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भाभी की चुदाई पठन समय: 10 मिनट पढ़ा गया: 884 बार

दिल की कशिश-1

दिल की कशिश-1
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मुझे चार दिन से वायरल बुखार चल रहा था। मेरे पति राकेश को अपने रूटीन कार्य सर्वे के लिये जाना जरूरी था। वो मुझे अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे। पर मेरी सुविधा के लिये मेरे पति ने अपने पापा को अपने गांव फ़ोन कर प्रिया और परिणाम स्वरूप मेरे पति का छोटा भाई रोहन सवेरे ही पहुँच गया। उसे देख कर मेरे पति की सांस में सांस आई। मेरा देवर रोहन उस समय कॉलेज में पढ़ता था। अब तो वो जवान हो रहा था, उसका तो कॉलेज में जाकर पहनने ओढ़ने का तरीका, बोलने-चालने का ढंग सब ही बदल गया था।

राकेश ने रोहन को मेरी सारी दवाईयाँ कब कब देनी हैं … खाने में क्या क्या देना है, सब समझा प्रिया था। पर आज मेरा बुखार का पांचवां दिन भी चल रहा था तो मेरा बुखार भी उतर चुका था, बस कमजोरी सी लग रही थी।

दोपहर में उनकी जीप आ गई थी सो वो दिन के भोजन के उपरान्त रवाना हो गये थे। मैंने भी आज तो दिन को खाना ठीक से खाया था। रात को बुखार वाली नींद नहीं आई थी बल्कि एक अत्यन्त सुहावनी और गहरी नींद आई थी। अगली सुबह से मुझे फ़्रेशनेस सी लग रही थी। मैंने तो सवेरे ही गीजर ऑन करके गर्म पानी से स्नान कर लिया था। फिर डी ओ भी लगा लिया था। अपने वस्त्र भी बदल लिये थे… पहले पहने वस्त्रों से अब तो दवाईयों की, बुखार की सी महक आने लगी थी।

“आपको एक दिन और रुक जाना चाहिये था … जल्दी क्या थी?” रोहन मुझे समझा रहा था।

“शरीर में दवाईयों की बहुत महक आने लगी थी, पर अब तो मुझे अच्छा लग रहा है। जा चाय बना ला …।”

चाय पी कर मैंने उठ कर परांठा, आमलेट और अचार का नाश्ता तैयार कर प्रिया था। लगभग नौ बजे हमने नाश्ता भी कर लिया था। अब मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था। दिन भर मैंने काम किया, मुझे जरा भी थकान नहीं आई थी। दिन को भी अच्छी नींद आई थी। विकास ने अपना पलंग मेरे पलंग के पास ही लगा लिया था ताकि समय असमय वो मेरे काम आ सके।

कई दिनों तक मैंने आराम भी बहुत किया, आज तो मैं भोजन के बाद मैं दिन को आराम करके उठी तो विकास मेरे पास बिस्तर पर ही बैठा हुआ घूर रहा था।

मैंने अंगड़ाई लेते हुये कहा-रोहन… क्या बात है … कोई खास बात है क्या?

“ओह, नहीं … वैसे ही … भाभी आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।”

“ओ हो ! यह तो मुझे पता ही नहीं था? फिर मैंने हंस कर उसे अपनी गोदी में खींच लिया। वो तो जैसे जान कर मेरी गोदी में लुढ़क सा गया और अपना सर मेरी गोदी में छुपा लिया।

मैंने प्यार से उसके बालों में हाथ फ़ेरा… वो तो अपन सर मेरी गोदी में छुपा कर जैसे आँखें बन्द करके लेट गया। मैं कभी उसकी पीठ पर तो कभी उसके बालों को प्यार से सहलाने लगी। भूल गई कि अब वो भी जवान है। मैंने देखा कि कुछ ही समय में तो जैसे वो सो ही गया था। पर अचानक ही मुझे उसका सर अपनी चूत के आसपास रगड़ खाता सा महसूस हुआ।

