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माँ की चुदाई पठन समय: 11 मिनट पढ़ा गया: 1,139 बार

धोबी घाट पर माँ और मैं -16

जलगाँव बॉय

18 Mar 2022 को प्रकाशित

धोबी घाट पर माँ और मैं -16
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चूमा-चाटी खत्म होने के बाद माँ ने पूछा- और बेटे, कैसा लगा माँ की चूत का स्वाद? अच्छा लगा या नहीं?‘हाय माँ, बहुत स्वादिष्ट था, सच में मजा आ गया।’‘अच्छा, चलो मेरे बेटे को अच्छा लगा, इससे बढ़ कर मेरे लिए कोई बात नहीं।’

‘माँ, तुम सच में बहुत सुन्दर हो। तुम्हारी चूचियाँ कितनी खूबसूरत है। मैं… मैं क्या बोलूँ? माँ, तुम्हारा तो पूरा बदन खूबसूरत है।’‘कितनी बार बोलेगा यह बात तू मुझसे? मैं तेरी आँखें नहीं पढ़ सकती क्या? जिनमें मेरे लिये इतना प्यार छलकता है।’

मैं माँ से फ़िर पूरा चिपक गया, उसकी चूचियाँ मेरी छाती में चुभ रही थी और मेरा लौड़ा अब सीधा उसकी चूत पर ठोकर मार रहा था।हम दोनों एक दूसरे की आगोश में कुछ देर तक ऐसे ही खोये रहे।फिर मैंने अपने आप को अलग किया और बोला- माँ, एक सवाल करूँ?‘हां पूछ, क्या पूछना है?’‘माँ, जब मैं तुम्हारी चूत चाट रहा था, तब तुमने गालियाँ क्यों निकाली?’‘गालियाँ और मैं? मैं भला क्यों गालियाँ निकालने लगी?’‘नहीं माँ, तुम गालियाँ निकाल रही थी, तुमने मुझे कुत्ता कहा, और, और खुद को कुतिया कहा, फिर तुमने मुझे हरामी भी कहा।’‘मुझे तो याद नहीं बेटा कि ऐसा कुछ मैंने तुम्हें कहा था। मैं तो केवल थोड़ा सा जोश में आ गई थी और तुम्हें बता रही थी कि कैसे क्या करना है। मुझे तो एकदम याद नहीं कि मैंने ये शब्द कहे हैं।’

‘नहीं माँ, तुम ठीक से याद करने की कोशिश करो। तुमने मुझे हरामी या हरामजादा कहा था, और खूब जोर से झड़ गई थी।’‘बेटा, मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नहीं है, फिर भी अगर मैंने कुछ कहा भी था तो मैं अपनी ओर से माफी माँगती हूँ, आगे से इन बातों का ख्याल रखूँगी।’‘नहीं माँ, इसमें माफी माँगने जैसी कोई बात नहीं है। मैंने तो जो तुम्हारे मुँह से सुना, उसे ही तुम्हें बता प्रिया। खैर जाने दो, तुम्हारा बेटा हूँ, अगर तुम मुझे दस बीस गालियाँ दे भी दोगी तो क्या हो जायेगा?’‘नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं है। अगर मैं तुझे गालियाँ दूँगी तो, हो सकता है तू भी कल को मेरे लिये गालियाँ निकाले और मेरे प्रति तेरा नजरिया बदल जाये, तू मुझे वो सम्मान ना दे, जो आज तक मुझे दे रहा है।’‘नहीं माँ, ऐसा कभी नहीं होगा। मैं तुम्हें हमेशा प्यार करता रहूँगा और वही सम्मान दूँगा, जो आज तक प्रिया है। मेरी नजरों में तुम्हारा स्थान हमेशा ऊँचा रहेगा।’‘ठीक है बेटा, अब तो हमारे बीच एक दूसरी तरह का संबंध स्थापित हो गया है। इसके बाद जो कुछ होता है, वो हम दोनों की आपसीसमझदारी पर निर्भर करता है।’

‘हां माँ, तुमने ठीक कहा, पर माँ अब इन बातों को छोड़ कर क्यों ना असली काम किया जाये? मेरी बहुत इच्छा हो रही है कि मैं तुम्हें चोदूँ। देखो ना माँ, मेरा डण्डा कैसा खड़ा हो गया है?’‘हां बेटा, वो तो मैं देख ही रही हूँ कि मेरे लाल का हथियार कैसा तड़प रहा है माँ का मालपुआ खाने को! पर उसके लिये तो पहले माँ को एक बार फिर से थोड़ा गर्म करना पड़ेगा बेटा।’

