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Hindi Sex Story पठन समय: 8 मिनट पढ़ा गया: 476 बार

जब साजन ने खोली मोरी अंगिया-6

Antarvasna

18 Sep 2019 को प्रकाशित

जब साजन ने खोली मोरी अंगिया-6
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स्वप्न

वह रात चाँदनी रही सखी, साजन निद्रा में लीन रहा

आँखों में मेरी पर नींद नहीं, मैंने तो देखा स्वप्न नया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

सोते साजन के बालों को, हौले-हौले सहलाय प्रिया

माथे पर एक चुम्बन लेकर, होठों में होंठ घुसाय प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन के होंठों से होंठ मेरे, चिपके जैसे कि चुम्बक हों

साजन सोते या जागते हैं, अंग पे हाथ फेर अनुमान किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

दस अंगुल का विस्तार निरख, मैं तो हो गई निहाल सखी

साजन सोते हैं या जागते हैं, अब ये विचार मन से दूर किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

अपने स्तन निर्वस्त्र किये, साजन के होठों में सौंप दिए

गहरी-गरम उसकी सांसों ने, मेरे स्तन स्वतः फुलाय प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन के उभरे सीने पर, फिर मैंने जिह्वा सरकाई सखी

उसके सीने पर होंठों से, चुम्बन के कई प्रकार लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन बेसुध सा सोया था, मैंने अंतःवस्त्र उतार प्रिया

दस अंगुल के चितचोर को फिर, मैंने मुख माहि उतार लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मैंने साजन के अंग से फिर, मुँह से खेले कई खेल सखी

कभी होंठों से खींचा उसको, कभी जीभ से रस फैलाय प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

कभी केले सा होंठस्थ किया, कभी आम सा था रस चूस लिया

कभी जिह्वा की अठखेली दी, कभी दाँतों से मृदु दंड प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

होंठ-जिह्वा दोनों संग-संग, इस क्रिया में रत रहे सखी

जिह्वा-रस में तर अंग से मैंने, स्तनों पे रस का लेप किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मैंने सोचा साजन का अंग, मेरे अंग में कैसे जाता होगा

कैसे अंग में वह धँसता होगा, कैसे अंग में इतराता होगा

अपनी मुट्ठी को अंग समझ, मैंने क्या–क्या नहीं अनुमान किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मैं देखत थी मैं खेलत थी, अंग मुँह के अन्दर सेवत थी

मेरे मन में ऐसा लोभ हुआ, मैंने उसको पूर्ण कंठस्थ किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन की उँगलियाँ अब मैंने, नितम्बों पे फिरती अनुभव की

मैं समझ गई अब साजन की, आँखों से उड़ी झूठी निंप्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन ने नितम्ब सहलाये सखी, पूरा अंग मुट्ठी ले दबा प्रिया

ख़ुशी से झूमे मेरे अंग ने, द्रव के द्वारों को खोल प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

नितम्बों के मध्य सखी साजन ने, रस भरा सा चुम्बन टांक प्रिया

मेरे मुँह से बस सिसकी निकली, मैंने आनन्द अतिरेक था प्राप्त किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन ने नितम्बों पर दाँतों से, कई मोहरें सखी उकेर दईं

मक्खन की ढेली समझ उन्हें, जिह्वा से चाट-चटकार लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

एक बड़े अनोखे अनुभव ने, जीवन में मेरे किलकार किया

मैं चिहुंकी मेरे अंग फड़के, मैंने उल्लास मय चीत्कार किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

रात्रि के गहन सन्नाटे को, मेरी सिसकारी थी तोड़ रही

मैं बेसुध सी होकर अंग को, होंठों से पकड़ और छोड़ रही

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मैं बेसब्री से उठी सखी, साजन के अंग पर जा लेटी

साजन के विपरीत था मुख मेरा, नितम्बों को पकड़ निचोड़ प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मेरा मुख साजन के पंजों पर, स्तन घुटनों पर पड़े सखी

मेरा अंग विराजा उसके अंग पर, अंग को सांचे में ढाल लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन की कमर के आर-पार, मेरे दो घुटने आधार बने

मेरे पंजों ने तो साजन की, तकिया का जैसे काम किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मेरे अंग के सब क्रिया कलाप, अब साजन की नज़रों में थे

अंग को अंग से सख्ती से जकड़, चहुँ ओर से नितम्ब हिलोर प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

कभी इस चक्कर कभी उस चक्कर, मेरे नितम्ब थे डोल रहे

साजन ने उँगलियों से उकसाया, कभी उन पे कचोटी काट लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

बड़ी बेसब्री से अंग मेरा, स्तम्भ पे चढ़ता उतरता था

जितनी तेजी से चढ़ता था, उतना ही तीव्र उतरता था

मेरे अंग ने उसके अंग की, लम्बाई-चौड़ाई नाप लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन ने अपनी आँखों से, देखे मेरे सब स्पंदन

उसने देखा रस में डूबे, अंगों का गतिमय आलिंगन

उसने नितम्ब पर थाप प्रिया, मैंने स्पंदन पुरजोर किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

श्रम के मारे मेरा शरीर, श्रम के कण से था भीग गया

मेरा उद्वेलित अंग उसके अंग पर, कितने ही मील चढ़-उतर गया

स्तम्भ पे कुशल कोई नट जैसा, मेरे अंग ने था अठखेल किया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

आह, ओह, सीत्कार सिवा, हमरे मुख में कोई शब्द न थे

मैं जितनी थी बेसब्र सखी, साजन भी कम बेसब्र न थे

साजन के अंग ने मेरे अंग में, कई शब्दों का स्वर खोल प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

मेरा अंग तो उसके अंग को, लील लेने को बेसब्र रहा

ऐसी आवाजें आती थी, जैसे भूखा भोजन चबा रहा

साजन ने अपने अंगूठे को, नितम्बों के मध्य लगाय प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

अंग का घर्षण था अंग के संग, अंगूठे का मध्य नितम्बों पर

उसका सुख था अन्दर-अन्दर, इसका सुख था बाहर-बाहर

मैं सर्वत्र आनन्द से घिरी सखी, सुख काम-शिखर तक पहुँच गया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

अंगों की क्षुधा बढ़ती ही गई, संग स्पंदन भी बढ़े सखी

पल भर में ऐसी बारिश हुई, शीतल हो गई तपती धरती

साजन के अंग ने मेरे अंग में, तृप्ति के बांध को तोड़ प्रिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

.

साजन ने उठाकर मुझे सखी, अपने सीने से लगा लिया

और हंसकर बोला वह मुझसे, अनुपम सुख हमने प्राप्त किया

मैंने सहमति की मुस्कान लिए, होंठों से होंठ मिलाय लिया

उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली मोरी अंगिया !

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