मुझे रोमांच सा हो आया ! मैंने उसे नजदीक से देखा … उसकी सांसें तेज थी … और वो बार बार अपना सर मेरी चूत पर दबाने लगा था। मेरे शरीर में जैसे सनसनाहट सी होने लगी … नीचे चूत के आसपास मुझे गुदगुदी सी लगने लगी। मैंने धीरे से उसके बाल जकड़ लिये … उसकी पीठ पर अपनी अंगुलियाँ गड़ा कर चलाने लगी। तभी मुझे उसके लण्ड के उभार की ओर ध्यान गया। उसका पजामा धीरे धीरे तम्बू की तरह ऊपर उठने लगा था। कुछ ही देर में वो कड़क हो कर तन सा गया। मेरे दिल में एक कसक सी उठ गई। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। दिल पर जैसे काबू नहीं रख पा रही थी मैं।

अचानक मुझे एक झटका सा लगा … मैं एकदम सम्भल गई।

“ऐ मुन्ना ! सो गया क्या …चल उठ … बहुत लाड़ हो गया !”

रोहन ने अपनी आंखे खोली, उसकी आंखे गुलाबी हो रही थी।

“उंह भाभी … कितना अच्छा लग रहा था ! लगता था कि आपके साथ ही सो जाऊँ !”

“चल उठ चाय बनाते हैं, फिर शाम का भोजन भी तो बनाना है।”

“धत्त धत्त, भाभी आप तो बस … रोटी भाजी … दाल चावल … अच्छा चलो !”

रोहन ने अपना मुँह बनाया और उठ गया। रोहन ने मेरे दिल में हलचल मचा दी थी। अब वो मुझे किसी हीरो की तरह लगने लगा था। वो मुझे सुन्दर लगने लगा था। उसका क्या तो चेहरा … क्या तो बाल, उसकी मुस्कान, उसका बदन तो मुझे सलमान खान जैसा लगने लगा था। मेरे दिल में एक मीठा मीठा सा दर्द होने लगा था। वो मुझे भाने लगा था। संध्या को भोजन से पहले वो जैसे ही स्नान करके निकला, उसका गीला शरीर और उसकी चिपकी हुई चड्डी, उसके लण्ड का सॉलिड उभार … उसका मोटा आकार बता रहा था। मुझे देखते ही वो घूम गया।

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पर वो तो स्नानघर से रोज ही ऐसे ही निकलता था। शायद उसके मन में भी चोर था। उफ़्फ़ ! उसके पीछे घूमते ही उसके दो कठोर चूतड़ मेरे सामने आ गये। कितने सुन्दर थे … सॉलिड … कामदेव की तरह … मेरे दिल में तीर से चल गये … जैसे कई सुईयाँ दिल में एक साथ घुस गई। ये साले मर्द इतने नासमझ क्यों होते हैं।

मैंने पास पड़ा तौलिया उठा कर उसे दे प्रिया …

“लपेट लो मुन्ना जी … ऐसे मत घूमा करो … किसी की नजर लग जायेगी।”

“भाभी, अब आपके अलावा यहाँ कौन है … लगा लो नजर … मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला …”

मैंने हंसते हुये बाहर निकलते हुये कहा … “वो तो नीचे देख लो … पता चल जायेगा कि क्या हाल है?”

उसने नीचे देखा और अपने खड़े हुये लण्ड को जल्दी से छुपा लिया।

उसके स्नान के बाद मैंने भी स्नान कर लिया और खूब खुशबू लगा कर महकने लगी। सोच रही थी अगर मुन्ना मुझे रात को जबरदस्ती चोद भी देता है तो क्या मैं इन्कार कर पाऊँगी। हाय रे ! ये कैसा विचार आ गया मन में। मैंने घर के कपड़े पहन लिये, उत्तेजना से भरी हुई जान करके एक नीचे गले का ब्लाऊज … बिना ब्रा के, जिसमे से मेरा उन्नत स्तन आकर्षित करें, पेटीकोट बिना चड्डी के … बहुत हल्की फ़ुल्की सी … । यदि वो चोदना चाहे तो मैं तो बिलकुल तैयार हूँ। उफ़्फ़, हाय राम … मैं यह क्या सोचने लगी।

