पिछले भागों में आपने किमी से मेरी मुलाकात, मेरी जॉब, किमी की सुहागरात के सपने, सेक्स के नीरस अनुभव के बाद किमी का आत्मविश्वास लौटा कर उसे कामुक बनाने के मेरे प्रयासों के बारे में पढ़ा।
अब आगे..
अब तक किमी बहुत सुडौल और आकर्षक हो चुकी है, लेकिन मैं किमी को जिस रूप में देखना चाहता हूँ, वो अभी बाक़ी है। इसलिए सारे उपक्रम निरंतर जारी थे। वैसे भी हेल्थ के संबंध में कहा जाता है कि व्यायाम और शरीर को लेकर सारी जागरूकता उम्र के हर पड़ाव में निरंतर रहनी चाहिए।
आप सब तो जानते ही हैं कि किमी के शरीर में लेप लगाते हुए मेरी हालत कैसी हो जाती थी और मुझे बाथरूम जाकर स्खलित होना पड़ता था। इसलिए मैंने एक प्लान किया और मैंने किमी के शरीर में लेप के साथ-साथ आँखों पर भी आलू और खीरे की गोल टुकड़े रख दिए, इससे आँखों के पास के डार्क सर्कल मिटते हैं और इससे मेरा फायदा ये था कि अब किमी मुझे देख नहीं सकती थी। जबकि मैं उसके निर्वस्त्र शरीर को देखते हुए उसके सामने ही अपने लिंग का घर्षण कर सकता था।
अब मैं रोज ही किमी के शरीर पर लेप लगाने के बाद उसके आँखों पर खीरा-आलू के टुकड़े रख देता और नस फाड़ने को आतुर हो चुके लिंग को किमी के सामने ही निक्कर से से निकाल कर रगड़ने लगता था। किमी को इस बात का पता चलता था या नहीं.. मैं नहीं जानता और ना ही जानना चाहता था, क्योंकि उस वक्त मैं कामांध हो चुका होता था।
फिर भी मेरी शराफत यही थी कि मैंने किमी को हवस का शिकार नहीं बनाया। कई बार स्खलन के दौरान मेरे मुँह से हल्की आवाजें निकल जाती थीं और मेरे लिंगामृत की बूँदें भी किमी के ऊपर ही छिटक जाती थीं।
यह सिलसिला लगभग पंद्रह दिनों तक चला।
अब तक हमारी छुट्टी के तीन महीने भी बीत गए, अब हमें सारी चीजों के साथ साथ ऑफिस के लिए भी वक्त निकालना था और जिन्दगी बहुत ज्यादा वयस्त होने लगी।इन 15 दिनों में किमी के व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ गया था, आता भी क्यों नहीं.. क्योंकि अब वो सुंदर सी.. स्फूर्ति भरी, सबकी नजरों को भाने वाली लड़की जो बन चुकी थी।उसके ऑफिस में तो कई लोगों ने उसके शारीरिक परिवर्तन और रंग में बदलाव की वजह से उसे पहचाना भी नहीं।
एक रविवार को जब मैं लेप लगा रहा था, किमी ने मुझसे कहा- संदीप मेरे शरीर का एक हिस्सा अभी भी लेप और खूबसूरती से वंचित है, उसे कब खूबसूरत बनाओगे?
