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नौकर-नौकरानी पठन समय: 20 मिनट पढ़ा गया: 702 बार

अंगूर का दाना-2

प्रेम गुरु

01 Apr 2012 को प्रकाशित

अंगूर का दाना-2
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प्रेम गुरु की कलम सेमेरे पाठको और पाठिकाओ! आप जरूर सोच रहे होंगे कि अब तो बस दिल्ली लुटने को दो कदम दूर रह गई होगी। बस अब तो प्रेम ने इस खूबसूरत कमसिन नाज़ुक सी कलि को बाहों में भर कर उसके होंठों को चूम लिया होगा। वो पूरी तरह गर्म हो चुकी होगी और उसने भी अपने शहजादे का खड़ा इठलाता लंड पकड़ कर सीत्कार करनी चालू कर दी होगी?

नहीं दोस्तों! इतना जल्दी यह सब तो बस कहानियों और फिल्मों में ही होता है। कोई भी कुंवारी लड़की इतनी जल्दी चुदाई के लिए राज़ी नहीं होती। हाँ इतना जरूर था कि मैं बस उसके होंठों को एक बार चूम जरूर सकता था।दरअसल मैं इस तरह उसे पाना भी नहीं चाहता था।आप तो जानते ही हैं कि मैं प्रेम का पुजारी हूँ और किसी भी लड़की या औरत को कभी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ नहीं चोदना चाहता। मैं तो चाहता था कि हम दोनों मिलकर उस आनंद को भोगें जिसे सयाने और प्रेमीजन ब्रह्मानंद कहते हैं और कुछ मूर्ख लोग उसे चुदाई का नाम देते हैं।

मैंने उसके होंठों पर हल्के से बोरोलीन लगा दी। हाँ इस बार मैंने उसके गालों को छूने के स्थान पर एक बार चूम जरूर लिया। मुझे लगा वो जरूर कसमसाएगी पर वो तो छुईमुई बनी नीची निगाहों से मेरे पाजामे में बने उभार को देखती ही रह गई।उसे तो यह गुमान ही नहीं रहा होगा कि मैं इस कदर उस अदना सी नौकरानी का चुम्मा भी ले सकता हूँ।

मेरा पप्पू (लंड) तो इतनी जोर से अकड़ा था जैसे कह रहा हो- गुरु मुझे भी इस कलि के प्रेम के रस में भिगो दो। अब तो मुझे भी लगने लगा था कि मुझे पप्पू की बात मान लेनी चाहिए। पर मुझे डर भी लग रहा था।

अंगूर के नितम्ब जरूर बड़े बड़े और गुदाज़ थे पर मुझे लगता था वो अभी कमसिन बच्ची ही है। वैसे तो मैंने जब अनारकली की चुदाई की थी उसकी उम्र भी लगभग इतनी ही थी पर उसकी बात अलग थी। वो खुद चुदने को तैयार और बेकरार थी।

पर अंगूर के बारे में अभी मैं यकीन के साथ ऐसा दावा नहीं कर सकता था। मैंने अगर उसे चोदने की जल्दबाजी की और उसने शोर मचा प्रिया या मीनू से कुछ उल्टा सीधा कह प्रिया तो? मैं तो सोच कर ही काँप उठता हूँ। चलो मान लिया वो चुदने को तैयार भी हो गई लेकिन प्रथम सम्भोग में कहीं ज्यादा खून खराबा या कुछ ऊँच-नीच हो गई तो मैं तो उस साले शाइनी आहूजा की तरह बेमौत ही मारा जाऊँगा और साथ में इज्जत जायेगी वो अलग।

हे… लिंग महादेव अब तो बस तेरा ही सहारा है।

मैं अभी यह सब सोच ही रहा था कि ड्राइंग रूम में सोफे पर रखा मोबाइल बज़ उठा। मुझे इस बेवक्त के फोन पर बड़ा गुस्सा आया। ओह… इस समय सुबह सुबह कौन हो सकता है?‘हेल्लो?’‘मि. माथुर?’‘यस… मैं प्रेम माथुर ही बोल रहा हूँ?’‘वो… वो… आपकी पत्नी का एक्सीडेंट हो गया है… आप जल्दी आ जाइए?’ उधर से आवाज आई।‘क… क्या… मतलब? ओह… आप कौन और कहाँ से बोल रहे हैं?’‘देखिये आप बातों में समय खराब मत कीजिये, प्लीज, आप नीता नर्सिंग होम में जल्दी पहुँच जाएँ!’

