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रिश्तों में चुदाई पठन समय: 17 मिनट पढ़ा गया: 1,291 बार

हसीन गुनाह की लज़्ज़त-1

राज वीर मिड्ढा

29 Aug 2018 को प्रकाशित

हसीन गुनाह की लज़्ज़त-1
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आप इस राज़ को समझें कि सेक्स दिमाग में होता है, अर्चना में होता है, फोरप्ले में होता है। मैं अपने ही जीवन में घटी एक घटना का अपने अंदाज़ में जिक्र कर रहा हूँ, लीजिये पेश है मेरी कहानी और पाठक खुद फैसला करें कि यह अच्छी है या बुरी!

मेरा नाम राज है, मैं 42 साल का तंदरुस्त, 5’11” रंग गेहुंआ, फिट बॉडी का आदमी हूँ। मेरी पत्नी सुधा 39 साल की, स्वस्थ, 5’5″ रंग गोरा और फिगर 36-26-38 है।पंजाब के एक बड़े शहर में मेरा अपना एक छोटा सा सॉफ़्टवेयर एंड हार्डवेयर पार्ट्स सप्लाई का बिज़नेस है जिससे मुझे सब ख़र्चे और टैक्स इत्यादि निकाल के करीब दस से बारह लाख रुपये सलाना की कमाई हो जाती है। एक अपना ऑफिस है, गोदाम है, वर्कशॉप है, 9-10 लोगों का स्टाफ़ है, अपना घर है, कार है।

हमारे दो बच्चे हैं, एक बेटी 15 साल की और एक बेटा 12 साल का। हमारी 16 साल की शादीशुदा जिंदगी में हमारी सैक्स लाइफ बहुत ही बढ़िया है। बिस्तर में सुधा और मैं नए नए तज़ुर्बे करते ही रहते हैं, कभी-कभी कोई तज़ुर्बा बैक-फ़ायर भी कर जाता है पर ओवरआल सब मस्त है।

यह घटना आज से 3 साल पहले की है, जब मेरी माँ जो मेरे साथ ही रहती थी, की अचानक मृत्यु हो गई। पिता जी आठ साल पहले ही चल बसे थे लिहाज़ा सुधा, मेरी पत्नी अचानक से घर में बिल्कुल अकेली हो गई।मैं तो सुबह का निकला शाम को घर आता था, पीछे दोनों बच्चे स्कूल चले जाते थे और सुधा सारा दिन घर में अकेली रहती थी, अगर बाजार भी जाना हो तो घर ताला लगा के जाओ।

उन दिनों शहर में चोरियां बहुत होती थी और घर के मेनगेट पर लगा ताला तो जैसे चोरों को खुद आवाज़ मार कर बुलाता है।

एक दिन सुधा किसी काम से बाजार गई पर रास्ते में कुछ भूला याद आने पर आधे रास्ते से ही घर वापिस लौटी तो देखा कि चोरों ने मेनगेट का ताला तोड़ रखा था पर इससे पहले कि चोर अपनी किसी कारगुजारी को अंजाम देते, सुधा घर लौट आई और चोरों को फ़ौरन वहाँ से भागना पड़ा।पर इस काण्ड के बाद सुधा बहुत डरी-डरी सी रहने लगी जिस का सीधा असर हमारे घर-परिवार पर और हमारी सेक्स-लाइफ़ पर पड़ने लगा।

अपनी सेक्स लाइफ बिगड़ते देख मुझे बहुत कोफ़्त होती… पर क्या करता?अब मुझे इस समस्या का कोई समाधान सोचना था और बहुत जल्दी ही सोचना था पर कुछ सूझ नहीं रहा था और फिर एक दिन जैसे भगवान् ने खुद इस समस्या का समाधान भेज प्रिया।

मेरी बड़ी साली साहिबा जिनकी शादी मेरे शहर से 25-30 किलोमीटर दूर एक कस्बे में एक खाते पीते आढ़ती परिवार में हुई थी, की बेटी दिया ने B.Com पास कर ली थी लेकिन समस्या यह थी कि क़स्बे में कोई अच्छा कॉलेज नहीं था जहां मास्टर्स की जा सके और मेरे शहर में कई अच्छे कॉलेजों समेत यूनिवर्सिटी भी थी।

