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Parivar Me Chudai पठन समय: 18 मिनट पढ़ा गया: 233 बार

घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-2(Ghoonghat ki aadh se dekha sasur ji ka fauladi lund-2)

moodchangerboy

28 Jan 2011 को प्रकाशित

घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-2(Ghoonghat ki aadh se dekha sasur ji ka fauladi lund-2)
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पिछला भाग पढ़े:-घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-1

हिंदी सेक्स कहानी अब आगे-

डर की वजह से मेरा गला सूखता जा रहा था और पेशाब रोकना अब नामुमकिन था। मैं अपनी जांघों को आपस में रगड़ते हुए किसी तरह खुद को रोके हुए थी, तभी अचानक बिजली आ गई। बिजली आते ही मुझमें थोड़ी हिम्मत आई और मैं कमरे से बाहर निकल आई। ससुर जी अपनी चारपाई पर खर्राटे लेकर सो रहे थे, इसलिए मैंने उन्हें जगाना ठीक नहीं समझा और आगे बढ़ गई।

मैंने अपने सिर को दुपट्टे से ढका हुआ था, पर बाथरूम के पास पहुँच कर मैं ठिठक गई। मन में डर था कि कहीं कोई अंदर छुपा ना हो। अब बाथरूम के दरवाज़े पर पहुँच कर भी अंदर जाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। पेशाब का दबाव इतना था कि मेरी चूत की नसें फूलती जा रही थी।

डर और हड़बड़ाहट में मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था, मैंने अपनी नाइटी को कमर के ऊपर तक उठाया और वहीं आंगन के एक कोने में नीचे बैठ गई। आंगन में लगी बड़ी लाइट की रोशनी मेरी नंगी गांड पर साफ़ पड़ रही थी।

आंगन में ससुर जी सो रहे थे, जिनसे मेरी दूरी मुश्किल से दस फीट की होगी। मैं उनकी परवाह किए बगैर अपनी भारी और गोरी गांड को नंगा करके पेशाब करने लगी। उस वक्त मुझे किसी बात का होश नहीं था, मुझे बस चूत से निकलती धार से मिल रही राहत महसूस हो रही थी।

मेरे पेशाब की धार आज जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। चूत की फांकें पूरी तरह खुली हुई थी और उनके बीच से निकलती धार फर्श पर गिर कर तेज़ आवाज़ कर रही थी। जैसे-जैसे मूत्राशय खाली हुआ, मुझे चैन मिलने लगा। अंत में जब पेशाब खत्म हुआ, तो मैंने राहत की एक लंबी साँस ली। फिर मैं बिना नाइटी नीचे किए एक-दम से खड़ी हो गई, तभी मुझे एक आवाज़ सुनाई दी—जैसे चारपाई हिली हो। मैं बुरी तरह घबरा गई और तुरंत अपनी नाइटी नीचे गिरा कर कमरे की तरफ भाग निकली।

मैं ससुर जी की चारपाई के बगल से तेज़ कदमों से गुजरते हुए अपने कमरे में आ गई। बेड पर लेट कर मैं गहरी-गहरी साँसें लेते हुए सोचने लगी कि वह आवाज़ किस चीज़ की थी? क्या मेरे पेशाब करते समय ससुर जी जाग तो नहीं गए थे? मेरे दिमाग में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। करीब पाँच मिनट बाद जब मैंने हिम्मत जुटा कर खिड़की से बाहर झाँका, तो देखा कि ससुर जी जाग चुके थे और अपनी चारपाई पर बैठे थे।

उन्हें जागा हुआ देख कर मेरा शक अब यकीन में बदल गया। इसका मतलब ससुर जी सब देख चुके थे! मैं मन ही मन बोली—’हे भगवान! यह क्या हो गया? जिस मर्द को मैंने आज तक अपना चेहरा तक नहीं दिखाया, वह आज मेरी पूरी नंगी गांड और चूत की धार देख चुका था।’

उफ़… अब मुझे बहुत शर्म आ रही थी। एक मन बोला कि शायद ससुर जी अभी जागे हों और यह मेरा वहम हो, पर डर फिर भी बना हुआ था। खैर, जैसे-तैसे मैंने रात काटी। सुबह जब ससुर जी सोकर उठे, तो मैं उन्हें नाश्ता देने गई।

