मेरी साली की जवान बेटी के चोदन की कामवासना से परिपूर्ण हिंदी पोर्न स्टोरी के पिछले भागस्त्री-मन… एक पहेली-4में आपने पढ़ा कि दिया मेरे घर में मेरे साथ अकेली मेरे बेड पर नग्न वक्ष है.
अचानक ही दिया ने मुझे पीछे हटाया और उठ कर बैठ गयी; अपने दोनों हाथ पीछे कर के ब्रा का हुक खोल कर ब्रा को परे रख प्रिया और अपने दोनों हाथ ऊँचे कर के अपने सर के आवारा बालों को संभाल कर, बालों की चोटी का जूड़ा करने लगी।बाई गॉड! क्या नज़ारा था।
नाज़ुक जिस्म, अधखुली नशीली आँखों के दोनों ओर बालों की एक-एक आवारा लट, हाथों की जुम्बिश के साथ-साथ वस्त्र विहीन, सख़्त और उन्नत दोनों उरोजों की हल्की हल्की थिरकन और तन कर खड़े निप्पल जो उरोजों की हिलोर से साथ-साथ ऐसे हिल रहे थे कि जैसे मुझे चुनौती दे रहे हों.
अधखुले आद्र और गुलाबी होंठों में बालों पर चढ़ाने वाला काला रबर-बैंड और बालों में बिजली की गति से चलती दस लम्बी सुडौल उंगलियाँ।यकीनन मेरी कुंडली में शुक्र बहुत उच्च का रहा होगा तभी तो रति देवी मुझ पर दिल खोल कर मेहरबां थी.
तभी दिया अपने बाल व्यवस्थित करने के उपरान्त मेरी ओर झुकी, उसकी कज़रारी आँखों में शरारत की गहन झलक थी.
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता या कर पाता, दिया बैठे-बैठे आगे को झुकी, अपना बायाँ हाथ मेरे दाएं कंधे पर रखा और झुक कर मेरे बायें स्तनाग्र पर अपनी जीभ लगा दी. क्षण भर बाद ही दिया मेरे बाएं स्तन का निप्पल चूस रही थी.
गहरी उत्तेजना की एक लहर मेरे अंग-अंग को सिहरा गयी. मैं ऐसी कामक्रीड़ा का आदी न था और यह सिनेरिओ मुझे सूट नहीं कर रहा था. कुछ पल तो मैंने ज़ब्त किया लेकिन फिर दिया को दोनों कन्धों से पकड़ कर पीछे हटाया और बहुत कोमलता से वापिस बिस्तर पर लिटा कर दिया की कैपरी का हुक खोला और साथ ही ज़िप नीचे की और अपने दोनों हाथ दिया के कूल्हों के दाएं-बाएं जमा दिये.दिया ने तत्काल इशारा समझा और अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठा दी; मैंने तत्काल और देर ना करते हुए कैपरी को दिया के शरीर से अलग किया.
पाठकगण! आप आँखें बंद कर के जरा अर्चना करें कि बिस्तर पर उस एक पूर्ण जवान और सोलह कला सम्पूर्ण कामविह्ल कामांगी की जो सिर्फ़ एक काले रंग की छोटी सी पैंटी में थी जो बस जैसे तैसे उसकी योनि को अनावृत होने बचाये हुई थी.
मैंने ऊपर से नीचे तक दिया के दिलकश शरीर का गहन अवलोकन किया. दिया के बायें उरोज़ के निचली ओर हल्के से बाहर की ओर, सफेद त्वचा पर शहद के रंग का एक बर्थ-मार्क था, दाएं उरोज़ के निप्पल के बादामी घेरे के बिलकुल ऊपर साथ में सफेद त्वचा पर एक काले रंग का तिल था. एक तिल दोनों उरोजों के बीच की घाटी की तलहटी में छुपा था. दाएं जाँघ के अंदर की ओर ऊपर की ओर दो तिल आजू-बाज़ू थे.
