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भाभी की चुदाई पठन समय: 15 मिनट पढ़ा गया: 561 बार

देवर भाभी की कामवासना और चुत चुदाई-2

दिनेश रोहट बिहार

14 Apr 2026 को प्रकाशित

देवर भाभी की कामवासना और चुत चुदाई-2
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देवर भाभी सेक्स कहानी के पहले भागदेवर भाभी की कामवासना और चुत चुदाई-1में आपने पढ़ा कि पड़ोस की एक सुनयना भाभी मुझे एक अन्य भाभी की उनके देवर से सेक्स की आप बीती कहानी सुना रही थी.

सुनिधि भाभी सुनयना से बता रही थी- हमारा एक बाथरूम ऐसी जगह था, जिसका दरवाजा स्टडी में खुलता तो एक दरवाजा उनके रूम में खुलता था. कभी कभी तो सबके मौजूदगी मैं बाथरूम जाती तो देवर अपने रूम से उस बाथरूम में घुस आते और हम दोनों चुदाई कर लिया करते थे.

पर कहते हैं न कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते. एक दिन मैं पकड़ी ही गई. बात बढ़ते बढ़ते तलाक तक पहुँच गई. परंतु देवर जी ने मेरा साथ देते हुए कहा कि भैया अगर आप भाभी को छोड़ना चाहते हैं, तो बेशक छोड़ दें, परंतु मैं इनका साथ नहीं छोडूंगा, मैं उनसे कोर्ट मैरिज कर लूँगा. बुद्धिमानी तो इसी में है कि आप साथ रहें. जब आप कामसुख से भाभी को तृप्त कर ही नहीं पा रहे हैं, तो क्यों किच किच किये हुए हैं. इस उम्र में खाना भी मयस्सर नहीं होगा.

हनुमंत भाई साहब को यथार्थ का ज्ञान हुआ. उन्होंने भी परिस्थिति से समझौता करना ज्यादा श्रेयस्कर समझा.

इस तरह सुनयना भाभी ने सुनिधि भाभी कहानी खत्म की और आगे अपनी कहानी शुरू की कि पता नहीं इसके बाद क्यों हनुमन्त भाई साहब के प्रति मेरे मन में सहानुभूति जागृत हो चुकी थी. मेरे दिल के कोने में एक कोमल भावना के बीज का बीजारोपण हो चुका था. पता नहीं क्यों मैं भाई साहब का अतिरिक्त ख्याल रखने लगी थी.

एक बार की बात है कि सिन्हा साहब और हमारी फैमिली के सभी सदस्यों का बाहर खाना खाने का मूड बना. सभी सदस्य होटल में एक गोल मेज के चारों तरफ बैठने लगे. अंत में दो कुर्सियाँ खाली थीं, एक मेरे पति के बगल में और दूसरी भाई साहब के बगल में. मैंने अपने बड़े बेटे से कहा कि जाओ पापा के बगल में बैठ जाओ. मैं वाशरूम की तरफ चली गई. वाशरूम से लौटी तो एक ही कुर्सी खाली रहने के कारण उसके पीछे कुछ देर खड़ी रही. मेरे पति बहुत ही नेक दिल इंसान हैं बोले कि अरे वहीं पर बैठ जाओ.

आखिर अंधे को क्या चाहिए आँखें.. मुझे भी मनमाफिक सीट पर बैठने का मौका मिल गया था. सब कोई अपने अपने पसंद के मेनू आर्डर कर रहे थे, पर भाई साहब का कोई आर्डर नहीं कर रहा था. भाई साहब को मक्खन रोटी और वेज फ्रेंजी काफी पसंद है, सो उनके मन के लायक मेनू मैंने आर्डर किया.सब्जी परोसते वक्त जानबूझ कर अपनी चूचियों को उनके बदन से टकरा देती थी. इस तरह पहला ग्रीन सिग्नल उनको मैंने दे प्रिया.

दूसरे दिन पतिदेव नौकरी के सिलसिले में राँची से बाहर चले गए.

