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जवान लड़की पठन समय: 12 मिनट पढ़ा गया: 388 बार

कमसिन स्कूल गर्ल की व्याकुल चूत-1

सुकान्त शर्मा

13 Sep 2025 को प्रकाशित

कमसिन स्कूल गर्ल की व्याकुल चूत-1
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पर मेरा लेखक मन एक ही चरित्र की सीरियल कहानियों से उभर कर कुछ नया लिखने का प्रयास, कोई नयी थीम तलाशता रहता था. इसी क्रम में मुझे एक पाठिका सोनम सिंह का मेल मिला जिसमें उन्होंने मेरी कहानियों की तारीफ़ के साथ साथ अपने बारे में भी बहुत कुछ बताया.

बातें ई मेल्स से आगे बढ़ी तो हम लोग हैंगआउट्स पर चैट करने लगे. हैंगआउट्स पर हमारी चैट्स लगभग रोज ही होने लगी और बातें फॉर्मल से अन्तरंग जीवन पर होने लगीं जिनमें सोनम जी ने मुझे अपने प्रथम सेक्स के बारे में बताया और साथ ही यह बताया बचपन बीतने के बाद किशोरावस्था और फिर नवयौवना होने के बाद प्रथम यौन संसर्ग तक उनके जीवन में क्या क्या घटा.

इन सब बातों के अलावा उन्होंने मेरे निवेदन करने पर अपने कुछ फोटो और अन्तरंग फोटो भी मुझे दिए. यहां तक कि उन्होंने मुझे मुझ पर भरोसा करके अपने लीगल आइडेंटिटी डाक्यूमेंट्स भी शेयर किये ताकि मैं उन्ही कोई फ्रॉड न समझूं.

बातें इससे भी आगे बढ़ीं तो मिलने और चुदाई तक जा पहुंची. फिर हम किसी जगह मिले भी और वो सब हुआ जो हमारे बीच प्रतीक्षित था. बयालीस वसंत पार कर चुकी खूबसूरत, विवाहिता, दो बेटों की माँ, सभ्रांत और बैंक अधिकारी महिला के साथ सेक्स करने का का वो अनुभव भी कमाल का रहा; पर वो सब बातें मेरी कहानी का विषय नहीं हैं.

प्रिय पाठको, मैं श्रीमती सोनम सिंह, इस समय मेरी उम्र बयालीस वर्ष की है. मेरा कद साढ़े पांच फीट, रंग साफ और खूबसूरत हूं. 34बी नाप की ब्रा पहनती हूं. मेरा बदन थोड़ा सा भरा हुआ मांसल हो गया है अब; पहले मैं छरहरी हुआ करती थी. मेरी पुष्ट जांघें और उभरा हुआ गोलमटोल पिछवाड़ा मुझे बेहद सेक्सी लुक देता है.ज्यादातर मैं सलवार कुर्ता दुपट्टा ही पहनती हूं पर कभी कभी साड़ी भी पहन लेती हूं; साड़ी मैं हमेशा अपनी नाभि से नीचे ही बांधती हूं क्योंकि मैं जानती हूं कि मेरा अधखुला पेट और कमर देखने वालों को विचलित करती रहती है. कुल मिलाकर कामुक पुरुषों के लिए आँखें सेंकने वाली चीज हूं मैं!

मैं विवाहिता हूं, दो बच्चे हैं दोनों अभी स्टूडेंट्स हैं, मेरे पति उच्च सरकारी सेवा में हैं और मैं स्वयं किसी बैंक में अधिकारी वर्ग में हूं. मेरे दो बेटे हैं जो ग्रेजुएशन के बाद बाहर कहीं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.