रोहन भी आज मस्ती में लग रहा था। जब हम भोजन के लिये बैठे, मुझे तुरन्त पता चल गया था कि उसने भी चड्डी नहीं पहनी हुई है। उसका सफ़ेद पतला पजामा उसके लण्ड का साफ़ पता बता रहा था। उसे देख कर मेरे मन में जैसे बिजलियाँ लहराने लगी। मुझे चूत में खुजली सी लगने लगी। उसे देख देख कर मेरी चूत पानी छोड़ने लगी थी। बार बार मेरा हाथ पेटीकोट के ऊपर चूत पर चला जाता था। मैं गीलेपन को बार बार साफ़ कर रही थी। कैसा सुन्दर बुलावा था यह?

मुझे भी आश्चर्य हो रहा था कि मुझे जाने क्या होने लगा था? मैं इतनी बहक क्यों रही हूँ। शायद चुदे हुये काफ़ी समय हो गया था ! क्या मुझे अब एक अदद लण्ड की जरूरत थी। मेरा दिल यह सब जानते हुये भी काबू से बाहर होता जा रहा था। कुछ देर टीवी देखने के बाद मैं विचलित सी अपने कमरे में आ गई। मुझसे दिल की बेताबी छुपाये नहीं छुप रही थी। सोचा कि चूत में अंगुली घुसा कर पानी निकाल लूंगी, पर मुझे इसका मौका ही नहीं मिला। रोहन भी टीवी बन्द करके कमरे में आ गया।

“भाभी, आज तो मुझे आप पर बहुत प्यार आ रहा है, अपनी गोदी में सुला लो…।”

यह सुनते ही जैसे मेरी रूह कांप गई … जाने आज क्या होने वाला है … गोदी में ! फिर जाने वो क्या करेगा ? कहीं मैं बहक जाऊँ ? कैसे सम्भालूंगी अपने आप को.?. क्या चुदवा लूँ? कौन रोकेगा मुझे? किसे पता चलेगा? सवालों से मन घिरा हुआ था। फिर मुझे लगा कि वो कुछ कह रहा था।

“चुप शैतान, भाभी के साथ सोयेगा? शरम नहीं आयेगी?”

“भाभी, आप कितनी अच्छी है, बस थोड़ी देर के लिये ही सही …”

“बस थोड़ी देर ही ना … तो आजा … मेरे साथ मेरी बगल में लेट जा ! बहुत प्यार आ रहा है ना !!”

मेरे लेटते ही रोहन भी मेरी बगल में लेट गया। फिर उसने अपना सर नीचे किया और मेरी चूचियों में अपना चेहरा दबा कर करवट पर लेट गया। उफ़्फ़ ! इतना बड़ा लड़का … और मेरी चूचियों में सर घुसा कर … मैं भी प्यार से अभीभूत होने लगी। मैंने धीरे से उसके सर को अपने सीने से और भींच लिया। अपने दूसरे हाथ उसकी पीठ सहलाने लगी। वो मुझसे और चिपक सा गया। उसकी अब एक टांग मेरी कमर पर आ गई और अपना एक हाथ मेरे चूतड़ पर रख कर मुझे अपनी ओर दबा लिया। उफ़्फ़ ! कैसे शरीर से शरीर कस कर चिपक गये थे।

मेरे तन में जैसे ज्वाला धधक उठी। मेरा दिल घायल हो कर जैसे लहूलुहान होने लगा। ये कैसी जलन ! ये कैसी अगन ! चूत में तेज खुजली उठने लगी।

कहानी जारी रहेगी।

कहानी का अगला भाग:दिल की कशिश-2

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दिल की कशिश

कुल भाग: 2
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