शायद अपने घर की हालत देखते हुए ज्यादा बात नहीं की और इजाजत दे दी।

ये सारी बातें मेरे लिए कुछ राहत भरी थीं.. और अब मैं बस उनका इंतज़ार करने लगी।

करीब 20 मिनट के बाद मेरा फ़ोन बजा.. तो देखा कि शालू का फ़ोन था।

मैंने फ़ोन उठाया तो उसने कहा- मैं आपके घर के पास ही हूँ.. मुझे अपने घर का रास्ता बताओ।मैंने उससे पूछा- फ़िलहाल कहाँ हो?

मेरी मंशा थी कि मैं खुद जाकर उससे पहले बाहर मिल लूँ।मैं उसके बताई हुई जगह पर जाने के लिए निकली और मैंने देवर से कहा- मेरी सहेलियाँ बाहर खड़ी हैं.. मैं उन्हें लेकर आती हूँ।

मैं उनके बताई जगह पर गई तो देखा एक कार खड़ी थी और कार से बाहर एक लड़की सलवार सूट में खड़ी थी.. शायद मुझे ढूँढ रही थी।

उसने मुझे देखते ही मेरा नाम लेकर मुझे पुकारा.. तो मैंने भी उसका नाम लिया।फिर हम एक-दूसरे को पहचान गए।

मैं उनकी कार के पास गई तो अन्दर से एक और औरत जो बिल्कुल मेरी ही उम्र की थी.. बाहर आई और मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा- बहुत सुना तुम्हारे बारे में।

मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था.. फिर भी अपने दिल की धड़कनों को काबू में करती हुई मैंने उन्हें घर आने को कहा।रास्ते में वो मुझे कहती आईं कि मैं बिल्कुल न डरूं.. बाकी वो लोग सब संभाल लेंगे।

उन्होंने मुझे अपना परिचय दे प्रिया। एक शालू थी.. जो करीब 32 साल की थी.. पर शादीशुदा नहीं थी। दूसरी बबीता थी.. जिसके 2 बच्चे हैं और वो दिल्ली में रहती है।

वो लोग यहाँ अपनी एक रिश्तेदार की शादी में आई हुई थीं। उन्होंने पूरी कहानी गढ़ दी थी.. बस मुझे उस पर थोड़ा एक्टिंग करना था।

कार के ड्राईवर को वहीं गाड़ी में रहने प्रिया और मैं उन्हें लेकर घर आ गई। बच्चे तो अब तक स्कूल चले गए थे और देवर बस निकलने ही वाले थे।

देवर के जाते-जाते मैंने उन्हें मिलवा प्रिया और कहा- ये लोग मुझे साथ शहर चलने को कह रही हैं।

मेरे कहने के साथ ही वो दोनों मेरे देवर से विनती करने लगीं कि मुझे जाने दें.. शाम होने से पहले मुझे वापस छोड़ देंगे।इस पर देवर ने ‘हाँ’ कह प्रिया और चले गए।

मैंने उन्हें बिठाया.. चाय नाश्ता प्रिया। फिर मैंने देवरानी को उनके सामने बातचीत करने को बिठा प्रिया और मैं अपने कमरे में तैयार होने चली गई।

मैं करीब 20 मिनट के बाद बाहर आई तो देखा कि वो लोग मेरी देवरानी से काफी घुल-मिल गई हैं.. मुझे और भी डर लगने लगा कि कहीं उन्होंने मेरा राज़ तो नहीं खोल प्रिया।मैं उनसे बोली- चलें?तो उन्होंने तुरंत उठ कर चलने की तैयारी कर ली।

मेरी देवरानी से विदाई लेकर वो लोग मुझे अपने साथ ले कर कार में बैठ गए।

मैं जितना डर रही थी उतनी ही आसानी से सब कुछ हो गया। रास्ते में मुझे बबीता ने बताया कि वो अपने पति के साथ आई हुई है।

हम यूँ ही बस एक-दूसरे से जान-पहचान करते हुए शहर पहुँच गए और ड्राईवर ने एक बड़े से होटल के सामने कार खड़ी कर दी।हम कार से निकले और ड्राईवर कार लेकर वहाँ से चला गया।

हम होटल में गए और लिफ्ट से पांचवें माले पर गए, फिर हम तीनों वहाँ से एक कमरे की ओर बढ़े।तब मैंने पूछा- मेरे वो दोस्त और बबीता का पति कहाँ है?इस पर शालू और बबीता हँसते हुए बोलीं- कमरे में चलो.. सब देख लेना खुद से।

शालू ने अपने बैग से कमरे की चाभी निकाली और दरवाजा खोला। उन्होंने अन्दर जाते हुए मुझे भी अन्दर आने को कहा और फिर दरवाजा अन्दर से बंद कर प्रिया।

कमरा क्या शानदार था.. चारों तरफ परदे और साज-सजावट थी.. जैसे कि किसी फिल्म में होता है। सामने सोफा और टेबल था और शायद बेडरूम अन्दर था।

मैं सोफे की तरफ बढ़ी.. पर वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था। थोड़ा और आ गए गई.. तो हल्की आवाज मेरे कानों में पड़ी.. जैसे कोई औरत कराह रही हो।

मुझे एक पल के लिए तो ऐसा लगा कि शायद मेरे कान बज रहे हैं क्योंकि वासना का ही तो खेल खेलने मैं इनके साथ आई थी।

तभी एक लड़की के चिल्लाने की तेज़ आवाज आकर शांत हो गई। मैं सपाक से उनकी तरफ देखते हुए पूछने लगी- यहाँ और कौन है?वो दोनों मुस्कुराते हुए मुझे अन्दर चलने को बोलीं और कहा- खुद देख लो।

अन्दर जाते ही जो नज़ारा मैंने देखा उसे देख कर तो मेरे जैसे होश ही उड़ गए।उम्म्ह… अहह… हय… याह…

कहानी जारी रहेगी।support@mohakkisse.com

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पाठकों की राय

1 टिप्पणी

कोमल बलाना

1 month ago

सच में बहुत ही हॉट और उत्तेजक कहानी है भाई। मजा आ गया पढ़कर।

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