‘हाय माँ, तो क्या अभी तुम्हारा मन चुदवाने का नहीं है?’‘ऐसी बात नहीं है बेटे, चुदवाने का मन तो है पर किसी भी औरत को चोदने से पहले थोड़ा गर्म करना पड़ता है। इसलिये बुर चाटना, चूची चूसना, चुम्मा चाटी करना और दूसरे तरह के काम किये जाते हैं।’‘इसका मतलब है कि तुम अभी गर्म नहीं हो और तुम्हें गर्म करना पड़ेगा ये सब करके?’‘हां, इसका यह मतलब है।’‘पर माँ तुम तो कहती थी, तुम बहुत गर्म हो और अभी कह रही हो कि गर्म करना पड़ेगा?’‘अबे उल्लू, गर्म तो मैं बहुत हूँ पर इतने दिनों के बाद इतनी जबरदस्त चूत चटाई के बाद तूने मेरा पानी निकाल प्रिया है, तो मेरी गर्मी थोड़ी देर के लिये शांत हो गई है। अब तुरन्त चुदवाने के लिये तो गर्म तो करना ही पड़ेगा ना। नहीं तो अभी छोड़ दे, कल तक मेरी गर्मी फिर चढ़ जायेगी और तब तू मुझे चोद लेना।’

‘ओह नहीं माँ, मुझे तो अभी करना है, इसी वक्त।’‘तो अपनी माँ को जरा गर्म कर दे और फिर मजे ले चुदाई का।’मैंने फिर से माँ की दोनों चूचियाँ पकड़ ली और उन्हें दबाते हुए उसके होंठों से अपने होंठ भिड़ा दिये।माँ ने भी अपने गुलाबी होंठों को खोल कर मेरा स्वागत किया और अपनी जीभ को मेरे मुँह में पेल प्रिया।माँ के मुँह के रस में गजब का स्वाद था।

हम दोनों एक दूसरे के होंठो को मुँह में भर कर चूसते हुए आपस में जीभ से जीभ लड़ा रहे थे। माँ की चुचियों को अब मैं जोर-जोर से दबाने लगा था और अपने हाथों से उसके माँसल पेट को भी सहला रह था।उसने भी अपने हाथों के बीच में मेरे लंड को दबोच लिया था और कस-कस के मरोड़ते हुए उसे दबा रही थी।माँ ने अपना एक पैर मेरी कमर के ऊपर रख प्रिया था और अपनी जांघों के बीच मुझे बार बार दबोच रही थी।

अब हम दोनों की सांसें तेज चलने लगी थी मेरा हाथ अब माँ की पीठ पर चल रहा था और वहां से फिसलते हुए सीधा उसके चूतड़ों परचल गया।अभी तक तो मैंने माँ के मक्खन जैसे गुदाज चूतड़ों पर उतना ध्यान नहीं प्रिया था, परन्तु अब मेरे हाथ वहीं पर जाकर चिपक गए थे। ‘ओह, चूतड़ों को हाथों से मसलने का आनन्द ही कुछ और है। मोटे मोटे चूतड़ों के माँस को अपने हाथों में पकड़ कर कभी धीरे, कभी जोर से मसलने का अलग ही मजा है।चूतड़ों को दबाते हुए मैंने अपनी उंगलियों को चूतड़ों के बीच की दरार में डाल प्रिया और अपनी उंगलियों से उसके चूतड़ों के बीच की खाई को धीरे धीरे सहलाने लगा।

मेरी उंगलियाँ माँ की गांड के छेद पर धीरे-धीरे तैर रही थी। माँ की गांड का छेद एकदम गर्म लग रहा था।

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माँ, जो मेरे गालों को चूस रही थी, अपना मुँह हटा कर बोल उठी- यह क्या कर रह है रे, गांड को क्यों सहला रहा है?‘हाय माँ, तुम्हारी ये देखने में बहुत सुंदर लगती है, सहलाने दो ना!‘चूत का मजा लिया नहीं, और चला है गांड का मजा लूटने।’ कह कर माँ हंसने लगी।मेरी समझ में तो कुछ आया नहीं पर जब माँ ने मेरे हाथों को नहीं हटाया तो मैंने माँ की गांड के पकपकाते छेद में अपनी उंगलियाँचलाने की अपने दिल की हसरत पूरी कर ली और बड़े आराम से धीरे धीरे कर के अपनी एक उंगली को हल्के हल्के उसकी गांड के गोल सिकुड़े हुए छेद पर धीरे धीरे चल रहा था।