अभी मेरा अवलोकन पूरा भी नहीं हुआ था कि दिया ने जल्दी से मेरा बाज़ू पकड़ कर मुझे अपने ऊपर गिरा लिया और तत्काल अपने दाएं हाथ से मेरे पजामे के ऊपर से ही मेरे गर्म और फौलाद की तरह सख़्त लिंग को अपनी ओर खींचने लगी.
दिया प्रेम की पराकाष्ठा पर जल्दी से पहुँचने के लिए तमाम बंधन तोड़ने पर उतारू थी लेकिन मैं आज के अपने इस अभिसार को सदा-सर्वदा के लिए यादगार बनाने पर कटिबद्ध था. आज का मेरा और दिया का अभिसार बहुत उन्मुक्त किस्म का था.
एक तो दिया अभिसार में मुझ से अधिक से अधिक काम-सुख लेने के लिए, मुझ से मेरी पत्नी की तरह अधिकारपूर्वक व्यवहार कर रही थी, दूसरे… चूंकि आज घर में कोई नहीं था इसलिए अभिसार के दौरान दिया के मुंह से निकलने वाली सिसकियों और सीत्कारों को किसी द्वारा सुन लेने का भय ना होने की वज़ह से दिया का आज बिस्तर में व्यवहार बहुत ही बिंदास था.
मैं दिया के नंगे जिस्म पर पूरा छा गया और धीरे से मैंने दिया के दाएं उतप्त उरोज को अपनी जीभ से छुआ, तत्कार दिया के शरीर में एक झनझनाहट की लहर सी उठी और दिया ने अपने दोनों हाथों से मेरे सर के बाल अपनी मुठियों में कस लिया और खींच कर मुझे अपने तन से साथ लगाने का प्रयत्न करने लगी.
यूं तो मेरा सारा बदन दिया के बदन के साथ ही लगा हुआ था लेकिन मैं जानबूझ कर थोड़ा सा ऑफ़-लाईन था… बोले तो… मेरी दायीं जाँघ दिया की दोनों टांगों के बीच में थी,दिया की दायीं टांग मेरी दोनों टांगों के बीच में कसी हुई थी, दिया की योनि की गर्मी मेरी दायीं जाँघ का बाहर वाला ऊपरी सिरा झुलसाये दिए जा रही थी. मेरा फ़ौलादी लिंग दिया की नाभि की बग़ल में टक्करें मार रहा था.
धीरे धीरे मैंने अपनी जीभ और होंठों को नये आयामों, नयीं ऊंचाइयों तक पहुंचाना शुरू किया. दिया के दाएं वक्ष के शिखर पर बादामी घेरे को जीभ से पहले छूना फिर हल्के हल्के जीभ से चाटना शुरू किया. मैं उस वक्ष के बादामी घेरे पर अपनी जीभ निप्पल को बिना छूए दाएं से बाएं और फिर बाएं से दाएं फ़िरा रहा था और बेचैन दिया अपने एक हाथ से अपना वक्ष पकड़ कर निप्पल मेरे मुंह में देने का बार बार प्रयास कर रही थी लेकिन मैं हर बार साफ़ कन्नी काट जाता था.
अचानक दिया ने मेरे सर के पीछे के बाल अपने बाएं हाथ में कस कर जकड़ लिए और दाएं हाथ से अपना वक्ष पकड़ कर निप्पल बिलकुल मेरे होंठों पर रख प्रिया. जैसे ही मैंने अपने तपते होंठो में दिया के उरोज़ का निप्पल लिया तत्काल ही दिया के मुंह से एक तीखी किलकारी सी निकली और फ़ौरन ही दिया ने अपना दायाँ हाथ नीचे ले जा कर पजामे के ऊपर से ही मेरा लिंग सख्ती से दबोच लिया और उसे आगे-पीछे हिलाने लगी.
मैंने दिया का दायाँ निप्पल अपने मुंह में चुमलाते चुमलाते ज़रा अपने बायीं ओर करवट लेते हुए अपना दायें हाथ नीचे कर के अपने पजामे का नाड़ा खोल कर और पजामा घुटनों तक नीचे सरका कर प्री-कम से सराबोर अपना लिंग दिया के हाथ में थमा प्रिया.