मैं तो सन्न ही रह गया। मीनूर अभी 15-20 मिनट पहले ही तो यहाँ से चंगी भली गई थी। मुझे तो कुछ सूझा ही नहीं। हे भगवान् यह नई आफत कहाँ से आ पड़ी।

अंगूर हैरान हुई मेरी ओर देख रही थी ‘क्या हुआ बाबू?’‘ओह… वो… मीनू का एक्सीडेंट हो गया है मुझे अस्पताल जाना होगा!’‘मैं साथ चलूँ क्या?’‘हाँ… हाँ… तुम भी चलो!’

अस्पताल पहुँचने पर पता चला कि जल्दबाजी के चक्कर में मोड़ काटते समय ऑटो रिक्शा उलट गया था और मीनू के दायें पैर की हड्डी टूट गई थी। उसकी रीढ़ की हड्डी में भी चोट आई थी पर वह चोट इतनी गंभीर नहीं थी। मीनू के पैर का ओपरेशन करके पैर पर प्लास्टर चढ़ा प्रिया गया।

सारा दिन इसी आपाधापी में बीत गया। अस्पताल वाले तो मीनूर को रात भर वहीं पर रखना चाहते थे पर मीनू की जिद पर हमें छुट्टी मिल गई पर घर आते-आते शाम तो हो ही गई।

घर आने पर मीनू रोने लगी। उसे जब पता चला कि कल गुलाबो ने अंगूर को बहुत मारा तो उसे अपने गुस्से पर पछतावा होने लगा। उसे लगा यह सब अंगूर को डांटने की सजा भगवान् ने उसे दी है।

अब तो वो जैसे अंगूर पर दिलो जान से मेहरबान ही हो गई। उसने अंगूर को अपने पास बुलाया और लाड़ से उसके गालों और सिर को सहलाया और उसे 500 रुपये भी दिए। उसने तो गुलाबो को भी 5000 रुपये देने की हामी भर ली और कहला भेजा कि अब अंगूर को महीने भर के लिए यहीं रहने प्रिया जाए क्योंकि दिन में मुझे तो दफ्तर जाना पड़ेगा सो उसकी देखभाल के लिए किसी का घर पर होना जरूरी था।

हे भगवान् तू जो भी करता है बहुत सोच समझ कर करता है। अब तो इस अंगूर के गुच्छे को पा लेना बहुत ही आसान हो जाएगा।

आमीन…………

मैंने कई बार अंगूर को टीवी पर डांस वाले प्रोग्राम बड़े चाव से देखते हुए देखा था। कई बार वह फ़िल्मी गानों पर अपनी कमर इस कदर लचकाती है कि अगर उसे सही ट्रेनिंग दी जाए तो वह बड़ी कुशल नर्तकी बन सकती है। उनके घर पर रंगीन टीवी नहीं है। हमने पिछले महीने ही नया एल सी डी टीवी लिया था सो पुराना टीवी बेकार ही पड़ा था।

मेरे दिमाग में एक विचार आया कि क्यों ना पुराना टीवी अंगूर को दे प्रिया जाए। मीनू तो इसके लिए झट से मान भी जायेगी। मैंने मीनू को मना भी लिया और इस चिड़िया को फ़साने के लिए अपने जाल की रूपसुमन तैयार कर ली। मीनू को भला इसके पीछे छिपी मेरी मनसा का कहाँ पता लगता।

अगले दिन अंगूर अपने कपड़े वगैरह लेकर आ गई। अब तो अगले एक महीने तक उसे यहीं रहना था। जब मैं शाम को दफ्तर से आया तो मीनूर ने बताया कि जयपुर से सुरेश भैया भाभी कल सुबह आ रहे हैं।