उसके कुछ दिनों के बाद फिल्म देखने का प्रोग्राम बना. तय हुआ कि फिल्म रात्रि के 9 से 12 के शो में देखी जाए. जाने के क्रम में हम, भाभी, उनकी बहू, बेटी तथा देवर मारुति कार से, तो भाई साहब स्कूटी से हॉल पहुँचे. हॉल में बैठने का क्रम था.. देवर, भाभी, बेटी, बहू, मैं और मेरे बगल में भाई साहब. फिल्म के बीच बीच में मैं थोड़ा घूम कर बहू से बात करती, जिससे कि वो मेरे दूसरे हाथ को न देख सके. जब भी मैं घूम कर बहू से बात करती तो दूसरा हाथ भाई साहब की जांघों पर रख देती थी. ऐसा जब दो तीन बार हुआ तो भाई साहब ने भी हिम्मत कर मेरे हाथों को सहलाना शुरू कर प्रिया. एक बार तो उन्होंने अपनी बगल में खुजलाते हुए चुनरी के नीचे से हाथ नीचे ले जाकर मेरी चूचियों को भी सहला प्रिया था.

लौटते समय मैंने कहा कि मैं हवा खाते हुए जाना चाहूँगी, सो मैं भाईसाहब की स्कूटी के पीछे बैठ गई. भाईसाहब भी स्कूटी का स्पीड कम कर चला रहे थे, जिससे कि मारुति हम लोगों से आगे चली जाए. उन लोगों के आगे बढ़ते ही मैंने अपनी छाती उनकी पीठ पर सटाते हुए कस कर अपने बाहुपाश में जकड़ लिया, मेरी दोनों चूचियाँ उनकी पीठ से दब कर उन्मुक्त होने के लिए छटपटा रही थीं.

उसी तरह कब हम दोनों अपने अपार्टमेंन्ट पहुँच गए, पता ही नहीं चला और वही मुद्रा आपके सीसीटीवी में कैद हो गई.

दूसरी सीडी होली के समय की है. होली का व्यंजन बना कर लगभग 11 बजे मैं सिन्हा भाई साहब के फ्लैट में गई. वहाँ भी सब लोग होली खेलने के लिए तैयार हो रहे थे. मैं सबको खींचते हुए कार पार्किंग एरिया में ले आई. सभी कारों को वहाँ से हटवा कर होली खेलने के लिए जगह बनाई गई. मैंने जानबूझ कर सबसे पहले बलवन्त को टार्गेट करते हुए उन पर रंग उड़ेल प्रिया, सभी लोग उन्हें रंग से सराबोर करने लगे.

हनुमन्त भाई साहब अकेले हो गए थे, मैं रंग लेकर उनको लगाने बढ़ी, तो उन्होंने रंग के डर से अपनी आँखें बंद कर लीं. मैंने रंग तो डाला ही, उनकी लुंगी को खींचते हुए उनके लंड को भी रंग से नहला भी प्रिया. उन्होंने भी मुझे रंगते हुए मेरी चूचियों को मसल प्रिया तथा हाथ डालकर सहला भी प्रिया.

फिर मैंने भाईसाहब से कहा कि मेरे पतिदेव को बुला लें होली खलेने के लिए, वो कहीं बैठकर नॉवेल पढ़ रहे होगें, उन्हें तो नॉवेल और एक बॉटल पानी दे दो.. फिर सारा दिन उसी में व्यस्त रहेंगे.

भाई साहब मेरे पति को पकड़ कर ले आए, फिर सबने उन्हें रंग से रंग प्रिया. उन्होंने किसी को रंग नहीं डाला और बोले- हो गया होली.. अब चला जाए.

ऊपर जाकर मुझसे बोले- तुम नहा लो.. मैं नॉवेल का एक पेज खत्म करके नहाऊँगा.

मैं उनसे बोली कि आइये पहले आपका रंग छुड़ा दूँ.. और खींच कर बाथरूम ले आई. उनकी गर्दन से रंग छुड़ाते हुए उनका चड्डी को मैंने उतार प्रिया. उनके लंड को मैं अपने चूचियों के बीच में दबाने लगी.पतिदेव का लंड तन कर अपने लक्ष्य को तलाश करने लगा. मैंने तुरंत घोड़ी बन कर लंडदेव को सवारी करने का न्यौता दे प्रिया. नल को चला प्रिया, जिससे फच्च फच्च की आवाज बाहर न जाए.मैं तो भाई साहब के साथ छेड़खानी करने के कारण गरमाई हुई थी ही, सो लंड के कुछ ही प्रहार से स्खलित हो गई. पूरी रसधार मेरे पैरों से होते हुए नीचे जाने लगी.