सेक्स सम्बन्धी बातों में मेरी रूचि तो कच्ची कमसिन उम्र में ही हो गयी थी जो आज तक नहीं छूटी. हां शादी के बाद मैंने कभी किसी परपुरुष से सम्बन्ध नहीं बनाए (इस सत्य कथा के लेखक सुकांत जी को छोड़कर)

मुझे अपने पति से सिर्फ एक शिकायत थी कि वो मेरी चूत कभी नहीं चाटते थे और न ही कभी अपना लण्ड चूसने के लिए मुझसे कहते थे जबकि चूत चटवाने की मेरी बहुत इच्छा होती पर मैं लाज के मारे उनसे कभी कह न सकी. जब मैं सुकांत जी से चुदी तो मेरी चूत चाट चाट कर उन्होंने मुझे हर तरह से तृप्त कर डाला.

सच कहूं तो मेरे पति की पोस्टिंग दूसरे शहर में थी और हम लोग केवल सप्ताहान्त पर ही मिलते थे और मेरा चुदने का बहुत मन तो रोज ही करता था, दिल करता कि किसी से सम्बन्ध बना लूं. मेरे बैंक स्टाफ और कस्टमर कई ऐसे पुरुष थे जो मुझे भूखी नज़रों से देखते थे और मुझे चोदने की तमन्ना रखते थे. हम स्त्रियों को पुरुष की वैसी मंशा भांपने में सिद्धि होती है और मैं इन पुरुषों की आँखों से समझती थी कि मुझे कौन किस नज़र से देखता है.कई बार मेरा मन भी डोल जाता कि पति से चुदे हुए हफ्ता भर हो गया, चलो कोई नयी कहानी बना लें. पर अपनी सामाजिक पद प्रतिष्ठा का ख्याल करके मैं कभी भी ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.पर मन में चाह हमेशा रही कि कोई मुझे अच्छी तरह से रगड़ मसल कर चोद डाले.

सुकांत जी के साथ सेक्स करने का अनुभव भी कमाल का रहा. हुआ यूं कि हम दोनों ने सेक्स करने का तय कर लिया तो मैंने सुकांत जी को अपने यहां इसी हेतु बुलाया. मेरे पति दूसरे शहर में नौकरी करते हैं और मैं किसी अन्य सिटी में हूं; मेरा मेरे पति से मिलना सिर्फ शनिवार रविवार ही होता है. इस तरह मैंने सुकांत जी को बुधवार को मेरे बैंक या ऑफिस में बुलाया; मैंने सोच रखा था कि सुकांत जी को लेकर अपने घर चली जाऊँगी फिर डिनर वगैरह के बाद सारी रात हमारी ही होगी.

जैसे तय हुआ था, सुकांत जी बुधवार को कोई चार बजे मेरे ऑफिस में मेरे सामने चेयर पर आकर बैठ गए, मैं तो कंप्यूटर पर चेक और दूसरे डाक्यूमेंट्स पास कर रही थी; मैंने सुकांत जी को बगैर देखे समझा कि कोई कस्टमर किसी काम से मेरे सामने आ के बैठा होगा तो मैंने अपनी रेगुलर टोन में उनसे कहा- यस प्लीज, क्या काम है बताइये?और जब मेरी नज़र उन पर पड़ी तो ‘हाय राम …’ मेरे मुंह से निकला और मेरा चेहरा शर्म से लाल पड़ गया. ये मुझे चोदने के लिए अपने शहर से आये हुए बैठे थे और मैं उनसे दूसरे ही ढंग से पेश आ रही थी.

“सॉरी शर्मा जी, मुझसे गलती हो गयी. मैंने आपको कोई और ही समझ बैठी!” मैंने खड़े होकर उन्हें नमस्कार किया और हाथ जोड़कर लजाते हुए उनसे माफ़ी मांगी.“ओके ओके सोनम जी … इट हैपेन्स … यू कैरी ऑन प्लीज!” सुकांत जी मुझसे शिष्टता से बोले.

