उसके बाद तो हम दोनों का एक दूसरे को देखने का नज़रिया ही बदल गया। आते जाते हर वक्त हमारा ध्यान एक दूसरे पर ही रहता। रात के खाने के बाद भी हमें एक दो बार मौका मिला तो मैंने अगर उसके होंठ चूमे, उसके मम्में दबाये तो उसने भी बड़ी उतावली होकर मुझे चूमने प्रिया, और मेरी लुल्ली को पकड़ा और खींचा। एक दिन में ही हमारा प्यार परवान चढ़ गया था।
अगले दिन साधना के मामा का परिवार भी आ गया। साधना के मामा का लड़का भी मेरा ही हमउम्र था। अब हम खेलने वाले 6 लोग हो गए थे। मगर साधना का ममेरा भाई मोहित बहुत हरामी टाईप था। साले ने बहुत जल्दी भाँप लिया के मेरे और साधना के बीच कुछ है। शाम को जब हम खेतों की तरफ घूमने गए तो साले ने पूछ भी लिया। अब मेरी भी जाट बुद्धि, मैंने भी उसे सब सच सच बता प्रिया, तो वो बोला- तो भाई साधना तो हम दोनों की बहन है, और दूर के रिश्ते में हम दोनों भी भाई ही लगते हैं। तो क्यों न दोनों भाई मिल बाँट कर खाएं।
मुझे क्या इंकार हो सकता था, तो बस उसी रात खेलते खेलते हम तीनों पीछे वाले बड़े कमरे में गए, और बस अंदर जाते ही, साधना और मैं आपस में लिपट गए, दोनों बेतहाशा एक दूसरे को चूमने लगे। मोहित भी हमारे पास ही खड़ा था। एक लंबा और बढ़िया चुंबन लेने के बाद मैंने साधना से कहा- मोहित भी हमारे साथ है, वो भी तुमसे प्यार करना चाहता है।साधना ने कोई आनाकानी नहीं की। अगले ही पल साधना और मोहित आपस में लिपटे एक दूसरे को चूम रहे थे। तब मेरे दिल में एक बारगी ये विचार आया कि मैंने मोहित से साधना की बात करके गलती की। साली अपनी माशूक किसी और के होंठों को चूमे, पहली बार माशूक की बेवफ़ाई का और अपने चूतिया होने का एहसास हुआ।
मगर अब तो गाड़ी चल पड़ी थी, अब कैसे रोका जा सकता था। मोहित ने साधना को खूब चूमा, उसके मम्में मसले, साले ने अपनी पैन्ट की ज़िप खोल कर अपना लंड निकाल कर साधना को पकड़ाया, तो अपना एक हाथ उसने भी साधना की सलवार में डाल प्रिया। अब पता नहीं सलवार में हाथ डाल कर वो क्या कर रहा था, साधना तो उसके होंटों को खा जाने को हो रही थी, और उसके मुंह से बस- उम्म … आह …” ही निकल रही थी।
मैंने जब ये उत्तेजक कामुक दृश्य देखा, तो मुझसे भी न रहा गया। मैंने अपनी पैन्ट की ज़िप खोली और अपना लंड निकाला और साधना के पीछे जाकर चिपक गया। मोहित ने साधना की सलवार खोल दी, उसकी सलवार नीचे गिरा कर मोहित ने अपना लंड साधना के आगे लगाया और मैंने पीछे लगा प्रिया मगर अंदर किसी ने नहीं डाला।हम दोनों बारी बारी से साधना के होंठ चूम रहे थे, और वो भी हम दोनों से मज़े ले रही थी।
फिर मोहित बोला- यार ऐसे मज़ा नहीं आता, साधना, मुझे तेरी फुद्दी मारनी है, कल दोपहर को खेतों में चलते हैं, वहाँ जा कर सब कुछ करेंगे।साधना ने हाँ बोला, मैं भी खुश हो गया कि चलो मोहित के बहाने से ही सही, साला फुद्दी का जुगाड़ तो हो गया।
अगले दिन हम घर में घूमने का कह कर खेतों की ओर चले गए। हमारे खेतों से आगे काफी आगे जाकर थोड़ी बेकार सी ज़मीन है, जहां पर सिर्फ कीकर, करीर जैसे बेकार से पेड़ और झाड़ उगे हैं। हम तीनों वहाँ जा पहुंचे, और उन झाड़ों में काफी अंदर तक चले गए। आगे थोड़ी सी साफ जगह मिल गई, तो हम तीनों वहाँ जा बैठे। अब एक धुकधुकी हम तीनों के दिल में थी, आ तो गए, अब चोदाचादी शुरू कैसे करें।