मैंने उनसे रुकने के लिए कही. आज्ञाकारी बच्चे की तरह वो तुरंत रुक कर खड़े हो गए, मुझे भी खड़ा कर प्रिया, परंतु तुरंत ही उनको शरारत सूझी और एक पैर उठा कर फिर अपना लंड चूत में पेल प्रिया. फव्वारे के पानी के कारण चूत को गीला करने वाला रस धुल गया था तथा स्खलित होने के कारण मेरी बुर का घेरा थोड़ा छोटा हो चुका था. अचानक हुए इस हमले ने मेरा तो सर ही चकरा गया. चूत सूख जाने के कारण लंड अन्दर नहीं जा रहा था, सो उन्होंने ढेर सारा तेल मेरी चूत में और लंड के ऊपर लगा कर चूत के छेद के ऊपर रख कर ठेल प्रिया. इस बार आधा लंड अन्दर घुस गया था. दूसरे प्रयास में पूरा लंड अन्दर हो गया था.

उन्होंने अपना लंड पेलना जारी रखा. उफ्फ ये कैसा मदहोश कर देने वाला अनुभव था. नीचे से गरमा गरम लंड चूत पेल रहा था तो होली के समय की गुलाबी ठंडक और ऊपर से फव्वारा से गिरता पानी गजब का एहसास दिला रहा था. नल से गिरते हुए पानी के बीच भी “चट फच्च..” की आवाज बाथरूम के मिजाज को और रंगीन बना रहा था. चुदाई के कारण मुँह से सीत्कार निकल रही थी या गुलाबी ठंडक के कारण.. समझ ही नहीं आ रहा था. मेरा शरीर भी सिहर सिहर जा रहा था. ये सब चुदाई के कारण था या ठंडक के कारण था, कहना मुश्किल था. पूरा बाथरूम “आँ उँ हुँ हुँ..” के स्वर लहरियों से गुँजायमान था.

कुछ समय बाद दोनों एक साथ झड़ गए मैं खड़े खड़े ही उनको पकड़ कर निढाल हो गई, न पकड़ती तो गिर ही जाती. फिर जल्दी जल्दी नहा कर बाहर आई. हम दोनों अपनी होली चुदाई करके ही मनाते हैं. अभी तक इनके साथ रंगों की होली कभी नहीं खेली हूँ.

तीसरी सीडी में लिफ्ट में शरारत करते हुए दिखाया गया है.

उस समय की बात है, जब मेरे पति नौकरी के सिलसिले में बाहर गए थे. सुनिधि भाभी सपरिवार देवर के साथ भोपाल गई हुई थीं. भाई साहब को छुट्टी नहीं मिली, जिस कारण भाभी कह कर गईं कि थोड़ा भाई साहब को देखती रहिएगा, अगर हो सके तो खाना बना कर बाई के हाथ भिजवा दीजियेगा.

पहला दिन तो भाभी के कहे अनुसार ही खाना भिजवा प्रिया. परंतु दूसरे दिन सुबह फोन कर चाय लेकर पहुँच गई. कह कर आई कि भैया जल्दी तैयार हो जाइए.. गरमा गरम खाना खाकर ही ऑफिस जाइएगा.

बाई ऑफिस जाने वक्त तक नहीं आई. मैं नीचे भाईसाहब को बुलाने चली गई. पहले तो भाईसाहब ने मना कर प्रिया, पर बाद में बोले कि आप चलिए मैं आता हूँ. मैं जिद कर बैठी कि नहीं साथ चलिए.वो मान गए.

लिफ्ट में जब वो चढ़े तो कुछ इस तरह खड़े थे कि मैं घुस नहीं पा रही थी सो मैंने हाथ बढ़ा कर उनको पीछे ठेला पर अनायास लुंगी के नीचे छुपे लंड को छू गया. वही सीसीटीवी में कैद हो गया था.

मैंने कहा- भाभी उसके बाद क्या हुआ?सुनयना भाभी बोलीं- मैंने उनसे पूछा कि वो अभी खाना पसंद करेंगे.भाई साहब बोले कि नहीं पहले चाय पिला दें फिर आधा घंटे बाद खाना खा लूँगा.

उनको चाय देने के बाद कहा कि भाईसाहब आप चाय पी लें, खाना भी तैयार है, जब तक क्या मैं नहा लूँ.

कभी कभी मैं बहू के कपड़े पहन लिया करती हूँ. उस दिन भी नहाने के बाद मैंने अपनी बहू का गहरे रंग का टॉप और हल्के रंग का छोटी स्कर्ट पहनी हुई थी. पर पैंटी और ब्रा नहीं पहनी थी. बिना पैंटी ब्रा के घर में घूमना मुझे बहुत अच्छा लगता है. नीचे से चूत को हवा का लगना तो कभी कूद कूद कर चूचियों को उछालना अच्छा लगता है.

मेरे घर में प्याज लहसुन किचन में रखना वर्जित है, पर जिसे खाना होता है वो बरामदे में रखे प्याज के अलग से रखे हंसिया से काट कर खा सकता है.