लिहाज़ा दिया ने मेरे शहर में एक नामी गिरामी कॉलेज में M.Com में ऐडमिशन ले लिया था लेकिन किस्मत से दिया को हॉस्टल में जगह नहीं मिल पाई थी सो मेरी साली साहिबा थोड़ी परेशान सी थी कि एक दिन मैं और सुधा उनके घर उनसे मिलने जा पहुंचे।

बातों बातों में इस बात का ज़िक्र भी आया तो मेरी पत्नी ने दिया को अपने घर रहने के लिए कह प्रिया। मैंने भी सोचा कि चलो ठीक ही है, कम से कम सुधा एक नार्मल औरत सा जीवन तो जियेगी।

मेरी शादी के समय दिया सात-आठ साल की पतली सी, मरगिल्ली सी लड़की थी जो हर वक़्त या तो रोती रहती थी या रोने को तैयार रहती थी। बहुत दफा तो वो घर आये मेहमानों के सामने ही नहीं आती थी और हम पर तो साहब ! हर वक़्त अपनी पत्नी का नशा सवार रहता था, मैंने भी दिया पर पहले कभी ध्यान नहीं प्रिया था।

लब्बोलुआब ये कि यह फाइनल हो गया कि दिया हमारे घर रह कर ही M.Com करेगी। फैसला ये हुआ कि मम्मी वाला कमरा दिया को दे प्रिया जाए ताकि वो अपनी पढ़ाई बे रोक-टोक कर सके।

इस बात से सुधा इतनी खुश हुई कि उस रात बिस्तर में सुधा ने कहर बरपा प्रिया। ऐसा बहुत दिनों बाद हुआ था लिहाज़ा मैं भी खुश था।

एक हफ्ते बाद दिया हमारे घर आ गई।उस रात डाइनिंग टेबल पर मैंने पहली बार दिया को गौर से देखा। डेढ़ पसली की मरघिल्ली सी, रोंदू सी लड़की, माशा-अल्लाह ! जवान हो गई थी, करीब 5′-4″ कद, कमान सा कसा हुआ पतला लेकिन स्वस्थ शरीर, रंग गेहुँआ, लंबे बाल, सुतवाँ नाक, पतले गुलाबी लेकिन भरे-भरे होंठ, तीखे नैननक्श और काले कजरारे नयन!फ़िगर अंदाजन 34-26-34 था।

यूं मैं कोई सैक्स-मैनियॉक नहीं पर ईमानदारी से कहूँ तो उस वक़्त मन ही मन मैं दिया के नंगे जिस्म की अर्चना करने लगा था।

खैर जी ! डिनर हुआ। सब लिविंग रूम में आ बैठे, बच्चे TV देखने लगे, दिया और सुधा दोनों बातें करने लगी और मैं इजी चेयर पर बैठा किताब पढ़ने लगा पर मेरे कान तो उन दोनों की बातों पर ही लगे हुए थे।मैंने नोटिस किया कि बोल तो सिर्फ सुधा ही रही थी और दिया तो बस हाँ-हूँ कर रही थी।

खैर, धीरे धीरे दिया हमारे परिवार का अंग होती चली गई, दोनों बच्चों को दिया पढ़ा देती थी। रात का डिनर पकाना भी दिया की जिम्मेवारी हो गई थी लेकिन अब भी दिया मेरे सामने कम ही आती थी, आती भी थी तो मुझ से बहुत कम बोलती थी, बस हां जी… नहीं जी… ठीक है जी!

मैं तो इसी बात में खुश था कि मुझे मेरी पत्नी का ज्यादा समय मिल रहा था और मेरी सेक्स लाइफ नार्मल से भी अच्छी हो गई थी। धीरे धीरे समय गुजरने लगा।

शुरू शुरू में तो दिया हर शनिवार अपने घर चली जाया करती थी और सोमवार सवेरे सीधे कॉलेज आकर शाम को घर आती थी लेकिन धीरे धीरे दिया का अपने घर जाना कम होने लगा। अब दिया दो महीने में एक बार या बड़ी हद दो बार अपने घर जाती थी।