‘ओह… पर उन्हें परेशान करने की क्या जरूरत थी?’‘मैंने तो मना किया था पर भाभी नहीं मानी। वो कहती थी कि उसका मन नहीं मान रहा वो एक बार मुझे देखना चाहती हैं।’‘हूंऽऽ…’ मैं एक लम्बी सांस छोड़ी।

मुझे थोड़ी निराशा सी हुई। अगर सुधा ने यहाँ रुकने का प्रोग्राम बना लिया तो मेरी तो पूरी की पूरी योजना ही चौपट हो जायेगी। आप तो जानते ही हैं सुधा एक नंबर की चुद्दकड़ है। (याद करें ‘नन्दोइजी नहीं लन्डोइजी’ वाली कहानी)। वो तो मेरी मनसा झट से जान जायेगी। उसके होते अंगूर को चोदना तो असंभव ही होगा।

‘भैया कह रहे थे कि वो और सुधा भाभी शाम को ही वापस चले जायेंगे!’‘ओह… तब तो ठीक है… म… मेरा मतलब है कोई बात नहीं…?’ मेरी जबान फिसलते फिसलते बची।फिर उसने अंगूर को आवाज लगाई ‘अंगूर! साहब के लिए चाय बना दे!’

‘जी बनाती हूँ!’ रसोई से अंगूर की रस भरी आवाज सुनाई दी।

मैंने बाथरूम में जाकर कपड़े बदले और पाजामा-कुरता पहन कर ड्राइंग-रूम में सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद अंगूर चाय बना कर ले आई। आज तो उसका जलवा देखने लायक ही था। उसने जोधपुरी कुर्ती और घाघरा पहन रखा था। सर पर सांगानेरी प्रिंट की ओढ़नी। लगता है मीनू आज इस पर पूरी तरह मेहरबान हो गई है। यह ड्रेस तो मीनू ने जब हम जोधपुर घूमने गए थे तब खरीदी थी और उसे बड़ी पसंद थी। जिस दिन वो यह घाघरा और कुर्ती पहनती थी मैं उसकी गांड जरूर मारता था।

ओह… अंगूर तो इन कपड़ों में महारानी जोधा ही लग रही थी। मैं तो यही सोच रहा था कि उसने इस घाघरे के अन्दर कच्छी पहनी होगी या नहीं। मैं तो उसे इस रूप में देख कर ठगा सा ही रह गया। मेरा मन तो उसे चूम लेने को ही करने लगा और मेरा पप्पू तो उसे सलाम पर सलाम बजाने लगा था।

वह धीरे धीरे चलती हुई हाथ में चाय की ट्रे पकड़े मेरे पास आ गई। जैसे ही वो मुझे चाय का कप पकड़ाने के लिए झुकी तो कुर्ती से झांकते उसके गुलाबी उरोज दिख गए। दायें उरोज पर एक काला तिल और चने के दाने जितनी निप्पल गहरे लाल रंग के।उफ्फ्फ……

मेरे मुँह से बे-साख्ता निकल गया,’वाह अंगूर… तुम तो…?’

इस अप्रत्याशित आवाज से वो चौंक पड़ी और उसके हाथ से चाय छलक कर मेरी जाँघों पर गिर गई। मैंने पाजामा पहन रखा था इस लिए थोड़ा बचाव हो गया। मुझे गर्म गर्म सा लगा और मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाला और पाजामे और सोफे पर गिरी चाय को साफ़ करने लगा। वो तो मारे डर के थर-थर कांपने लगी।

‘म… म मुझे माफ़ कर दो… गलती हो गई…म… म…’ वो लगभग रोने वाले अंदाज़ में बोली।

‘ओह… कोई बात नहीं चलो इसे साफ़ कर दो!’ मैंने कहा।

उसने मेरे हाथों से रुमाल ले लिया और मेरी जाँघों पर लगी चाय पोंछने लगी। उसकी नर्म नाज़ुक अंगुलियाँ जैसे ही मेरी जांघ से टकराई मेरे पप्पू ने अन्दर घमासान मचा प्रिया। वो आँखें फाड़े हैरान हुई उसी ओर देखे जा रही थी।