मेरी उंगली का थोड़ा सा हिस्सा भी शायद गांड में चला गया था पर माँ ने इस पर कोई ध्यान नहीं प्रिया था।मैं कुछ देर तक ऐसे ही गांड के छेद को सहलाता और चूतड़ों को मसलता रहा, मेरा मन ही नहीं भर रहा था।

तभी माँ ने मुझे अपनी जांघों के बीच और कस के दबोच कर मेरे गालों पर एक प्यार भरी थपकी लगाई और मुँह बिचकाते हुए बोली- चूतीये, कितनी देर तक चूतड़ और गांड से ही खेलता रहेगा, कुछ आगे भी करेगा या नहीं? चल आ जा और जरा फिर से चूची को चूस तो।मैंने माँ की इस प्यार भरी झिड़की को सुन कर अपने हाथों को माँ के चूतड़ों पर से हटा लिया और मुस्कुराते हुए माँ के चेहरे को देख प्यार से उसके गालों पर चुम्बन करके बोला- जैसी मेरी माँ की इच्छा।और उसकी एक चूची को अपने हाथों से पकड़ कर दूसरी चूची से अपना मुँह सटा प्रिया और निप्पलों को मुँह में भर कर चूसने का काम शुरु कर प्रिया।माँ की मस्तानी चूचियों के निप्पल फिर से खड़े हो गये और उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगी। मैं अपने हाथों को उसकी एक चूची पर से हटा के नीचे उसकी जांघों के बीच ले गया और उसकी बुर को अपनी मुठ्ठी में भर के जोर से दबाने लगा।बुर से पानी निकलना शुरु हो गया था, मेरी उंगलियों में बुर का चिपचिपा रस लग गया।

मैंने अपनी बीच वाली उंगली को हल्के से चूत के छेद पर धकेला, मेरी उंगली सरसराती हुई बुर के अन्दर घुस गई। आधी उंगली को चूत में पेल कर मैंने अन्दर-बाहर करना शुरु कर प्रिया।माँ की आँखें एकदम से नशीली होती जा रही थी और उसकी सिसकारियाँ भी तेज हो गई थी।मैं उसकी एक चूची को चूसते हुए चूत के अन्दर अपनी आधी उंगली को गचगच पेले जा रहा था।

माँ ने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी चूचियों पर दबा प्रिया और खूब जोर जोर से सिसकाते हुए बोलने लगी- ओह… सीई… स्स्स्स्स… एएयी… चूस, जोर से निप्पल को काट ले, हरामी, जोर से काट ले मेरी इन चूचियों को हाय!और मेरी उंगली को अपनी बुर में लेने के लिए अपने चूतड़ों को उछालने लगी थी।माँ के मुख से फिर से हरामी शब्द सुनकर मुझे कुछ बुरा लगा, मैंने अपने मुँह को उसकी चूचियों पर से हटा प्रिया और उसके पेट कोचूमते हुए उसकी फ़ुद्दी की तरफ बढ़ गया।

चूत से उंगलियाँ निकाल कर मैंने चूत की दोनों फांकों को पकड़ कर फैलाया और जहाँ कुछ सेकंड पहले तक मेरी उंगलियाँ थी, उसीजगह पर अपनी जीभ को नुकीला करके डाल प्रिया।जीभ को बुर के अन्दर लिबलिबाते हुए मैं भगनासा को अपनी नाक से रगड़ने लगा।

माँ की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, अब उसने अपने पैरों को पूरा खोल प्रिया था और मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाती हुई चिल्लाई- चाट साले, मेरी बुर को चाट, ऐसे ही चाट कर खा जा, एक बार फिर से मेरा पानी निकाल दे हरामी, बुर चाटने में तो तू पूरा उस्तादनिकला रे! चाट ना अपनी माँ की चूत को, मैं तुझे चुदाई का राजा बना दूँगी, मेरे चूत-चाटू राजा… आआ साले।

माँ की बाकी बातें तो मेरा उत्साह बढ़ा रही थी पर उसके मुँह से अपने लिये गाली सुनने की आदत तो मुझे थी नहीं, पहली बार माँ केमुँह से इस तरह से गाली सुन रहा था, थोड़ा अजीब-सा लग रहा था, पर बदन में एक तरह की सिहरन भी हो रही थी।

मैंने अपने मुँह को माँ की बुर पर से हटा प्रिया और माँ की ओर देखने लगा।कहानी जारी रहेगी।support@mohakkisse.com

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