मैं घूँघट किए हुए अंदर ही अंदर बहुत झिझक रही थी। आज हड़बड़ी में मैं अपनी कमर और पेट को अच्छी तरह ढकना भूल गई थी।

मैं ससुर जी के सामने नाश्ता रख कर जैसे ही उनके पैरों को छूने के लिए नीचे झुकी, मैंने घूँघट के अंदर से ही देखा कि वह एक टक मेरी चूचियों की गहराई को झाँक रहे थे। ससुर जी ने आशीर्वाद देने के बहाने आज सिर के बजाय मेरी गर्दन से लेकर मेरी नंगी पीठ तक अपना हाथ फेरा।

मेरा जिस्म उनके मर्दाने हाथों की छुअन से पिघल सा रहा था, मन में एक मीठी गुदगुदी सी मचने लगी थी। मेरी चूत की फांकों के साथ मेरी गांड का छेद भी सिकोड़ रहा था। उनके हाथों की छुअन से आज मुझे पता नहीं क्या होने लगा था, मैं काफी देर तक उनके पैरों के पास ही बैठी रही। मुझे तब होश आया जब—

ससुर जी बोले: ‘बहू, कहाँ खो गई?’

मैंने अपनी उखड़ती साँसों को थाम कर कहा: ‘पापा जी, कुछ नहीं वो…’

ससुर जी बोले: ‘कोई बात नहीं बहू, मुझे पता है रात तुम्हारी नींद पूरी नहीं हुई होगी।’

जब मैं ससुर जी के पास से उठ कर जाने लगी, तो वह बोले: ‘बैठो ना बहू, आज मेरे साथ तुम भी मिल कर नाश्ता कर लो। राजू की मम्मी जब से इस दुनिया से गई हैं, मैं हर चीज़ में अकेला सा हो गया हूँ।’

मैंने ससुर जी की आँखों में देखा, जो बड़े उदास मन से यह बात कह रहे थे। पता नहीं मुझे क्या हुआ, उनकी बात सुन कर मैं उनके पास नाश्ता लेकर बैठ गई। मैं ससुर जी के चेहरे की तरफ साइड पोज़िशन में बैठी थी। ससुर जी चाय की हर चुस्की के साथ मुझे निहार रहे थे।

वह सासू माँ के साथ बिताए अपने कुछ पल मुझे बता रहे थे और मैं उनकी हर बात को बड़े ध्यान से सुन रही थी। ससुर जी हर बात को बड़े विस्तार से मुझे समझा रहे थे। इससे पहले मैंने कभी ससुर जी के साथ बैठ कर इतनी बातें नहीं की थी।

ससुर जी बोले: ‘बहू, जब तक मैं हूँ तुम किसी बात की चिंता मत करना। आज-कल माहौल वैसे ही ठीक नहीं है, ऊपर से रातों में बिजली भी जा रही है। तुम्हें रात में कोई भी परेशानी हो, बेझिझक मुझे बता देना। अंधेरे की वजह से तुम्हें घबराने की ज़रूरत नहीं है।’

ससुर जी की इस बात से पक्का हो गया कि रात उन्होंने मुझे नंगा देख लिया था। मुझे उन्हें समझाने की कोशिश भी साफ़ समझ आ गई कि रात को पेशाब आने पर भी मैं उन्हें बता दिया करूँ।

ससुर जी के सामने बैठी मैं घूँघट के अंदर बड़ी शर्म महसूस कर रही थी। जिस मर्द के सामने मैं अपने जिस्म का हर कोना ढका करती थी, उसे सीधा मेरी नंगी गांड ही दिख गई थी। उफ़… सोच कर ही मुझे बड़ी लज्जा आ रही थी।

फिर बातें खत्म होने के बाद ससुर जी अपने खेत पर काम करने चले गए। मैं अपनी बच्ची को सुला कर बेड पर करवटें बदल रही थी। मुझे ससुर जी की बातें याद आ रही थीं कि वह एक औरत के बिना कितना अकेला महसूस करते हैं।

फिर मेरी आँख लग गई और दोपहर में तब खुली जब ससुर जी खेत से घर वापस आए। मैं अपने सिर पर लंबा पल्लू करके बाहर ससुर जी के पास उन्हें खाने के लिए पूछने गई। ससुर जी की हालत देख कर मेरी हँसी छूट गई; उनके हाथों और पूरे कपड़ों पर खेत की गीली मिट्टी लगी हुई थी।

ससुर जी का चेहरा भी पूरा गंदा हुआ पड़ा था। मैं अपनी हल्की हँसी को रोकते हुए बोली: ‘पापा जी, आज यह क्या हालत बना ली आपने?’