फर्स्ट ईयर के फाइनल एग्जाम ख़त्म होने के बाद दिया तीन महीने के लिए अपने घर चली गई। करीब पांच हफ्ते बाद एक रात, एक रस्मी से अभिसार से असंतुष्ट सा मैं सुधा के नग्न शरीर पर हाथ फेर रहा था कि सुधा ने मुझ से कहा- राज… चलो, कल जाकर दिया को ले आयें। दिया के बिना मेरा दिल नहीं लग रहा और दोनों बच्चे भी उदास हैं।

मैंने हामी भर दी।

अगले दिन हम दोनों जाकर दिया को ले आये। खुश सुधा ने उस रात अभिसार में मेरे छक्के छुड़ा दिए, सुधा ने मेरा लिंग चूस-चूस कर मुझे स्खलित किया और बाद में खुद मेरा लिंग पकड़ कर, उस पर तेल लगाया और अपने हाथ से मेरा लिंग अपनी गुदा पर रख कर मुझे गुदा मैथुन के लिए आमंत्रित किया, रतिक्रिया के किसी भी आसन को उसने ‘ना’ नहीं कहा बल्कि दो कदम आगे जाकर कुछ अपनी ओर से और नया कर प्रिया।

ख़ैर! जिंदगी वापिस पटरी आ गई थी लेकिन अब एक फर्क था, अब दिया सारा दिन घर पर ही रहती थी, उसके कॉलेज खुलने में अभी डेढ़ महीना बाकी था।मैं दोपहर को खाना खाने घर आता था, पहले जब दिया कॉलेज गई होती थी तो मैं अक्सर दोपहर को ही सुधा को थाम लिया करता था, कभी रसोई में, कभी स्टोर में, कभी लॉबी में और कभी ड्राइंग रूम में भी… एक-आध बार तो बाथरूम में शावर के नीचे भी!

दिया के आने से दोपहर की इन तमाम खुराफातों में लगाम लग गई थी। कोफ़्त होती थी कभी कभी पर क्या किया जा सकता था?फिर भी दांव लगा कर कभी-कभार मैं सुधा से छोटी-मोटी चुहलबाज़ी तो कर ही लेता था, जैसे पास से गुज़रती सुधा के नितम्बों को सहला देना, उसके उरोजों पर हल्के से हाथ फेर देना, निप्पल दबा देना, रसोई में सब्ज़ी बनाती सुधा से सट कर खड़े होकर कढ़ाई में सब्ज़ी देखने के बहाने सुधा के कान के पास एक छोटा सा चुम्बन ले लेना या उसकी साड़ी के पल्लू की आड़ में उसका हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर दबा देना।

मेरे ऐसा करने पर सुधा दिखावटी गुस्सा दिखाती जरूर थी लेकिन तिरछी आँखों से मुझे देखते हुये उसके होंठों पर स्वीकृति की एक मौन सी मुस्कान भी होती थी।

दिन बढ़िया गुज़र रहे थे लेकिन मैं दिया में और उसके मेरे प्रति व्यवहार में कुछ कुछ फर्क महसूस कर रहा था। मैं अक्सर नोट करता कि डाइनिंग टेबल पर खाना खाते वक़्त या लिविंग रूम में टी.वी देखते वक़्त या कभी कभी कोई किताब पढ़ते-पढ़ते मैं जब जब सिर उठा कर दिया की ओर देखता तो उसे मेरी ओर ही देखते पाता और जैसे ही मेरी दिया की नज़र से नज़र मिलती तो वो या तो नज़र नीची कर लेती या कहीं और देखने लगती।

मुझे कुछ समय के लिए उलझन तो होती पर जल्दी ही मेरा ध्यान किसी और बात पर चला जाता और बात आई-गई हो जाती।

बरसात का मौसम आ गया था, बहुत निकम्मी किस्म की गर्मी पड़ रही थी, जिस दिन बरसात होती उस दिन तो मौसम ठीक रहता, अगले दिन जब धूप निकलती तो उमस के मारे जान निकलने लगती, जगह जगह खड़ा पानी बास मारने लगता और मक्खी-मच्छर पैदा करने की ज़िंदा फैक्टरी बन जाता।एयर कंडीशनड कमरों में ही जिंदगी सिमटी पड़ी थी।

