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तन का सुख-2

राज कार्तिक शर्मा

15 Sep 2019 को प्रकाशित

तन का सुख-2
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लेखक : राज कार्तिक

तभी कमल ने सुधा को जाने को कहा और मुझे बोला- यहीं सो जाओ !

तो मुझसे पहले ही सुधा बोल पड़ी- इनके सोने का इंतजाम ऊपर वाले कमरे में किया हुआ है पहले से ही।

कमल के कमरे में डबलबेड था तो मैंने कहा- यहीं सो जाता हूँ !

तो सुधा ने ऐसे आँखें तरेरी की बस !

सुधा उठ कर बाहर चली गई। मैं भी कमल को नींद का बहाना बना कर ऊपर कमरे की तरफ चल दिया। तब रात के करीब बारह बजने को थे।

जब मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो सुधा की कोमल सी आवाज आई- अब क्यूँ आये हो… सो जाओ उस कमल के पास.. !

मैंने इधर उधर देखा और उसके पास जाकर उसको मनाते हुए सॉरी बोला।

पर वो थी कि मानने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरा भी मूड खराब हो गया, मैं अपने आप को कोसने लगा कि मैंने कमल के कमरे में रुकने का कहा ही क्यों।

मैं बुझे मन से ऊपर कमरे में चला गया और अपने कपड़े उतार कर लुंगी पहन ली।

तभी दरवाजे पर खट-खट हुई। मैंने देखा तो देखता ही रह गया। यह तो सुधा थी। सफ़ेद बल्ब की रोशनी में एकदम परी सी खड़ी लग रही थी। एक बेहद खूबसूरत नाइटी में दूध का गिलास हाथ में लिए वो दरवाजे पर खड़ी थी।

उसको देखते ही दिल खुशी से झूम उठा और मैं लगभग दौड़ कर उसके पास गया। जाते ही उसके हाथ से दूध का गिलास लेकर एक तरफ रखा और उसको अपनी गोद में उठा कर सीधा बिस्तर पर ले गया।

उसके बाल उसके गालों पर फ़ैल गए थे। मैंने धीरे से उसके बालो को एक तरफ करते हुए उसकी आँखों में देखा तो उसने शरमा कर आँखें बंद कर ली।

मैंने झुक कर उसकी बंद आँखों को चूम लिया। ऐसा मैंने अब तक फिल्मों में ही देखा था पर आज मेरे साथ हकीकत में हो रहा था। जब मैंने उसकी आँखें चूमी तो वो एकदम से लरज कर मुझ से लिपट गई। फिर तो जो चूमा-चाटी का दौर शुरू हुआ तो कुछ भी ध्यान नहीं रहा। अब तो हम दोनों एक दूसरे में समा जाने को बेताब हो रहे थे।

मैंने एक एक करके उसके सारे कपड़े उतार दिए। पहले उसकी नाइटी, फिर उसकी ब्रा, और फिर जब उसकी पैंटी उतारी तो उसकी पानी-पानी होती चूत देख कर लण्ड फटने को हो गया। मैंने उसकी नाभि क्षेत्र को चूमना-चाटना शुरू किया तो वो बेहद गर्म हो गई और मुझसे बुरी तरह से लिपट गई। वो भरपूर उत्तेजित थी। मैंने थोड़ा सा नीचे होते हुए उसकी चूत पर जब जीभ लगाई तो वो मस्ती के मारे चीख पड़ी। उसकी चूत बहुत पानी छोड़ रही थी।

मैं भी मस्ती में भर कर उसकी चूत चाटने लगा। उसकी रसीली चूत का स्वाद बहुत गज़ब था। एकदम नमकीन और थोड़ा सा कसैला सा पर था मजेदार। वो मस्ती में सर को इधर उधर पटक रही थी और मेरा सर अपनी चूत पर दबा रही थी।