ये काम भी मोहित ने ही शुरू किया। उसने साधना का मुंह अपनी तरफ घुमाया और उसको चूम लिया। बस इसी एक शुरुआत की ज़रूरत थी, फिर तो मैं भी साधना से चिपक गया। दोनों, मैं और मोहित, कभी एक उसका मुंह अपनी तरह घूमा कर उसके होंठ चूसता, तो कभी दूसरा, साधना के तो दोनों हाथों में लड्डू थे। और हमारे हाथों में साधना के मम्में थे।
मोहित ने साधना की कमीज़ ऊपर उठा दी। नीचे से उसने ब्रा या अंडरशर्ट कुछ भी नहीं पहना था। गोरे गोल मम्मे, जिन पर हल्के गुलाबी से रंग के निप्पल बन कर उभर रहे थे। पहले मैंने साधना के मम्में को दबा कर देखा, मगर मोहित तो सीधा चूसने ही लगा। फिर मैंने भी साधना का मम्मा चूसा। मोहित और मैंने दोनों ने अपनी अपनी पैन्ट उतार दी, और चड्डी भी उतार कर हम दोनों तो नंगे ही हो गए। दोनों की झांट आ गई थी। शायद वो भी कभी कभी मुट्ठ मारता होगा, मेरी तरह उसके भी लंड की सील टूटी हुई थी।
हम दोनों ने अपने अपने लंड साधना को पकड़ाये। साधना हम दोनों के लंड पकड़ कर दबाने लगी। फिर मोहित ने साधना की सलवार का नाड़ा खोला, एक बार तो साधना ने रोका, वो थोड़ा शरमाई भी। मगर मोहित तो बहुत ही उतावला हो रखा था। उसने नाड़ा खोला और एक ही बार में साधना की सलवार खींच कर उतार दी, और उसके बाद उसकी कमीज़ भी उतार दी।
साधना हम दोनों के बीचे बिल्कुल नंगी हो कर लेटी थी। वो नंगी हुई तो हम दोनों ने अपनी अपनी कमीज़ उतार दी।मोहित ने मुझसे पूछा- पहले तू करेगा या मैं करूँ?मैंने कहा- पहले मेरी दोस्ती हुई थी साधना से, मैं ही करूंगा।मोहित एक बगल हट गया, बोला- चल आजा फिर।
मैं साधना की दोनों टांगों के बीच में आया, मैंने अपना लंड उसकी फुद्दी पर रखा और अंदर डालने की कोशिश करी मगर मेरा लंड साधना की फुद्दी में नहीं घुसा।मोहित बोला- अबे चल बे भोसड़ी के, तुझे तो पता भी नहीं के कहाँ डालते हैं। हट पीछे मैं दिखाता हूँ।मोहित मुझे परे धकियाते हुये खुद मेरी जगह आया और उसने साधना की दोनों टांगें अपने हाथों से पकड़ कर पूरी खोल दी और अपनी कमर हिला कर ही अपना लंड उसकी फुद्दी पर सेट किया। तब मैंने देखा कि मैं तो ऊपर ही अपना लंड सेट कर रहा था, वहाँ कहाँ घुस पाता मेरा लंड।
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और जब मोहित ने रख कर अंदर को घुसेड़ा तो उसके लंड के टोपा एक मिनट में साधना की फुद्दी में घुस गया मगर साथ ही साधना भी तड़प उठी- हाय … मोहित भैया।उसने मोहित की कमर पकड़ कर उसे रोकने की कोशिश करी। साधना का चेहरा दर्द से भरा था। मगर मोहित पर उन्माद छाया था। उसने साधना की कोई बात नहीं सुनी और अपना लंड और उसकी फुद्दी में घुसेड़ा। साधना रोई तो नहीं, मगर उसे दर्द ज़रूर हुआ था, पर वो सब सह गई।मैंने देखा थोड़ा थोड़ा करके और साधना को “बस थोड़ा सा और, थोड़ा सा और” कहते कहते मोहित ने अपना सारा लंड उसकी फुद्दी में घुसेड़ प्रिया।