मेरे लिए यह स्वर्णिम अवसर था। मैंने दर्द होने का बेहतरीन नाटक किया ‘आआआआ…!’‘ज्यादा जलन हो रही है क्या?’‘ओह… हाँ… थोड़ी तो है! प… पर कोई बात नहीं!’‘कोई क्रीम लगा दूं क्या?’‘अरे क्रीम से क्या होगा…?’‘तो?’‘मेरी तरह अपने होंठों से चाट कर थूक लगा दो तो जल्दी ठीक हो जायगा।’ मैंने हंसते हुए कहा।

अंगूर तो मारे शर्म के दोहरी ही हो गई। उसने ओढ़नी से अपना मुँह छुपा लिया। उसके गाल तो लाल टमाटर ही हो गए और मैं अन्दर तक रोमांच में डूब गया।

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मैं एक बार उसका हाथ पकड़ना चाहता था पर जैसे ही मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया, वो बोली,’मैं आपके लिए दुबारा चाय बना कर लाती हूँ!’ और वो फिर से रसोई में भाग गई।

मैं तो बस उस फुदकती मस्त चंचल मोरनी को मुँह बाए देखता ही रह गया। पता नहीं कब यह मेरे पहलू में आएगी। इस कुलांचें भरती मस्त हिरनी के लिए तो अगर दूसरा जन्म भी लेना पड़े तो कोई बात नहीं। मेरे पप्पू तो पजामा फाड़कर बाहर आने को बेताब हो रहा था और अन्दर कुछ कुलबुलाने लगा था। मुझे एक बार फिर से बाथरूम जाना पड़ा…

खाना खाने के बाद मीनू को दर्द निवारक दवा दे दी और अंगूर उसके पास ही छोटी सी चारपाई डाल कर सो गई। मैं दूसरे कमरे में जाकर सो गया।

अगले दिन जब मैं दफ्तर से शाम को घर लौटा तो अंगूर मीनू के पास ही बैठी थी। उसने सफ़ेद रंग की पैंट और गुलाबी टॉप पहन रखा था। हे लिंग महादेव यह कमसिन बला तो मेरी जान ही लेकर रहेगी। सफ़ेद पैंट में उसके नितम्ब तो जैसे कहर ही ढा रहे थे। आज तो लगता है जरूर क़यामत ही आ जायेगी।

शादी के बाद जब हम अपना मीनूमास मनाने खजुराहो गए थे तब मीनूर अक्सर यही कपड़े पहनती थी। बस एक रंगीन चश्मा और पहन ले तो मेरा दावा है यह कई घर एक ही दिन में बर्बाद कर देगी। पैंट का आगे का भाग तो ऐसे उभरा हुआ था जैसे इसने भरतपुर या ग्वालियर के राज घराने का पूरा खजाना ही छिपा लिया हो।

मीनू ने उसे मेरे लिए चाय बनाने भेज प्रिया। मैं तो तिरछी नज़रों से उसके नितम्बों की थिरकन और कमर की लचक देखता ही रह गया। जब अंगूर चली गई तो मीनू ने इशारे से मुझे अपनी ओर बुलाया। आज वो बहुत खुश लग रही थी। उसने मेरा हाथ अपने हाथों में पकड़ कर चूम लिया।

मैंने भी उसके होंठों को चूम लिया तो वो शर्माते हुए बोली- प्रेम, मुझे माफ़ कर दो प्लीज मैंने तुम्हें बहुत तरसाया है। मुझे ठीक हो जाने दो, मैं तुम्हारी सारी कमी पूरी कर दूंगी।

मैं जानता हूँ मीनू ने जिस तरीके से मुझे पिछले दो-तीन महीनों से चूत और गांड के लिए तरसाया था वो अच्छी तरह जानती थी। अब शायद उसे पश्चाताप हो रहा था।‘प्रेम एक काम करना प्लीज!’‘क्या?’‘ओह… वो… स्माल साइज के सेनेटरी पैड्स (माहवारी के दिनों में काम आने वाले) ला देना!’‘पर तुम तो लार्ज यूज करती हो?’‘तुम भी… ना… ओह… अंगूर के लिए चाहिए थे उसे आज माहवारी आ गई है।’‘ओह… अच्छा… ठीक है मैं कल ले आऊँगा।’