ससुर जी अपने कुर्ते को झाड़ते हुए बोले: ‘बहू, आज खेत में पानी की सिंचाई चल रही थी, मेढ़ों पर मिट्टी चढ़ानी पड़ रही थी!’

मैंने कहा: ‘पापा जी, आपको करने की क्या ज़रूरत थी? मजदूरों से करवा लेते।’

ससुर जी मेरे सामने अपनी छाती चौड़ी करके बोले: ‘डिंपी बहू, मैं अपने अंदर अब भी चार मजदूरों की ताकत रखता हूँ। मजदूर नहीं मिलने से खेत का काम तो नहीं रोक सकता था।’

ससुर जी की खुली और चौड़ी मर्दाना छाती पर मेरी नज़रें ठहर सी गई। मैं अपने होंठ दांतों तले दबा कर उनकी ताकत की कल्पना करते हुए सिहर उठी। मुझे पता नहीं आज क्या हो रहा था, मैं उनकी ओर खिंचती जा रही थी।

ससुर जी ने अपनी पीठ मेरी तरफ घुमाई और बोले: ‘बहू, मैं ज़रा नहा कर आता हूँ, तुम मेरे दूसरे कपड़े निकाल कर रख देना।’

उनके मुड़ जाने से मुझे थोड़ा होश आया, पर मन अंदर ही कहीं उदास सा हो गया था। मैं जैसे उन्हें उस हालत में और देखना चाह रही थी। मैंने अपने आप को संभालते हुए कहा: ‘ठीक है पापा जी, मैं खाना भी निकाल कर रेडी कर देती हूँ।’

मैं अपने कमरे में गई और पल्लू हटा कर अपने माथे के पसीने को पोंछते हुए हल्की सी मुस्करा दी। मेरा मन एक अजीब सी उत्तेजना और वासना का शिकार हुआ जा रहा था।

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मैं मुस्कुराते हुए ससुर जी के कपड़े निकाल कर उन्हें देने के लिए आगे बढ़ी। मैंने साड़ी के पल्लू से लंबा सा घूँघट तो कर लिया, पर अपनी नंगी कमर और पेट को ढकना ही भूल गई। मेरे होंठों पर हल्की मुस्कान थी और मैं ससुर जी की आंगन वाली चारपाई से आगे निकल गई। मुझे बिल्कुल होश नहीं रहा कि रोज़ाना मैं चारपाई पर ही कपड़े रखा करती थी।

मन में एक अजीब सी मिठास लिए मैं सीधा बाथरूम की ओर बढ़ती गई। जब मैं बाथरूम से पाँच कदम दूर पहुँची, तभी सामने का नज़ारा देख मेरी साँसें थम गईं। मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी, मैं ना आगे बढ़ पा रही थी ना पीछे।

मेरी आँखें बिना पलक झपकाए सामने देख रही थी। बाथरूम का दरवाज़ा पूरा खुला हुआ था और अंदर ससुर जी पूरे नंगे खड़े अपने चेहरे पर साबुन लगा रहे थे। ससुर जी का फौलादी शरीर देख मेरे मुँह से एक हल्की सी ‘आह…’ निकली और नीचे उनका ताना हुआ लंड देख—

मैं मन ही मन बोली: ‘हे भगवान! इतना मोटा और बड़ा…’

ससुर जी का लंड एक-दम तना हुआ था और उसकी नसें फूली हुई अलग ही चमक रही थी। लंड की चमड़ी ने उस विशाल सुपाड़े को हल्का सा ढका हुआ था और उसका आकार थोड़ा तिरछा था।

ससुर जी को इस हाल में देख मेरे पूरे बदन में आग लग गई थी। मैंने अपनी हथेलियों में साड़ी को कस कर जकड़ लिया। गहरी साँसें लेने के कारण मेरी चूचियाँ फूल रही थी और नीचे मेरी चूत की फांकें बेचैनी से खुल-बंद हो रही थी। ससुर जी जैसा फौलादी लंड मैंने कभी नहीं देखा था। उनका लंड हल्के-हल्के झटके मार रहा था, जिसे देख मेरी उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी। मैंने अपने कदम पीछे लेने की कोशिश की।

तभी मेरी पायलों की आवाज़ गूँज उठी। अब वही हुआ जिसका डर था। मैं ससुर जी की तरफ से आधा मुड़ चुकी थी कि तभी—

ससुर जी बोले: ‘अरे बहू, तुम?’