इस तरह अपना काम ख़त्म करके मैं सुकांत जी को अपनी गाड़ी में घर ले गयी और फिर चाय नाश्ते डिनर के बाद हमारे बीच वो सब हुआ जिसके लिए वो आये थे. हां, एक बात और वो यह कि मैंने शादी के बाद अपने पति के अलावा कभी किसी पुरुष को अपने जीवन में आने नहीं प्रिया था. इस तरह मेरे विवाह के लगभग बीस साल बाद मैंने किसी परपुरुष का लण्ड अपनी चूत में लिया था. चलिए अब मैं अपनी मूल कहानी पर वापिस लौटती हूं.

मैं अपनी कहानी शुरू से कहूं तो मेरा जन्म एक साधारण निम्न मध्यम परिवार में हुआ, पिता जी एक सरकारी दफ्तर में चपरासी थे, मेरी माँ, एक बड़ी बहिन, दो बड़े भाई; बस यही मेरा परिवार था. पिताजी जिस दफ्तर में नौकरी करते थे उसी विभाग की पूरी कालोनी बसी थी जिसमें फोर्थ क्लास के क्वार्टर में हम सब रहते थे. हमारे क्वार्टर के पास ही अन्य स्टाफ के कमरे हुआ करते थे.मेरे दोनों बड़े भाई आवारा किस्म के नाकारा इंसान थे जिनके बारे में कुछ बताना बेकार है, बड़ी बहिन का विवाह मध्यप्रदेश के एक बड़े शहर में हो चुका था. अब घर में मैं सबसे छोटी सबकी लाड़ली बिटिया थी. घर की आर्थिक स्थिति का अंदाज आप खुद लगा लें जब पिताजी को दारु पीने की लत थी.

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जब मैं स्कूल में थी तभी मेरी चूत पर मुलायम झांटें उग आई थीं, मेरे चीकू जैसे मम्में अमरूद जितने हो गए थे और मेरी चूत में एक अजीब सी मीठी मीठी सी खुजली होना शुरू हो चुकी थी. मेरे व्यवहार में परिवर्तन आने लगा था. न जाने क्यों मुझे पिताजी की शर्ट पहनना अच्छा लगता, उनके उतारे हुए कपड़े पहनना मुझे बहुत अच्छा लगता.

अक्सर मैं पूरी नंगी हो जाती और पापा के उतारे हुए पसीने की गंध वाले कपड़े पहन कर रात में सोना मुझे बहुत भाता था. मम्मी डांटती थीं कि पापा के कपड़े मत पहना कर; पर मैं पापा की लाड़ली परी थी, मुझे पापा का पूरा सपोर्ट था सो मैं हर तरह की मनमानी करती रहती थी.

कुछ समय बाद मेरे मम्में इतने विकसित हो गए कि मुझे ब्रा पहननी पड़ी और मैं आस पड़ोस के मर्दों की आँख का तारा बन गयी. मेरा गोरा रंग, लम्बा कद, कटीले नयन-नख्श, रसीले होंठ, नितम्बों की मादक उठान और मेरी छातियों का वो जानलेवा जोड़ा सबकी आँखों में खटकने लगा. बहुत जल्दी मैं लड़कों और अंकल टाइप के मर्दों की घूरती नज़रों का निशाना बनने लगी. वक़्त के चलते मुझे ये भी समझ आ गया कि ये सब लोग आखिर मुझ लड़की को यों बेशर्मी से देखते क्यों हैं और मुझसे चाहते क्या हैं.

मेरे स्कूल की ड्रेस में सफ़ेद सलवार और लाल सफ़ेद रंग की चेक का कुरता हुआ करता था, कुर्ते के ऊपर सफ़ेद दुपट्टा सीने के उभार ढकने के लिए होता था. मेरे पास एक पुरानी साइकिल थी स्कूल जाने के लिए जो यदा कदा मुझे सताती रहती थी, कभी पंक्चर कभी पैडल टूटना कभी चैन टूट जाना कभी हैंडल ढीला; इन्हीं सब मुसीबतों से जूझते हुए मैंने स्कूल पास किया.