फिर दूसरी से कर लेना-3
तत्काल दिया अपनी उंगलियाँ मेरे लिंग के शिश्नमुंड पर फेरने लगी और मुठी में ले कर अपनी उँगलियों से मेरे लिंग की लम्बाई नापने लगी. इधर मेरे मुंह में अंगूर का दाना और सख्त, और बड़ा होता जा रहा था जिसे जब मैं बीच बीच में हल्के से अपने दाँतों से दबाता था तो न सिर्फ दिया के मुंह से आनन्द भरी सीत्कारें निकलती थी बल्कि मेरे लिंग पर दिया की उंगलियाँ और ज़्यादा कस जाती थी.
मैंने दिया के निप्पल को मुंह से निकला और दिया के वक्ष से ज़रा सा परे उठ बैठा तो दिया को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और तत्काल दिया ने नाराज़गी की सिलवटों भरे माथे सहित मेरी और देखा.मुस्कुरा कर मैंने दिया का बायाँ गाल ज़रा सा थपथपाया अपना पजामा उतार कर साइड में रख प्रिया और अपने दोनों हाथ दिया की पैंटी पर रख दिए.
दिया फ़ौरन मेरी मंशा समझ गयी और उसने मुस्कुराते हुए अपने कूल्हे जरा से ऊपर हवा में उठा दिए. मैंने दिया की आँखों में देखते देखते, अपनी दोनों हथेलियों को दिया के कूल्हों, दिया की दोनों जाँघों पर हल्के से रगड़ते हुये पैंटी को हौले हौले नीचे सरकाना शुरू किया. दिया की पूरी पैंटी प्रिय के योनि स्राव से सनी पड़ी थी.
इस समय दिया बला की हसीन लग रही थी. कामवेग के कारण रह रह कर उसकी आँखें बंद हो रही थी, वो बार बार अपने चेहरे पर हाथ फेर रही थी, उरोज़ों पर हाथ फेर रही थी, रह रह कर अपने होंठों को जीभ से गीला कर रही थी और अपना निचला होंठ बार बार अपने दांतों में कुचल रही थी.
दिया की पैंटी अब घुटनों तक नीचे आ चुकी थी. तभी दिया ने अपनी बायीं टांग को मोड़ा और एकदम से अपने बाएं पैर से अपनी पैंटी छिटक दी और इधर मैंने दिया की दायीं टांग को पैंटी की पकड़ से मुक्त कर प्रिया. अब हम दोनों ही बर्थडे सूट में थे. ना तो कपड़े की एक भी धज़्ज़ी दिया के तन पर थी ना ही मेरे.
मैंने प्यार से दिया को निहारा… कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है? दिया का रति-मंदिर अभी भी छोटा सा ही था बल्कि दिया का शरीर थोड़ा भर जाने की वज़ह से पहले से भी छोटा लग रहा था. एक साफ़-सुथरा छोटा सा, बीच में से फूला सा V का आकार, जिस पर किसी रोम या बाल का नामोनिशाँ तक नहीं, जिसकी भुजाओं का ऊपर का खुला फ़ासिला तीन इंच से ज्यादा नहीं और बिलकुल मध्य में जरा सा नीचे की ओर गोलाई लेती एक पतली सी दरार जिस के ऊपरी सिरे पर से ज़रा सा झांकता भगनासा.
उस वक़्त दिया की योनि में से एक बहुत ही मादक सी खुशबू उठ रही थी. मैं नारी शरीर के उस अत्यंत गोपनीय अंग को निहार रहा था जिसको कभी सूर्य चन्द्रमा ने भी नहीं देखा था. बहुत ही किस्मत वाले होते हैं वो लोग जिन पर कोई नारी इतना विश्वास करती है कि उन्हें अपने गोपनीय नारीत्व के प्रतीक अंगों को निहारने और छूने की इज़ाज़त देती है.