मैंने खुद को संभालते हुए डरे हुए अंदाज़ में कहा: ‘पापा जी… जी… वो तौलिया और कपड़े देने आई थी!’

मैंने एक हाथ से साड़ी का पल्लू पकड़े हुए घूँघट के अंदर से ही ससुर जी की तरफ तिरछी नज़र डाली। ससुर जी ने अपने लंड को छुपाने के बजाय उसे मुठियाते हुए कहा—

ससुर जी बोले: ‘डिंपी बहू, तौलिया यहीं रहने दो, बाकी कपड़ों को चारपाई पर रख देना।’

मैं इतना सुन कर, उनके लंड से अपनी नज़रें हटा कर भागते हुए कमरे में आ गई। ससुर जी के लिए जल्दी से खाना निकाल कर मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और बेड पर उल्टी लेट गई।

मैं बिस्तर पर लेटी अपने हाथ के नाखून चबाते हुए ससुर जी के लंड की तुलना अपने पति के लंड से करने लगी। ससुर जी के उस विशाल फौलादी मूसल के आगे मुझे पति का लंड एक ‘लूली’ जैसा नज़र आ रहा था। उफ़… यह सब सोचते हुए मैं बहुत गर्म होती जा रही थी।

मैंने अपनी गांड़ को हल्का सा ऊपर उठाया और एक हाथ साड़ी के अंदर डाल कर अपनी चूत को छुआ। उफ़… वह पूरी तरह गर्म होकर कामरस से गीली हो चुकी थी। मैं चूत की फांकों पर उंगलियां फेरते हुए बेहाल हो गई। अब मुझसे रहा नहीं गया, मैं सीधी हुई और अपनी साड़ी को ऊपर कर, पेंटी के किनारे से चूत में उंगली अंदर-बाहर करने लगी।

मुझे बहुत आनंद आ रहा था। मेरी चूत से फच-फच की आवाज़ आने लगी थी। मैं मन में ही बुदबुदवाई: ‘आह… डिंपी, वह तेरे ससुर का लंड है जिसे देख तू पागल हो रही है।’ पर अब मैं अपनी चूत को कैसे समझाती कि जिसके पास वह फौलादी लोड़ा है, वह रिश्ते में पिता समान ससुर है।

मैं चूत में तेज़ी से उंगलियाँ करते हुए खुद से ही सवाल-जवाब कर रही थी। थोड़ी ही देर में मेरी चूत ने अपनी पूरी आग उगल दी। झड़ने के बाद मैं खुद से ही शर्मा कर मुस्कुराते हुए तकिये में मुँह छुपा कर लेट गई। चूत की आग शांत होने पर मेरी बॉडी को राहत मिली और धीरे-धीरे मेरी आँख लग गई।

शाम को जब मेरी नींद खुली, तो कमरे से बाहर जाने में मुझे बड़ी शर्म आ रही थी। मैं डरते हुए बाहर गई और फ्रेश होकर खुद को आईने में देखने लगी। मुझे अपने आप पर शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैं ससुर जी का लंड देख कर इतनी गर्म हो गई थी। मैंने खुद से ही कहा कि मुझे खुद पर काबू रखना चाहिए था।

फिर मैं शाम ढलते ही खाना पकाने में लग गई। ससुर जी बाहर टहल कर आए और मैंने झिझकते हुए उनके लिए खाना लगा दिया। वह खाने के बाद तुरंत अपनी चारपाई पर सो गए। मैं काम निपटा कर और बच्ची को दूध पिला कर कमरे का दरवाज़ा अच्छे से लॉक करके सो गई।

सुबह जब मैं सोकर उठी, तो मेरा मूड रोज़ के मुकाबले आज ज़्यादा फ्रेश लग रहा था। मैं नहाने गई और बदन को अच्छे से साफ़ करने लगी। आज मैंने अपनी बालों से भरी चूत को उस्तरे से एक-दम क्लीन कर लिया। मेरी फूली हुई चूत की मोटी फांकें अब बिना बालों के मुझे खुद बहुत सुंदर लग रही थी। फिर मैंने एक स्टाइलिश पेंटी पहनी और उसके ऊपर एक बैकलेस डोरी वाला ब्लाउज पहनने का मन बनाया, इसलिए मैंने अंदर ब्रा नहीं पहनी।