उसी मौसम में एक दिन दिया के कमरे के A.C की गैस लीक हो गई। बच्चों का बैडरूम छोटा था और उसमें तीसरे बेड की जगह नहीं थी, ड्राइंग रूम और लिविंग रूम तो रात को सोने के किये डिज़ाइन्ड ही नहीं थे तो एक ही चारा बचता था कि जब तक दिया के कमरे का A.C रिपेयर हो कर नहीं आता, दिया का बेड हमारे बैडरूम में हमारे बेड की बगल में ही लगाया जाए।

ऐसा ही हुआ और ऐसा होने से हम पति-पत्नी की रात वाली रासलीला पर टेम्परेरी बैन लग गया था!पर क्या करते… मज़बूरी थी।

हमारे बैडरूम में बेड के साथ ही लेफ्ट साइड बाथरूम का दरवाज़ा था और मेरी पत्नी बैड के लेफ्ट साइड सोना पसंद करती थी और मैं राईट साइड सोता था, हमारे बेड के साथ ही राईट साइड दिया का फोल्डिंग बेड लगाया गया था। रात आती, खाना-वाना खा कर हम लोग सोने के लिए बैडरूम में आते।

सुधा मेरे बायें और दिया मेरे दायें… ये दोनों बातें करने लगती और मैं बीच में ही सो जाता।

दो-एक दिन बाद एक रात को अचानक मेरी आँख खुली तो पाया कि दिया बाईं करवट सो रही थी यानी उसका मुंह मेरी ओर था और उसका दायां हाथ मेरी छाती पर था।

मैंने सिर उठा कर देखा तो सुधा को घनघोर नींद के हवाले पाया। मैंने धीरे से दिया का हाथ अपनी छाती से उठाया और उस हाथ उस की बगल पर रख प्रिया।

पर नींद बहुत देर तक नहीं आई, दिल में बहुत उथल-पुथल सी चल रही थी।

क्या दिया ने जानबूझ कर ऐसा किया था? अगर हाँ तो क्यों? क्या दिया मेरे साथ… सोच कर झुरझुरी सी उठी और अचानक ही मेरे लिंग में तनाव आ गया।इसी उहपोह में जाने कब मेरी आँख लग गई।

दिन चढ़ा, सब कुछ अपनी जगह पर, हर चीज़ नार्मल सी थी पर मेरे दिल में इक अनजान सी फ़ीलिंग थी, रह रह कर दिया के हाथ की छुअन मुझे अपनी छाती पर फील हो रही थी और रह रह कर मेरे लिंग में तनाव आ रहा था।उस दिन मैंने अपनी शादी के बाद पहली बार बाथरूम में नहाते समय हस्त मैथुन किया।

अगली रात आई, फिर वही सोने का अरेन्जमेन्ट, सुधा डबलबेड के बाईं ओर, मैं दाईं ओर और दिया का फोल्डिंग बेड हमारे डबलबेड के दाईं ओर सटा हुआ और मुझ में और दिया में ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट का फासला।

आज मैं अभी किताब ही पढ़ रहा था कि ये दोनों सोने की तैयारी करने लगी। जल्दी सोने का कारण पूछने पर दिया ने बताया कि आज दोनों बाज़ार गईं थी, थक गई हैं।

पन्द्रह बीस मिनट बाद मैंने लाईट बंद की और खुद उल्टा हो कर सोने की कोशिश करने लगा, उल्टा बोले तो पेट के बल! पन्द्रह-बीस मिनट ही बीते होंगे कि दिया का हाथ आज़ फिर से मेरे ऊपर आ पड़ा लेकिन आज़ चूंकि मैं उल्टा पड़ा था सो इस बार उसका हाथ मेरी पीठ पर पड़ा।

तीन चार मिनट बाद दिया ने अपना हाथ मेरी पीठ से उठा लिया और खुद सीधी होकर, मतलब पीठ के बल लेट कर सोने का उपक्रम करने लगी। उसका मेरी ओर वाला हाथ मतलब बायां हाथ उसके सिर के पास सिरहाने पर ही पड़ा था। मेरा मुंह दिया की ओर ही था और मेरा और दिया का फासला ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट का रहा होगा।