“आओ ना…” दिया की गुहार सुन कर मैं बेखुदी के आलम से वापिस पलटा। मैंने बहुत ही नाज़ुकता से दिया को अपनी गोदी में बिठा कर आगे-पीछे हिलना शुरू कर प्रिया. मेरा लिंग दिया के नितम्बों की दरार के साथ साथ बाहर की ओर से दिया के नितम्बों के साथ रगड़ खा रहा था, दिया की दोनों टांगें मेरी साइडों से मेरे पीछे सीधे फैली हुई थी. दिया की योनि से निकला काम-रस मेरे लिंग की जड़ पर से हो कर नीचे की ओर बह रहा था.
मेरे दोनों हाथों ने दिया की पीठ को कस के जकड़ा हुआ था और दिया के सुपुष्ट उरोज़ मेरी छाती में धंसे हुए थे और मैं दिया के मुंह पर, आँखों पर, माथे पर, गालों पर, होंठों पर प्यार की मोहरें लगाता ही जा रहा था और प्रतिक्रिया स्वरूप दिया के मुंह से कभी आहें कराहें और कभी लम्बी लम्बी सीत्कारें निकल रही थी.
अचानक दिया मेरी गोदी से उठी और बिस्तर पर लेट कर याचना भरी नज़रों से मुझे देखने लगी. मैं ऐसी नज़रों का मतलब बख़ूबी समझता था. तत्काल मैंने बहुत ही इज़्ज़त और प्यार से दिया की रति-तेज़ से धधकती योनि पर अपना दायाँ हाथ रख प्रिया; उसकी योनि तो पहले से ही कामऱज़ से सराबोर थी और अभी भी ऱज़स्राव चालू था. मैंने हथेली का एक कप सा बनाया जिस में मेरी उंगलियाँ नीचे की ओर थी और उससे दिया की योनि को पूरा ढाँप लिया. मेरी बड़ी उंगली दिया की योनि के पद्मदलों पर ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर विचरण करने लगी.
इधर दिया ने मेरा काम-ध्वज अपने हाथ में ले कर उस का मर्दन शुरू कर प्रिया था. मैंने भी दिया के ऊपर लेटते हुए उस के दोनों उरोजों के मध्य में अपना मुंह लगा कर चूसना शुरू कर प्रिया।
मेरी इस हरकत से दिया के छक्के छूट गये; दिया को अपने जिस्म में उठती मदन-तरंग को संभाल पाना असंभव हो गया, उसके के मुंह से जोर जोर से आहें-कराहें फूटनी शुरू हो गयी और दिया अपनी दोनों टांगें रह रह कर हवा में लहराने लगी- आई..ई..ई..ई.!!!! सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!! आह..ह..ह..ह..ह… ह..ह..ह!!!! उफ़..आ..आ.. आ..आ..आ.आ!! जोर से करो… हाँ यहीं… ओ गॉड!… जोर से… आह… मर गयी! सी… ई..ई..ई!
यूं मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि दिया की आहों कराहों के बीच यह “जोर से करो… हाँ यहीं…!” वाली डायरेक्शन मेरे होंठों के लिए थी या दिया की योनि का जुग़राफ़िया नापती मेरी उँगलियों के लिए? बहरहाल… मेरा और दिया का काम-उत्सव धीरे-धीरे अपने चरमोक्षण की ओर अग्रसर था. मेरे ख्याल से दिया एक से ज्यादा बार पहले ही स्खलित हो चुकी थी लेकिन मैं अभी तक डटा हुआ था. तीव्र काम-उत्तेज़ना के कारण मेरे नलों में हल्का-हल्का सा दर्द भी हो रहा था लेकिन दिया को सम्पूर्ण रूप से पाने की लगन कुछ और सूझने ही नहीं दे रही थी.
फिर मैंने आहिस्ता से अपनी मध्यमा उंगली दिया की योनि की भगनासा सहलाई और अपनी उंगली जरा सी नीचे ले जा कर दरार के ज़रा सी अंदर घुसायी; तत्काल दिया के मुख से आनन्दमयी कराहटों के साथ “सी… ई… ई..ई..ई..ई..!” की एक तेज़ सिसकी निकल गयी जिस में दर्द का अंश भी शामिल था.
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कहानी का छठा भाग :स्त्री-मन… एक पहेली-6