उसके हाथ अब मेरे लण्ड को टटोल रहे थे और वो भी अब मुझे बिना कपड़ों के देखना चाहती थी। पर मैंने पहना ही क्या था, एक लुंगी थी वो मैंने उतार कर एक तरफ़ रख दी तो मैं भी बिल्कु नंगा हो गया। मैंने अपना लण्ड उसके मुँह की तरफ किया तो उसने भी लण्ड थोड़ी सी ना नुकर के बाद मुँह में ले लिया और चूसने लगी। पर कुछ देर बाद वो लण्ड अपनी चूत में लेने को तड़प उठी।

कमरे में कोई क्रीम या तेल नहीं था चूत पर लगाने को। पर जब मैं लण्ड सुधा की चूत रखने लगा तो सुधा ने तकिये के नीचे से एक क्रीम की डब्बी निकाल कर मेरे हाथ में थमा दी।

कुछ कहने की जरुरत ही नहीं थी, वो पूरी तैयारी के साथ चुदवाने आई थी। मैंने डब्बी में से क्रीम लेकर उसकी चूत पर और अपने लण्ड पर अच्छे से लगाया। चूत पर क्रीम लगाते लगाते मैंने क्रीम से भरी एक उंगली सुधा की गाण्ड में डाल दी। उसका यह सब पहली बार था तो वो चिंहुक उठी। मैंने उंगली बाहर नहीं निकाली और उसको अंदर-बाहर करने लगा। मैं सुधा की चुचियाँ चूस रहा था।

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“क्यूँ तड़पा रहे हो राज… अब जल्दी से डाल दो अंदर… वरना मर जाऊँगी…!”

वो लण्ड लेने के लिए तड़प रही थी। मैंने अपना लण्ड उसकी चूत के मुँह पर टिकाया और धीरे से अंदर की तरफ दबाया तो लण्ड फिसल कर एक तरफ़ चला गया। आखिर था तो अनाड़ी ही तब तक।

मैंने दुबारा कोशिश की पर फिर से लण्ड फिसल गया तो सुधा ने लण्ड को अपने हाथ में पकड़ कर चूत पर रखा। मैंने भी देर नहीं की और एक जोरदार धक्का लगा दिया। सुधा की चीख पूरे घर में गूंज जाती अगर मैंने सही समय पर उसके मुँह पर हाथ नहीं रख दिया होता। क्रीम की चिकनाई और चूत के पानी की मेहरबानी से लण्ड पहले ही धक्के में दो तीन इंच उतर गया था चूत में। खून की एक पतली सी लकीर जांघों पर आ गई थी। मैंने लण्ड को बाहर खींचा तो उस पर भी खून लगा हुआ था।

मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और दो तीन धक्के एक साथ फिर से लगा दिए। सुधा दर्द के मारे छटपटाने लगी। वो अपने हाथों के जोर से मुझे अपने ऊपर से धकेलने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

इसी कोशिश में मेरा हाथ उसके मुँह पर से उतर गया, वो रो रही थी और मुझे लण्ड बाहर निकालने को कह रही थी- बहुत दर्द हो रहा है राज… मुझसे सहन नहीं हो रहा है, प्लीज अपना बाहर निकाल लो !

कुछ देर में जैसे ही उसका दर्द कुछ कम हुआ तो उसने रोना बंद कर दिया और मेरे होंठ चूसने लगी। अब उसको भी मज़ा आने लगा था। मैंने थोड़ा ऊपर होकर उसके चेहरे से आँसू अपनी जीभ से साफ़ कर दिए। मैंने हल्का हल्का लण्ड को हिलाना शुरू किया तो वो भी अपनी गाण्ड ऊपर उठाने लगी। फिर तो धीरे धीरे चुदाई शुरू हो गई और कुछ ही देर बाद चुदाई अपनी पूरे यौवन पर आ गई और सुधा की चूत ने पानी छोड़ दिया।