इतना कहते ही वो खुद शरमा भी गई। मैं समझ गया कि ये पेंटी वाले हिस्से को लेकर कह रही है, क्योंकि उसके शरीर में लेप के दौरान एक मात्र वही कपड़ा शेष रह जाता था। उसे उतारना तो मैं भी चाहता था.. लेकिन जल्दबाजी नहीं कर रहा था।
आज मेरे से पहले ही किमी का धैर्य टूट गया, मैं बहुत खुश था और हतप्रभ भी।मैंने कहा- हाँ किमी.. आज से वहाँ भी लेप लगा दूंगा।वो कुछ न बोली, वो हमेशा की तरह अपने बाक़ी कपड़ों को उतार कर लेट गई।
अब मैंने पहले उसकी पीठ की ओर से लेप लगाना शुरू किया, पहले कंधों पर मालिश करते हुए चिकनी पीठ और सुडौल हो चुकी कमर पर लेप लगाया। उसके शरीर में कंपन हो रही थी और मेरे रोंये भी खड़े हो जाते थे। हालांकि उत्तेजना रोज ही होती थी, पर आज पेंटी भी उतरने वाली है.. यही सोच कर शायद हम दोनों ही नर्वस हो रहे थे, या कहो कि अतिउत्तेजित हो रहे थे।
मैंने किमी की जांघों पिंडलियों और पंजों पर लेप लगाया, फिर किमी को सीधा लेटाया और उसके चेहरे से होते हुए तने हुए उरोजों पर लेप लगाया। आज मैंने लेप लगाते हुए उसके उरोजों को दबा भी दिया, इस पर वो थोड़ा कसमसाई तो.. पर उसने कुछ कहा नहीं।
इस तरह मेरी हिम्मत बढ़ रही थी, मैंने अब उसके सपाट पेट पर लेप लगाया और उसकी नाभि में उंगली रख कर घुमा दी तो वो फिर कसमसा के रह गई।
अब मैं उसके पैरों की तरफ खड़ा होकर उसके पंजों से ऊपर की ओर बढ़ते हुए लेप लगाने लगा और उसकी जांघों सहलाते, दबाते हुए उसकी पेंटी के नीचे वाली इलास्टिक तक अपने हाथों के अंगूठे को ले जाने लगा। मुझे पेंटी में चिपकी उसकी योनि रोज नजर आती थी, पर आज वहाँ मुझे गीलेपन का एहसास हो रहा था, इसका मतलब आज किमी की योनि अतिप्रसन्नता में रस बहाने लगी थी।
अब मैंने अपने दोनों हाथ किमी के पेट पर रखे और नीचे की ओर सरकाते हुए, कमर को सहलाते, दबाते हुए, पेंटी में अपनी उंगलियाँ फंसाई और गोल लपेटने जैसा करते हुए, पेंटी को फोल्ड किया। जैसे ही दो-तीन इंच पेंटी फोल्ड हुई किमी की क्लीन सेव योनि के ऊपर का हिस्सा दिखने लगा।
मैं पेंटी को फोल्ड करना रोक कर.. उस जगह को आहिस्ते से ऐसे छूने लगा, जैसे मैं किसी नवजात शिशु को सहला रहा होऊँ।
अब पहली बार किमी के मुंह से ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ की आवाज निकली और मेरी बेचैनी बढ़ गई। मैंने पेंटी को और फोल्ड किया.. अब लगभग पूरी पेंटी फोल्ड हो गई और मुझे किमी की कयामत भरी योनि के प्रथम दर्शन मिल गए। पर उसकी जांघें अभी भी आपस में चिपकी हुई थीं, इसलिए योनि की सिर्फ दरार नजर आ रही थी।
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किमी की थोड़ी सांवली पर बालों रहित मखमली योनि बहुत ही उत्तेजक लग रही थी। पेंटी से ढकी उस जगह की चमक और आभा का वर्णन मेरे बस का नहीं, इसलिए वह कल्पना आप ही कीजिए।
आप बस इतना जान लीजिए कि बिना कुछ किए ही मैं स्खलित हो गया पर लिंग राज ने स्खलन के बावजूद तनाव नहीं छोड़ा था।
अब मैंने योनि की दरार के नीचे अपनी उंगली लगाई और जिस तरह हम दो लकड़ी के ज्वांइट को भरने फेविकोल लगाते हैं.. वैसे ही उसके कामरस की एक बूंद को उसकी योनि के ऊपर तक आहिस्ते से फिरा दिया।