फिर एक मस्त सी साड़ी पहन कर मैंने नाश्ता तैयार किया। ससुर जी रोज़ की तरह सोकर उठे और नहाने के बाद नाश्ते के लिए आंगन में आए। मैं ससुर जी के लिए नाश्ता लेकर जा रही थी और आज मेरे अंदर की कामुकता मुझे पूरी तरह बदले हुए थी।

मैंने अपनी चूचियों को साड़ी के नीचे बिना ब्रा के थोड़ा ऊपर की ओर टाइट किया हुआ था, जिससे मेरी चूचियों की क्लीवेज और उनकी गहराई साफ़ झलक रही थी। मैंने पल्लू को थोड़ा खिसका कर अपने पेट और कमर को खुला छोड़ दिया था। मैं ससुर जी के पास जाते ही झुक कर उनके पैरों को छूने लगी।

ससुर जी ने अपना हाथ मेरे सिर से लेकर मेरी नंगी पीठ पर फेरते हुए कहा: ‘खुश रहो बहू! जल्दी से मुझे तुमसे एक पोता मिले।’

मैं मन ही मन मुस्कुराई और कहा: ‘पापा जी, पोता तो तब मिलेगा ना, जब मेरे अंदर मर्दाना बीज जाएगा!’

ससुर जी मेरी उभरी हुई सुंदर चूचियों की क्लीवेज देख कर बहुत खुश नज़र आ रहे थे। वह बार-बार मेरी बनारसी साड़ी की तारीफ करते हुए मुझे अपने पास बिठा कर बातें करने का बहाना ढूँढ रहे थे। मैं अपनी कमर बलखाते हुए उनके सामने से कमरे में आ गई। मेरी क्लीन चूत में शाम होते-होते हल्की खुजली और बेचैनी होने लगी थी।

फिर रात का खाना खाने के बाद ससुर जी सो गए। मेरे कमरे में आते ही थोड़ी देर में बच्ची भी सो गई। मैं अपनी साड़ी उतार कर सिर्फ पेंटी में खड़ी सोचने लगी कि आज कौन सी नाइटी पहनूँ। मेरी चूचियों में दूध भरा हुआ था जिससे वह भारी हो रही थीं। मैंने वह शर्ट-नाइटी पहनने का सोचा जिसका गला बड़ा था और कंधों पर बस पतली सी डोरियाँ थीं।

अंधेरे के साथ रात काफी गहरी हो चुकी थी। मैं अपने बेड पर करवटें बदल रही थी और मेरी बंद आँखों के सामने ससुर जी का वह तना हुआ फौलादी लंड नज़र आ रहा था। इसे याद करते ही मेरा मूड पूरी तरह चुदासी हो गया। मेरा हाथ अपनी चिकनी और साफ़ चूत पर चला गया, जिसे छूते ही मैं और गर्म हो गई। चूत को सहलाते हुए मुझे अपने डबल बेड पर पति की कमी और ससुर जी की ज़रूरत महसूस होने लगी थी।

मेरा जोश सातवें आसमान पर था, तभी अचानक बिजली चली गई। अंधेरे के डर ने मेरे जोश को थोड़ा ठंडा कर दिया और अब चूत झड़ने के बजाय फिर से पेशाब का दबाव महसूस करने लगी थी। मैं बेचैन होने लगी, फिर फोन की लाइट जला कर जैसे ही कमरे का दरवाज़ा खोला, तो देखा ससुर जी जगे हुए थे।

मुझे देख ससुर जी बोले: ‘डिंपी बहू, क्या हुआ? कुछ परेशानी है तो बताओ?’

तो दोस्तों, इसके आगे चुदासी बहू अपने ठरकी ससुर के साथ क्या गुल खिलाती है, यह जानने के लिए मेरी कहानी पर बने रहें। उम्मीद करता हूँ कहानी पसंद आ रही होगी। आप सब भी अपनी बातें साझा कर सकते हैं, मैं उन्हें पूरी तरह गुप्त रखूँगा। आपके फीडबैक का इंतज़ार रहेगा। धन्यवाद।support@mohakkisse.com

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