कमाल है ये औरतें भी कितनी जल्दी एक दूसरे की अन्तरंग बातें जान लेती हैं।

‘ये गुलाबो भी एक नंबर की पागल है!’‘क्यों क्या हुआ?’‘अब देखो ना अंगूर 18 साल की हो गई है और इसे अभी तक मासिक के बारे में भी ठीक से नहीं पता और ना ही इसे इन दिनों में पैड्स यूज करना सिखाया!’‘ओह…’ मेरे मन में तो आया कह दूं ‘मैं ठीक से सिखा दूंगा तुम क्यों चिंता करती हो’ पर मेरे मुँह से बस ‘ओह’ ही निकला।

मैं बाहर ड्राइंग रूम में आ गया और टीवी देखने लगा। अंगूर चाय बना कर ले आई। अब मैंने ध्यान से उसकी पैंट के आगे का फूला हुआ हिस्सा देखा। आज अगर मिक्की जिन्दा होती तो लगभग ऐसी ही दिखती। मैं तो बस इसी ताक में था कि एक बार ढीले से टॉप में उसके सेब फिर से दिख जाएँ। मैंने चाय का कप पकड़ते हुए कहा ‘अंगूर इन कपड़ों में तो तू पूरी फ़िल्मी हिरोइन ही लग रही हो!’

‘अच्छा?’ उसने पहले तो मेरी ओर हैरानी से देखा फिर मंद मंद मुस्कुराने लगी।

मैंने बात जारी रखी- पता है मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीनूबाला भी फिल्मों में आने से पहले एक डायरेक्टर के घर पर नौकरानी का काम किया करती थी। सच कहता हूँ अगर मैं फ़िल्मी डायरेक्टर होता तो तुम्हें हिरोइन लेकर एक फिल्म ही बना देता!’‘सच?’‘और नहीं तो क्या?’‘अरे नहीं बाबू, मैं इतनी खूबसूरत कहाँ हूँ?’

‘अरे मेरी जान तुम क्या हो यह तो मेरी इन आँखों और धड़कते दिल से पूछो’ मैंने अपने मन में ही कहा। मैं जानता था इस कमसिन मासूम बला को फांसने के लिए इसे रंगीन सपने दिखाना बहुत जरूरी है। बस एक बार मेरे जाल में उलझ गई तो फिर कितना भी फड़फड़ाये, मेरे पंजों से कहाँ बच पाएगी।

मैंने कहा ‘अंगूर तुम्हें डांस तो आता है ना?’

‘हाँ बाबू मैं बहुत अच्छा डांस कर लेती हूँ। हमारे घर टीवी नहीं है ना इसलिय मैं ज्यादा नहीं सीख पाई पर मीनूर दीदी जब लड़कियों को कभी कभी डांस सिखाती थी मैं भी उनको देख कर सीख गई। मैं फ़िल्मी गानों पर तो हिरोइनें जैसा डांस करती हैं ठीक वैसा ही कर सकती हूँ। मैं ‘डोला रे डोला रे’ और ‘कजरारे कजरारे’ पर तो एश्वर्या राय से भी अच्छा डांस कर सकती हूँ!’ उसने बड़ी अदा से अपनी आँखें नचाते हुए कहा।

‘अरे वाह… फिर तो बहुत ही अच्छा है। मुझे भी वह डांस सबसे अच्छा लगता है!’‘अच्छा?’‘अंगूर एक बात बता!’‘क्या?’‘अगर तुम्हारे घर में रंगीन टीवी हो तो तुम कितने दिनों में पूरा डांस सीख जाओगी?’‘अगर हमारे घर रंगीन टीवी हो तो मैं 10 दिनों में ही माधुरी दीक्षित से भी बढ़िया डांस करके दिखा सकती हूँ!’

