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कोकशास्त्र की रचना -2

जलगाँव बॉय

02 Aug 2009 को प्रकाशित

कोकशास्त्र की रचना -2
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अब तक आपने पढ़ा कि कैसे एक अतिकामुक स्त्री की काम वासना को बुझाने में कामरीश राज्य के बड़े बड़े सूरमा परास्त हो गए तब एक दुबला पतला ब्राहमण उस स्त्री की चुनौती स्वीकार करने आगे आता है जिस का सभी उपहास उड़ाते है पर राजा उस कोका पंडित नाम के ब्राहमण को उस स्त्री की कामक्षुदा शांत करने की आज्ञा दे देता है।अब आगे..

कोका उस औरत को अपने घर ले गया।कोका पंडित ने समस्या पर गंभीरता से विचार किया और उसने ठान लिया कि वह जल्दबाजी से काम नहीं लेगा।

रात में वे दोनों एकांत में अपने कमरे में आए और कोका ने अपनी धोती उतारी.. धोती के उतारते ही कोका के लंड और उसके शरीर की कमज़ोर बनावट को देख वह औरत हंस पड़ी और कहने लगी- अरे पागल पंडित.. तुम्हारा लंड तो दूसरे वीरों के लंड.. जिन्होंने मुझे चोदा है.. उनसे आधा भी नहीं है.. अरे तुम से तो सीधा खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा है। फिर भी तुम सोच रहे हो मेरी चूत की प्यास बुझा दोगे..? तुम पागल ही नहीं पूरे अक्खड़ और सनकी भी हो।

कोका ने कहा- सुन हरामजादी कुतिया आज तुम्हें तुम्हारे लायक कोई आदमी मिला है.. अरे औरत को शांत करने के लिए केवल लंड का आकार और शरीर का तगड़ा होना ही ज़रूरी नहीं है.. मर्द को काम-कला आनी चाहिए। मेरा लंड छोटा है तो यह कोई भी योनि में आराम से समा जाता है। अब तुमने बहुत बातें कर ली हैं.. चलो अब अपनी टाँगें फैलाओ.. वेश्या कहीं की..

तब वह बिस्तर पर चित्त होकर लेट गई और अपनी टाँगें फैला दीं।कोका काम-कला का जानकार था.. वो उस ज्ञान को जानता था.. जो सब नहीं जानते थे।सबसे पहले उसने चुंबन लेने प्रारंभ किए। वह उसकी जीभ और ऊपर-नीचे के होंठों को चूसने लगा।

वह उसके होंठों को पूरी तरह से जकड़ कर उसकी पूरी साँस अपने फेफड़ों में ले लेता.. जिससे वह बिना साँस के व्याकुल होकर छटपटाने लगती और जब कोका उसे छोड़ता.. तो ज़ोर-ज़ोर से साँस भरने लगती।

यह क्रिया काफ़ी देर तक चली, जिससे वह शिथिल पड़ने लगी।

फिर वह उसके स्तनों पर आ गया.. पहले उसने धीरे-धीरे स्तन मर्दन करना प्रारंभ किया। फिर चूचुक पर धीरे-धीरे जीभ फेरनी शुरू की। इससे उस औरत की काम ज्वाला भड़क कर सातवें आसमान पर जा पहुँची। वह चूत में लंड लेने के लिए व्याकुल हो उठी.. पर इधर कोका को कोई जल्दी नहीं थी।

तब कोका नाभि के इर्द-गिर्द अपनी जीभ फेरने लगा। कभी-कभी बीच में उसके पेडू पर.. कभी झांटों में हल्के से उंगली फिरा देता.. साथ में वह उसके नितंबों के नीचे अपनी हथेली ले जा उन्हें सहलाए भी जा रहा था और उसके भारी चूतड़ों पर कभी-कभी हल्के से नाख़ून भी गड़ा रहा था।

इन क्रियाओं के फलस्वरूप वह चुड़ैल ज़ोर-ज़ोर से साँस लेने लगी और कोका से चोदने के लिए विनती करने लगी।तब कोका ने आख़िर में उसकी चूत में एक उंगली डाली.. कोका धीरे-धीरे उसके चूत के दाने पर उंगली की नोक का प्रहार कर रहा था।