अचानक मैंने अपने बायें हाथ को दिया पर रख प्रिया… मेरा दिल पसलियों में धाड़-धाड़ बज़ रहा था।कोई हरकत नहीं.. ना मेरी ओर से… ना दिया की ओर से…

अचानक दिया ने सिर उठाया और मेरी ओर ध्यान से देखने लगी, मींची आँखों में मैं सोने की एक्टिंग करने लगा। एक डेढ़ मिनट मुझे ध्यान से देखने के बाद जब उसे यकीन हो गया कि मैं गहरी नींद में सो रहा था तो उसने अपने हाथ पर जो मेरा हाथ थामे था, चादर डाल थी और चादर के नीचे मेरे हाथ की उँगलियों को एकके बाद एक करके चूमने लगी।

उम्म्ह… अहह… हय… याह… उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल था, तनाव के कारण मेरा लिंग जैसे फटने की कगार पर था। मैं दिया के हाथ का स्पंदन महसूस कर सकता था पर मैंने अपनी ओर से कोई हरकत नहीं की।करीब आधे घंटे बाद दिया ने ऐसा करना बंद किया।

मैंने सर उठा कर देखा तो लगा कि दिया सो गई थी शायद! मेरा हाथ अब भी उसके हाथ में जकड़ा हुआ था। ऐसे ही जाने कब मैं सचमुच नींद के आगोश में चला गया।

सुबह उठा तो पाया कि सुधा और दिया उठ कर कब की जा चुकी थी, तभी सुधा अख़बार ले कर आ गई। दिल में अनाम सी ख़ुशी लिए मैंने जिंदगी का एक नया दिन शुरू किया।

तभी दिया भी बैडरूम में चाय की ट्रे लेकर आई, नहाई-धोई, सफ़ेद पजामी सूट में ताज़ा ताज़ा शैम्पू किये बालों से मनभावन सी खुशबू उड़ाती एकदम ताज़ा दम, सफ़ेद सूट में से सफ़ेद ब्रा साफ़ साफ़ उजाग़र हो रही थी।

जैसे ही मेरी दिया की आँख से आँख मिली, दिया की नज़र झुक गई और क्षण भर को ही ग़ुलाबी भरे भरे होंठों पर एक गुप्त सी मुस्कान आकर लुप्त हो गई।रात वाली बात याद आते ही मेरे लिंग में जान सी आने लगी।

जैसे ही दिया बैठने लगी तो मेरी वाली साइड से सफ़ेद पजामी में से गहरे रंग की पैंटी साफ़ साफ़ झलकने लगी। एक क्षण में ही मेरा लिंग फुल जोश में फुंफ़कारने लगा और मैंने अपने साथ बैठी सुधा का हाथ चादर के अंदर ही पकड़ कर अपने लिंग पर रख कर ऊपर से अपने हाथ से दबा लिया।

सुधा चिंहुक उठी, लगी अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने… लेकिन मैं जाने दूं तब ना! जैसे ही सुधा ने मुझे देख कर आँखें तरेरी तो दिया ने पूछा- क्या हुआ मौसी?‘कुछ नहीं…’ कह कर सुधा ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश बंद कर दी और चादर के नीचे से मेरा लिंग जोर से पकड़ लिया।

मैं अपने मुक्त हुए हाथ से सुधा की जाँघ जांचने लगा।

सारा दिन जैसे हवाओं के हिण्डोले पर बीता, जो मेरे और दिया के बीच चल रहा था, उस बारे में सारा दिन मेरे अपने ही अंदर तर्क कुतर्क चलते रहे।

एक बात तो पक्की थी कि दिया की तो ख़ैर कच्ची उम्र थी पर मैं जो कर रहा था वो सामाजिक और नैतिक दृष्टि से गलत था और मैं खुद जानता था कि मैं गलत कर रहा था।लेकिन वो जैसा कहते हैं कि गुनाह की लज़्ज़त मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी।

उम्मीद है कि आपको मेरी इस पारिवारिक सेक्स स्टोरी में मजा आ रहा होगा।कहानी जारी रहेगी।support@mohakkisse.com

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हसीन गुनाह की लज़्ज़त

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