स्कूल से मेरे घर तक के रास्ते में कई स्पीड ब्रेकर्स थे जिनके पास आवारा लौंडे खड़े रहते थे. उन्हें पता था कि स्कूल से छुट्टी होने के बाद यहाँ से लड़कियों का झुण्ड साइकिल पर निकलेगा और स्पीड ब्रेकर पर उनके मम्में उछलेंगे और वे बेहद बेशर्मी से आँख गड़ा कर हमारी उछलती गेंदें देखेंगे.

मैं भी क्या कर सकती थी; बस साइकिल जितना स्लो करके स्पीड ब्रेकर के ऊपर से निकाल सकती निकाल लेती थी. फिर भी मेरे मम्में एक दो जम्प तो लगा ही लेते थे. ये आवारा लड़के यही सब देखने के लिए हमारी छातियों पर नज़रें गड़ाए खड़े रहते थे.

हाई स्कूल मैंने अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लिया और इंटरमीडिएट की ग्यारहवीं क्लास में प्रवेश ले लिया. मेरा बदन अब तक अच्छा खासा भर चुका था, मेरे चेहरे पर लुनाई आ गई थी, मेरी ब्रा का साइज़ भी बदल गया था और मैं पूरी तरह से माल बन चुकी थी. मेरी पैंटी में खुजली बढ़ने लगी थी और मेरी बुर बार बार गीली होने लगी साथ ही मम्मों में एक अजीब सी कसक, अजीब सी सनसनी मचने लगी, मीठा मीठा दर्द रहने लगा; दिल करता कोई इन्हें अच्छे से मसल डाले और आटे की तरह गूंथ दे एक बार.

मेरे जैसा ही हाल मेरी अन्य क्लासमेट्स का भी होता था और हम अक्सर सेक्स के विषय पर हंस हंस कर बातें करतीं थीं जैसे किसका पीरियड कब होता है, किसकी ब्रा का नंबर क्या है, कौन कौन अपनी बुर उंगली से सहलाती है, बुर में कहां रगड़ने सहलाने से ज्यादा मज़ा आता है, कौन कौन चुदवा चुकी है इत्यादि.

क्लास में मेरी सबसे पक्की सहेली डॉली थी. वैसे उसका नाम विगीता था पर घर में सब उसे डॉली बुलाते थे तो मैं भी उसे डॉली ही कहती थी, उसका घर भी मेरे घर के पास ही था. हम दोनों सहेलियां साथ ही अपनी अपनी साइकिल से स्कूल जातीं और साथ ही वापिस लौटतीं.

सेक्स सम्बन्धी विषयों में डॉली के पास ज्ञान का असीमित भण्डार था, उसे हर सवाल का जवाब आता था जैसे कि हम लड़कियां पीरियड्स से क्यों होती हैं, चुदाई कैसे होती है, बच्चे कैसे पैदा होते हैं इत्यादि.हम दोनों अक्सर उसी के कमरे में उसके बिस्तर पर लेट कर बातें करतीं.

एक बार की बात है हम दोनों बातों ही बातों में और आपसी छेड़ छाड़ में इतनी उत्तेजित हो गयीं की पूरी नंगी होकर एक दूसरे के जिस्म से खेलने लगीं. उसी दिन मुझे यह ज्ञान मिला कि बुर का मोती छेड़ने या चाटने से विशेष मजा आता है और तन मन चुदने को मचल उठता है.

कहानी जारी रहेगीsupport@mohakkisse.com

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पाठकों की राय

3 टिप्पणियां

मिहिर रोहण

1 month ago

सच में बहुत ही हॉट और उत्तेजक कहानी है भाई। मजा आ गया पढ़कर।

साहिल चड्डा

1 month ago

कहानियों का ये संग्रह बहुत ही अच्छा है। आपका फैन हो गया हूँ।

प्रकाश सिंह

2 months ago

अगला भाग जल्दी से अपलोड कर दो भाई, अब और इंतज़ार नहीं होता।

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