फिर उसने दो उंगलियां डालीं और अंत में तीन उंगलियों को उसकी चूत में डाल प्रिया। वह काफ़ी देर तक उसकी उंगलियों से चुदाई करता रहा। वह औरत भी गान्ड ऊपर उठा-उठा के झटके देने लगी.. मानो उसका पूरा हाथ ही अपनी चूत में समा लेना चाहती हो।

आधी से अधिक रात बीत चुकी थी, उस औरत की साँसें उखड़ने लगी थीं, तब कोका ने बहुत ही शान्ति के साथ उसकी योनि में अपना लिंग प्रवेश किया।वह ताबड़तोड़ चुदाई के मूड में कतई न था। वह लंड को घुमा-फिरा कर उसकी चूत के अन्दर की हर जगह को छू रहा था.. उसकी चूत की हर दीवार का घर्षण कर रहा था।

जब भी औरत अपनी चूत से लंड को कस कर निचोड़ना चाहती.. कोका लंड बाहर निकाल लेता और आसान बदल लेता।

उस रात कोका ने 64 बार आसान बदले.. जो कामसूत्र में वर्णित हैं। उसने हर आसान से उसकी शान्ति-पूर्वक चुदाई की। जैसे ही भोर होने को हुई.. वह औरत पूरी तरह से पस्त हो चुकी थी.. अब उसमें हिलने-डुलने की भी ताक़त नहीं बची थी।

बहुत ही धीमी आवाज़ में वह कह रही थी- हे पंडित मेरी जिंदगी में तुम पहले आदमी हो.. जिसने मुझे पूर्ण रूप से तृप्त किया है। किसी ने भी मेरे साथ इस तरह नहीं किया.. जैसा तुमने किया.. और तुम्हारी चुदाई का क्या कहना.. इतने तरीकों से भी किसी औरत को चोदा जा सकता है.. मैं अभी तक आश्चर्यचकित हूँ। तुमने सच कहा था औरत को सन्तुष्ट करने के लिए बड़े लंड की दरकार नहीं बल्कि तरीका आना चाहिए। पंडित.. मैं तुमसे हार गई हूँ और आज से मैं तुम्हारी दासी हूँ। तुम मेरे मालिक हो और इस दासी पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार है।

यह सुनकर कोका ने उसे नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान करके आने को कहा।

कुछ समय बाद कोका और वह कमरे में फिर आमने-सामने थे। कोका ने उसे अपने पास बैठाया।

उसके पाँव में पाजेब पहनाईं.. हाथों में चूड़ियाँ पहनाईं.. फिर सुंदर सी साड़ी और अंगिया दी। जब वह अच्छी तरह से वस्त्र पहन कर आई.. तब कोका ने अपने हाथों से उसका श्रृंगार करना प्रारंभ किया। हाथों में मेहंदी रचाई.. पाँव में आलता लगाया.. आँखों में पायल और फिर हर अंग के आभूषण सजाए।

फिर कोका ने कहा- जो औरत नंगी रहती है.. वह एक नंगे छोटे बच्चे के समान है। काम के सुख से सर्वथा अनभिज्ञ रहती है। तुम नंगी होकर सारी दुनिया में फिरती रही हो और तुम्हारे अन्दर की नारी समाप्त हो गई। तुम्हारे काम अंगों की ‘सरसराहट..’ ख़त्म हो गई। अब जो भी तुम्हारी चुदाई करता.. तुम सन्तुष्ट नहीं होती थीं। औरत वस्त्रों को केवल अपने अंगों को ढकने के लिए ही नहीं पहनती.. बल्कि अच्छे वस्त्र पहन कर बनाव श्रृंगार करके वह अपनी काम क्षमता को भी बढ़ाती है। इससे पुरुष उसकी ओर आकर्षित होते हैं। यह बात नारी बहुत अच्छी तरह से समझती है कि वह आकर्षण दे रही है और इसी मनोस्थिति में नारी जब स्वयं आकर्षित होकर किसी पुरुष को अपनी देह सौंपती है.. तभी उसे सच्ची संतुष्टि मिलती है।