मेरा इतना करना था कि किमी कसमसा उठी और वो ‘ओह… संदीप.. बस..’ इतना ही कह पाई।
अब मैंने उसकी पेंटी में फिर से उंगली फंसाई और किमी की मदद से पेंटी को अलग कर दिया और बड़े गौर से उस हसीन जगह का मुआयना करने लगा। मैं उस पल को वहीं ठहरा देना चाहता था, जिसकी चाहत में मैं ये सारे उपक्रम कर रहा था। हालांकि मैं सारी चीजें किमी के लिए कर रहा था, पर मेरा भी स्वार्थ था, यह भी सच है।
अब मैंने दोनों हाथों की उंगलियों को उसकी योनि के दोनों ओर ले जाकर योनि को दबाया और योनि के लबों के जोड़ को आपस में रगड़ा। मैं यह सब इतने प्यार से कर रहा था कि किमी की सिसकारियाँ निकलने लगीं।
फिर मैंने उसके पैरों को मोड़ कर फैला दिया, उसकी गुलाब की पंखुड़ियों जैसी फांकों को देख कर मन मचल उठा, पर मैंने खुद पर काबू किया और लेप को पेंटी से ढके भागों पर बड़े इत्मिनान से लगाने लगा।
किमी ने अपने ऊपर काबू पाने के लिए टेबल को कस के जकड़ लिया था। मैंने किमी शरीर के हर हिस्से में लेप लगाया फिर आलू-खीरा काट लाया और जब मैं उसे किमी की आँखों में रखने वाला था, तब किमी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसने कहा- संदीप तुम मेरी आँखों में ये लगाकर क्या करते हो.. मैं सब जानती हूँ!
मैं स्तब्ध था, मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
तब उसी ने फिर कहा- ऐसी परिस्थितियों में तुम्हारा ऐसा करना स्वाभाविक ही है। तुम अच्छे इंसान हो.. इसलिए अब तक मुझसे दूर रहे, कोई और होता तो सबसे पहले मेरे शरीर से खेलने की ही बात सोचता और शायद ऐसे ही लोगों की वजह से सेक्स के प्रति मेरी रुचि खत्म हो गई थी। हम दोनों जानते हैं कि सेक्स दो शरीर का मिलन नहीं होता, ये तो आत्माओं, विचारों, भावनाओं का, मिलन होता है। मेरे अन्दर सेक्स की भावना को तुमने जागृत किया है, मेरे खोये हुए आत्मविश्वास को तुमने जगाया है, मेरी तन्हाई को दूर किया है, जीवन में आनन्द लेकर जीना सिखाया है, मेरे शरीर का रोम-रोम और आत्मा का सूक्ष्म अंश भी तुम्हारा ऋणी है। मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ संदीप.. तुम जो चाहो कर सकते हो।
ऐसा कहते हुए उसकी आँखों से अश्रुधार बह निकली।
मैंने उसे संभाला और कहा- मैं तो सिर्फ तुम्हारे चेहरे पर खुशी देखना चाहता हूँ, अन्दर की खुशी..! बस और कुछ नहीं, सिर्फ उतना ही मेरा लक्ष्य है।उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा- थैंक्स संदीप तुम बहुत अच्छे हो!
वो मुझसे लिपट गई। हम दोनों ऐसे ही बैठे रहे और बहुत देर बाद उसने अपना सर उठाया और मेरी आँखों में देखते हुए कहा- संदीप एक बात कहूं..?मैंने ‘हाँ’ में अपना सर हिलाया.. तो उसने कहा- मुझे बचा हुआ अंतिम सुख भी दे दो।मैंने कहा- मैं कुछ समझा नहीं..!
उसने कहा- समझ तो तुम गए हो.. पर स्पष्ट सुनना चाहते हो.. तो सुनो, मैं तुम्हारे साथ संभोग करना चाहती हूँ, ऐसी कामक्रीड़ा करना चाहती हूँ.. जैसा कामदेव और रति ने भी न किया हो।
मैं मुस्कुरा उठा..
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