सब्जी तथा ग्रीन सलाद परस कर भैया की प्रिया और पूछा कि प्याज लेना चाहेंगे तो उन्होंने हाँ में सर हिलाया.

मैं बालकनी में रखी प्याज को वहीं वाशवेसिन में धोकर झुक कर काटने लगी. झुकने के कारण मेरा स्कर्ट थोड़ा ऊपर चढ़ गया और पीछे से भाईसाहब को मेरा खजाना दृष्टिगोचर होने लगा था. मेरा गदराया हुआ चूतड़ों की घाटियां तथा दोनों जांघों के बीच में दबी सिकुड़ी हुई मेरी चूत उनको लुभाने लगी थी.

भैया थोड़ी देर तक देखते रहे उसके बाद मौन आमंत्रण समझ कर हाथ धोने के लिए उठे, वाशबेसिन में हाथ धोकर थोड़ा घूम कर इस तरह से खड़े हो गए कि उनका लंड मेरे चूत को छूने लगा. गरमा गरम लंड की तपिश का मेरी बुर ने गरमजोशी से स्वागत किया और बहुत दिनों की प्यासी बुर ने गीला होना शुरू कर प्रिया था.

मेरा शरीर तो लंड का साथ दे रहा था पर मस्तिष्क विरोध करते हुए कहने लगा कि भैया ये क्या कर रहे हैं?वे शरारत से पूर्ण मुस्कुराते हुए बोले- आपने ही तो गरमा गरम खाने पर बुलाया है और पूछ रही हैं कि क्या कर रहा हूँ. कितनी बार तो मौन निमंत्रण प्रिया है, आज नखरे दिखा रही हैं. पर बरखुरदार मेरी उम्र पर न जाएं, कहा गया है मर्द साठा तब पाठा. एक बार हमें भी तो आजमाइए.

मैंने झुके झुके ही अपनी गांड थोड़ा पीछे की और बोली कि चलो देखें, इस शेर में कितना दम है.भाईसाहब बोले कि रूम में तो चलिए फिर दिखाते हैं कि साठा कितना पाठा है.

रूम में मैं लेट गई, भाई साहब किसी अधीर टीनेजर्स की भाँति मुझे चोदने में भिड़ गए. मेरी दोनों चूचियाँ फड़कती रह गईं कि कोई पहले इन्हें तो चूसे, उस तरफ तो उन्होंने ध्यान ही नहीं प्रिया.

मुठ मार कर अपने लंड को खड़ा किया और जल्दी जल्दी बुर में घुसाने लगे. गैर मर्द के लंड की अर्चना मात्र से मेरी चूत चुदासी हो चुकी थी. पर उनका लंड था कि घुसने का नाम ही नहीं ले रहा था. मुझे दया आ गई और लंड को दो उंगलियों से पकड़ कर चूत के अन्दर ठेल प्रिया. साला पाठा का लंड रबर ट्यूब की तरह था, न पूरी तरह कड़क ही था, न ही सुस्त.. साले ने जैसे तैसे लंड अन्दर डाल कर चोदना तो शुरू किया, पर मजा नहीं आ रहा था. मैं अपने मुँह से तो तरह तरह की गालियाँ निकल रही थी.

थोड़े ही देर में “फच्च फच्च..” की आवाज आने लगी, मैं समझ गई साला यह तो झड़ गया. झड़ते के साथ सड़े केले की तरह बाहर आ गया. मैं तो तड़पती ही रह गई.

मत पूछिये उस समय मेरी हालात कैसी थी. मेरी चूत से रस नहीं निकलने के कारण मेरी चूत अभी भी फक फक कर रही थी. मेरा सर दर्द से फटने लगा. जल्दी से बाथरूम में घुस कर डिल्डो निकाल कर अपनी चुदाई पूरी की.

बाहर निकलने पर भाईसाहब मुस्कुरा कर पूछने लगे- कैसा रहा पाठा का लंड.मैं भी आहत हो कर बोली कि भाभी जी ने बहुत सही निर्णय लिया था.

बस इतनी सी कहानी है मेरी. अब तुम्हारा निर्णय क्या है?मैंने सारी सीडी भाभी को सौंप दीं और केवल इतना ही कहा कि बस भाभी मैं आपका पक्ष जानना चाह रहा था.

इतनी दयावान इतनी केयरिंग भाभी के लिए मेरे नजर में उनकी इज्जत और बढ़ गई थी.

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देवर भाभी की कामवासना और चुत चुदाई

कुल भाग: 2
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