‘आपने आज मेरी आँखें खोल दी हैं.. पहले तो लोग मुझे खिलौना समझते थे. मेरी जैसी अकेली नारी को जिसने चाहा.. जैसे चाहा.. अपने नीचे सुलाया.. बात यहाँ तक पहुँच गई कि मैं स्वयं अपनी चूत में हरदम लंड चाहने लगी। जब मैं इसके लिए आगे बढ़ी.. तो जो पहले जिस काम के लिए मुझे बहलाते-फुसलाते थे.. वही मुझे देख कर दूर भागने लगे. इससे मैं विद्रोहनी हो गई और उसका चरम राजसभा तक पहुँच कर हुआ।’

फिर वे दोनों राजसभा मैं पहुँचे.. राजा और दरबारी उसे सजी-धजी और लज्जा की प्रतिमूर्ति बनी देख दंग रह गए। कल की नंगी घूमने वाली बेशर्म रन्डी आज एक सभ्रान्त महिला नज़र आ रही थी। तब कोका ने उसे बोलने के लिए इशारा किया।

‘महाराज मैं अपनी हार स्वीकार करती हूँ। जिस ब्राह्मण का सब उपहास उड़ा रहे थे उसी ने मुझे जीवन का सबसे अद्भुत काम सुख प्रिया है।’उसने सर पर पल्लू ठीक करते हुए कहा।

इस पर राजा ने कोका पंडित को आदर मान देते हुए कहा- इस दरबार की मान-मर्यादा बचाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। फिर भी मेरी उत्सुकता यह जानने के लिए बढ़ी जा रही है.. कि जिसे हट्टे-कट्टे वीर नहीं कर सके.. वो आप किस तरह कर पाए?

‘राजन यह कार्य मैंने अपने कामशास्त्र के ज्ञान के आधार पर पूरा किया है.. पर राजन उन सबका इस सभा में ऐसे वर्णन करना शिष्टाचार के विरुद्ध होगा।’

तब राजा ने एकांत की व्यवस्था कर दी और कोका पंडित ने विस्तार से कई दिनों मैं राजा के सम्मुख उसका वर्णन किया। तब राजा ने आज्ञा दी कि वह इसको एक ग्रंथ का रूप दे।तब कोका पंडित अपने कार्य में जुट गए और परिणाम एक महान ग्रंथ ‘रतिरहस्य’ या ‘कोक-शास्त्र’ के रूप में दुनिया के समक्ष आया।

मित्रो, यह सच है कि लंड की साइज कोई मायने नहीं रखती अगर सेक्स का सही ज्ञान हो.. वह हर तरह से अपने साथी को संतुष्ट कर सकता है। कामकला का ज्ञान सिर्फ मर्दों को ही नहीं औरतों को भी लेना चाहिए कि इस कारण दोनों एक-दूसरे की संतुष्ट कर सकते हैं।

यह कहानी इसी प्रयोजन से लिखनी पड़ी क्योंकि बहुत असंतुष्ट लड़कियों.. भाभियों और आंटियों के ईमेल के साथ-साथ कुछ भाइयों के भी ईमेल थे.. जो मुझे खुला आमंत्रण दे रहे थे कि उनके पत्नी के साथ सेक्स करने के लिए मैं आ जाऊँ.. क्योंकि वो उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पा रहे थे।

आप सब मुझे जरूर ईमेल करें और अपनी राय इस कहानी पर जरूर दें।मैं आगे और किस तरह की कहानी लिखूं.. आप क्या पसंद करते हैं.. यह जरूर बताएं।support@mohakkisse.com

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कोकशास्त्र की रचना

कुल भाग: 2
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पाठकों की राय

3 टिप्पणियां

प्रनोध कुमार

2 months ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

नब्बू खान

2 months ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

राज ट्रिपल एक्स

2 months ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

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