कमरे में फच्च फच्च की आवाज कमरे के माहौल को मादक बनाने लगी। कमरे में सुधा की और मेरी आँहे और सिसकारियाँ गूंज रही थी। सुधा की कसी चूत चोदते चोदते मैं पसीने से लथपथ हो गया था। अब तो सुधा भी गाण्ड उछाल उछाल कर मेरी लण्ड के साथ ताल से ताल मिला रही थी। जब हम दोनों की जांघें मिलती तो फट फट फच्च फच्च की आवाज आती और मैं दुगने जोश के साथ चुदाई करने लगता।

हम दोनों मस्ती में डूबे चुदाई का मज़ा ले रहे थे। हम दोनों का ही यह पहला मौका था। करीब आधे घंटे की जबरदस्त चुदाई के बाद मेरा लण्ड अकड़ने लगा। लण्ड चूत के अंदर ही फ़ूल गया था। तभी सुधा की चूत से तीसरी बार झरना फ़ूट पड़ा। अभी पाँच दस धक्के ही और लगे थे कि मेरा लण्ड भी पूरे जोश के साथ सुधा की चूत में अपना वीर्य भरने लगा। मैं बेदम सा हुआ सुधा के ऊपर ही लेट गया। सुधा ने भी मुझे अपनी बाहों और टांगों में जकड़ लिया। हम दोनों के होंठ मिल गए और प्यार से एक दूसरे को चूमने लगे। फिर ऐसे ही बहुत देर तक हम दोनों लेटे रहे।

जबरदस्त चुदाई के बाद अब नींद सी आने लगी थी। तभी सुधा उठी और बाथरूम में चली गई। मैंने देखा कि उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया था तो मैं भी उठ कर बाथरूम में घुस गया।

सुधा वहाँ बैठी पेशाब कर रही थी। मुझे देख कर वो शरमाई। मैं भी वही खड़ा होकर पेशाब करने लगा। सुधा पेशाब करने के बाद उठी और मुझ से लिपट गई।

फिर उसने वहीं पर मेरा लण्ड और अपनी चूत अच्छे से साफ़ की और हम बाहर आने लगे। सुधा की चूत अब सूज गई थी, उससे चला नहीं जा रहा था। मैंने भी मौका हाथ से जाने नहीं दिया और सुधा का नंगा बदन अपनी बाहों में उठा लिया और बाहर आकर बिस्तर पर लेटा दिया। हम दोनों को ही चरमसुख की प्राप्ति हुई थी। हम दोनों ही बहुत खुश थे।

बाहर आकर कुछ देर बातें की। कुछ सच्ची झूठी कसमें खाई और फिर दूसरा दौर शुरू हो गया। फिर तो सुबह जब तक नीचे खटपट शुरू नहीं हो गई हम दोनों चुदाई के सागर में गोते लगाते रहे और जवानी की आग को ठंडा करते रहे।

मुझे अगले दिन ही वापिस आना था पर जब दीदी की ससुराल वालो ने जोर दिया तो मैं होली तक रुक गया। आखिर चाहता तो मैं भी यही था। और फिर मेरी होली कैसी रही होगी इसका अंदाजा आप सब लगा सकते हैं। वो तीन दिन मेरी जिंदगी के सब से सुहाने दिन बन गए। अब शायद सुधा के घर वालों को इस बारे में पता लग गया है तभी तो वो सुधा के और मेरे रिश्ते की बात चला रहे हैं पर मैं अभी शादी नहीं करना चाहता।

आप लोग भी बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए।

कहानी पढ़ कर बताना कि कैसी लगी मेरी पहली बार की मस्ती।

आपकी मेल का इन्तजार रहेगा।

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तन का सुख

कुल भाग: 2
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पाठकों की राय

3 टिप्पणियां

कन्नू कनोज

1 week ago

कहानी बहुत ही शानदार थी, अंत तो लाजवाब था।

लवली सिंह

1 week ago

बहुत ही गजब का लिखा है लेखक भाई। आपका लिखने का स्टाइल बहुत बढ़िया है।

भौमिक सोलंकी

4 weeks ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

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