माशूक मेरी, सेट मैंने की, मगर चुदाई पहले उसने की। पूरा लंड अंदर डालने के बाद मोहित ने कई बार अपनी कमर आगे पीछे करी। कुछ देर तक मोहित ने साधना को बड़े प्यार से चोदा और फिर मुझको बोला- चल तू भी डाल के देख।उसने अपना लंड बाहर निकाला और मैं फिर से साधना की टांगों के बीच में था। मैं साधना के ऊपर झुका तो उसने मेरा लंड पकड़ कर खुद ही अपनी फुद्दी पर सेट किया। मैंने हल्का सा धक्का लगाया और मेरा लंड अंदर को घुस गया। जैसे कोई गरम गीली गुफा हो। सच में बड़ा मज़ा आया, पहली बार फुद्दी में मेरा लंड घुसा था।
ये बात तब मेरे दिमाग में नहीं आई कि साधना की सील तोड़ने का मज़ा मैं नहीं ले पाया, पर आज ये बात ज़रूर सोचता हूँ। मैं भी मोहित की देखा देखी अपना लंड साधना की फुद्दी में डाला और आगे पीछे करने लगा। बेशक मुझे नहीं पता मैं साधना को सही से चोद रहा था या नहीं, मगर साधना ने जब मेरे साथ किया तो उसने कहा ज़रूर- तू मोहित से बढ़िया कर रहा है।मैं तो फूल कर कुप्पा हो गया और खुद को बहुत बड़ा चोदू समझने लगा। मैंने एक काम और किया जो, मोहित ने नहीं किया था, वो ये के मैंने अपना पूरा लंड साधना की फुद्दी के अंदर तक डाला, जबकि मोहित सिर्फ अपना आधा लंड ही उसकी फुद्दी के अंदर बाहर कर रहा था, शायद इसी से साधना को चुदवाने में ज़्यादा मज़ा आया और उसने मुझे मोहित से बढ़िया पाया।
चुदाई के दौरान हमने साधना के खूब मम्में चूसे, खूब दबा दबा कर देखे, पहली बार जो किसी लड़की के साथ सेक्स जो कर रहे थे। मोहित ने साधना को अपना लंड चूसने को कहा, मगर साधना ने साफ मना कर प्रिया- ये गंदे काम न तू अपने शहर की रंडियों से करना, मैं ऐसा घटिया काम कतई न करूँ।जब मोहित ने थोड़ा और ज़ोर डाला तो साधना तो बिगड़ गई- अबे जब एक बार मना कर प्रिया तो पल्ले न पड़ता तेरे। साले जो काम ढंग से करना है तो कर, नहीं तो भाग जा भोंसड़ी के।
साधना के मुंह से गाली सुन कर तो हम दोनों के गोटे हलक में आ गए। हमें नहीं पता था कि साधना इतनी बिगड़ैल, इतनी बिंदास है।
खैर मैं अपनी स्पीड से लगा रहा। थोड़ी देर बार मेरा माल छूटा, साली इतनी समझ ही नहीं थी कि माल बाहर गिराते हैं। मैंने तो साधना की फुद्दी में ही अपना सारा माल गिरा प्रिया। मैं जैसे ही फारिग हो कर साधना के ऊपर से उतरा, तभी मोहित मेरी जगह आ गया, और उसने अपना लंड साधना की फुद्दी में डाल प्रिया, उसने मुझे पूरा लंड डाल कर चुदाई करते हुये देख लिया था, तो वो भी पूरा लंड डाल कर साधना को चोदने लगा।
यह वो वक़्त था, जब हमें इस बात का कोई एहसास ही नहीं था कि सही सेक्स क्या होता है। इसमें सिर्फ अपनी नहीं, अपने साथी की संतुष्टि का भी खयाल रखना पड़ता है।
कुछ देर बाद मोहित ने भी अपना सारा माल साधना की फुद्दी में झाड़ प्रिया। हमें बड़ा मज़ा आया। मगर यह मज़ा ऐसा था कि इससे हमारा दिल ही नहीं भरा। कपड़े पहनते पहनते हमने कल का प्रोग्राम भी फिक्स कर लिया कि कल बाद दोपहर फिर इसी जगह मिलेंगे और फिर से मज़े करेंगे।
उसके बाद तो हमारा ये रोज़ का ही प्रोग्राम होने लगा। साधना भी हर वक्त गरम रहती, बावली रहती चुदाई के लिए। और हम दोनों भी उतावले रहते. मैं और मोहित दोनों को बस हर जगह साधना ही दिखती। आते जाते हम दोनों सिर्फ उसको ही घूरते रहते। उसके मम्मे, उसकी गांड। उसका हँसना, बोलना, बात करना, चलना, चहकना। बस हम दोनों तो उसी को देख देख कर दीवाने हो रखे थे।
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