उसकी आँखें एक नए सपने से झिलमिला उठी थी। बस अब तो चिड़िया ने दाना चुगने के लिए मेरे जाल की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं।‘पता है मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए मीनू से बात की थी!’‘डांस के बारे में?’‘अरे नहीं बुद्धू कहीं की!’‘तो?’‘मैं रंगीन टीवी की बात कर रहा हूँ!’‘क्या मतलब?’

मैं उसकी तेज़ होती साँसों के साथ छाती के उठते गिरते उभार और अभिमानी चूचकों को साफ़ देख रहा था। जब कोई मनचाही दुर्लभ चीज मिलने की आश बंध जाए तो मन में उत्तेजना बहुत बढ़ जाती है। और फिर किसी भी कीमत पर उसे पा लेने को मन ललचा उठता है। यही हाल अंगूर का था उस समय।

‘पता है मीनूर तो उसे किसी को बेचने वाली थी पर मैंने उसे साफ़ कह प्रिया कि अंगूर को रंगीन टीवी का बहुत शौक है इसलिए यह टीवी तो सिर्फ ‘मेरी अंगूर’ के लिए ही है!’ मैंने ‘हमारी’ की जगह ‘मेरी अंगूर’ जानबूझ कर बोला था।

‘क्या दीदी मान गई?’ उसे तो जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था।‘हाँ भई… पर वो बड़ी मुश्किल से मानी है!’‘ओह… आप बहुत अच्छे हैं! मैं किस मुँह से आपका धन्यवाद करूँ?’ वो तो जैसे सतरंगी सपनों में ही खो गई थी।

मैं जानता हूँ यह छोटी छोटी खुशियाँ ही इन गरीबों के जीवन का आधार होती हैं। ‘अरे मेरी जान इन गुलाबी होंठों से ही करो ना’ मैंने अपने मन में कहा।

मैंने अपनी बात जारी रखते हुए उसे कहा ‘साथ में सी डी प्लेयर भी ले जाना पर कोई ऐसी वैसी फालतू फिल्म मत देख लेना!’‘ऐसी वैसी मतलब… वो गन्दी वाली?’

जिस मासूमियत से उसने कहा था मैं तो मर ही मिटा उसकी इस बात पर। वह बेख्याली में बोल तो गई पर जब उसे ध्यान आया तो वह तो शर्म के मारे गुलज़ार ही हो गई।

‘ये गन्दी वाली कौन सी होती है?’ मैंने हंसते हुए पूछा।‘वो… वो… ओह…’ उसने दोनों हाथों से अपना मुँह छुपा लिया। मैं उसके नर्म नाज़ुक हाथों को पकड़ लेने का यह बेहतरीन मौका भला कैसे छोड़ सकता था।

मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए पूछा ‘अंगूर बताओ ना?’‘नहीं मुझे शर्म आती है?’इस्स्स…

इस सादगी पर कौन ना मर जाए ऐ खुदालड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं?

‘वो… वो… आपकी चाय तो ठंडी हो गई!’ कहते हुए अंगूर ठंडी चाय का कप उठा कर रसोई में भाग गई। उसे भला मेरे अन्दर फूटते ज्वालामुखी की गर्मी का अहसास और खबर कहाँ थी।

उस रात मुझे और अंगूर को नींद भला कैसे आती दोनों की आँखों में कितने रंगीन सपने जो थे। यह अलग बात थी कि मेरे और उसके सपने जुदा थे।

यह साला बांके बिहारी सक्सेना (हमारा पड़ोसी) भी उल्लू की दुम ही है। रात को 12 बजे भी गाने सुन रहा है :

आओगे जब तुम हो साजनाअंगना… फूल… खिलेंगे…

सच ही है मैं भी तो आज अपनी इस नई शहजादी जोधा बनाम अंगूर के आने की कब से बाट जोह रहा हूँ।पढ़ते रहिए…कई भागों में समाप्यsupport@mohakkisse.com

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पाठकों की राय

2 टिप्पणियां
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Neeraj Patel

2 months ago

बहुत ही गजब का लिखा है लेखक भाई। आपका लिखने का स्टाइल बहुत बढ़िया है।

दीप पटेल

2 months ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

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