पिछला भाग पढ़े:-घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-2
हिंदी सेक्स कहानी अब आगे-
अंधेरा होने की वजह से ससुर जी मुझे सही से नहीं देख पा रहे थे। मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी ससुर जी को बताने में हिचकिचा रही थी। मैंने कमरे के थोड़ा अंदर जाकर एक बड़े दुपट्टे से अपना सिर और कंधे तो ढंक लिए, पर मेरी चिकनी जांघें और आधी टांगें अब भी नंगी थी, जिसका मुझे होश नहीं था। मेरी चूत की नसें पेशाब के दबाव से फूलती जा रही थी, जिसे अब बर्दाश्त करना नामुमकिन था।
मैं अपनी शर्म की दीवार को तोड़ते हुए बोली: “पापा जी… वो, मुझे टॉयलेट जाना था!”
ससुर जी बोले: “बहू, इसमें मुझसे क्या शर्माना? तुम बिल्कुल अपनी सासू माँ पर गई हो, वह भी रातों को ऐसे ही डरा करती थी। आओ, मैं तुम्हें टॉयलेट तक छोड़ देता हूँ।”
ससुर जी उस समय सिर्फ लुंगी पहने हुए थे। वह अपने हाथ में एक छोटी टॉर्च लिए थोड़ा आगे बढ़े, तो मैं कमरे से बाहर निकली। अंधेरा होने पर भी मैं ससुर जी की शर्म के मारे लंबा घूँघट किए हुए थी और धीरे-धीरे उनके पीछे चल रही थी। ससुर जी बाथरूम से कुछ कदम पहले रुक गए और टॉर्च की रोशनी दरवाज़े पर मारते हुए बोले—
ससुर जी: “जाओ बहू, मैं यहीं खड़ा हूँ!”
मैं उनके कहने के बाद भी कुछ देर चुप-चाप खड़ी रही, फिर डरते हुए बोली: “पापा जी, मुझे उसके अंदर जाने में डर लग रहा है!”
ससुर जी बोले: “ओहो बहू! जाओ, मैं यहाँ खड़ा हूँ फिर भी डर रही हो? रुको, मैं पहले चेक कर लेता हूँ, फिर तुम चली जाना। अगर फिर भी डर लगे, तो दरवाज़ा बंद मत करना, मैं टॉर्च की रोशनी से बाहर निगरानी करता रहूँगा।”
ससुर जी ने पहले अंदर जाकर चेक किया, फिर मैं दबे पाँव बाथरूम के अंदर गई। मैंने इधर-उधर देखा और झट से अपनी नाइटी कमर के ऊपर तक उठा कर चौखट के पास ही नीचे बैठ गई। मेरी चिकनी गोरी और चौड़ी नंगी गांड दरवाज़े से बाहर की तरफ झाँक रही थी।
मेरी चूत से निकलती धार रात के सन्नाटे में तेज़ आवाज़ कर रही थी, जो सीधा ससुर जी के कानों तक पहुँच रही थी। ससुर जी टॉर्च की रोशनी इधर-उधर घुमा रहे थे, और कभी-कभी वह रोशनी जान-बूझ कर मेरी नंगी गांड पर भी पड़ जाती थी। मैं बस पेशाब करने में मगन थी। मेरी चूत से वह रुका हुआ काम-रस भी बह रहा था, जो कुछ देर पहले ससुर जी का खयाल आने से बन गया था।
ससुर जी दूर खड़े हैं, यही सोच कर मैं बेफिक्र थी और मेरे मुँह से हल्की सिसकारियाँ—’आह… उफ़…’ निकल रही थी। जैसे ही चूत से पेशाब और कामरस का मिश्रण निकला, मुझे शांति मिली। मैंने पानी से खुद को साफ़ किया और खड़ी हो गई। मैं अपनी नाइटी को अभी नीचे करने ही वाली थी कि—
तभी बाहर से ढेर सारे लोगों की एक तेज़ आवाज़ गूँज उठी— “चोर… चोर… चोर! जंगल की तरफ भाग रहा है! पकड़ो!”
वह शोर सुनते ही मेरी रूह काँप गई। मेरा दिमाग सुन्न हो गया और नाइटी को बिना नीचे किए, मैं पूरी नंगी गांड और चूत के साथ बाथरूम से बाहर निकली और सीधे ससुर जी की बाहों में जा लिपटी।
ससुर जी बाथरूम के दरवाज़े के बिल्कुल सामने खड़े थे। पेशाब करते समय वह कब मेरे इतने करीब आ गए, मुझे इसका अंदाज़ा भी नहीं हुआ था।
मैं डर की वजह से ससुर जी की बाहों में ऐसी लिपटी हुई थी कि मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। ससुर जी मेरी पीठ सहलाते हुए क्या बोल रहे थे, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
मैंने अपने दोनों हाथों से उनकी कमर को ज़ोर से जकड़ रखा था और मेरा चेहरा उनकी नंगी छाती से चिपका हुआ था। डर के मारे तेज़ साँसें लेने की वजह से मेरी चूचियाँ ज़ोर-ज़ोर से फूल रही थी, जो ससुर जी के सख्त सीने से बुरी तरह मसल रही थी।
पेशाब करते समय मैंने अपनी नाइटी कमर में खोंस ली थी, जिस वजह से वह अभी भी वहीं अटकी हुई थी। ससुर जी अपनी हथेलियाँ मेरी कमर से नीचे फिसलाते हुए मेरी नंगी गांड तक ले आए थे।
बाहर अभी तक लोग चोर-चोर चिल्ला रहे थे; चोर लोगों के हाथ आया या नहीं, पर चोरों की वजह से मेरी इज़्ज़त अब ससुर जी के हाथों में आ चुकी थी।
ससुर जी मेरी नंगी गांड की गोलियों पर बहुत ही धीरे-से अपना हाथ फेर रहे थे, साथ ही मुझे डर से निकालने का झूठा दिलासा भी दे रहे थे। डर की वजह से मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया था और मैं आँखें बंद किए ससुर जी की बाहों में बस सिसक रही थी।
ससुर जी मेरे डर का पूरा फायदा उठा रहे थे; वह अपनी उंगलियों को मेरी गांड की दरार के बीच गहराई तक ले जा रहे थे। उनकी उंगलियों की छुअन महसूस करके मैं उनकी बाहों में हल्का सा कसमसा उठी।
ससुर जी अपनी उंगलियाँ दरार से हटाते हुए बोले: “बहू, थोड़ी हिम्मत करो। तुम कमरे में जाओ, बच्ची अकेली है! मैं बाहर का माहौल देख कर आता हूँ।”
मैं ससुर जी के दूर जाने के डर से उनसे और चिपक गई और बोली: “पापा जी, नहीं! मुझे अकेला मत छोड़िए, आप कहीं नहीं जाएँगे!”
ससुर जी फिर मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले: “ठीक है बहू, मैं तुम्हें कमरे तक छोड़ देता हूँ।”
ससुर जी मेरा सिर अपने सीने से चिपकाए हुए ही चलने लगे। उनका एक हाथ मेरी नंगी कमर पर था और दूसरे हाथ से वह टॉर्च की रोशनी कर रहे थे। मैं डरी-सहमी हुई धीरे-धीरे कमरे तक आ गई। ससुर जी ने मुझे सहारा देकर बेड के किनारे बिठा दिया और मेरे दुपट्टे को माथे तक ठीक किया। मेरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था।
ससुर जी ने उसी दुपट्टे से मेरा पसीना पोंछा और मुझे पानी का गिलास दिया। प्यास और डर से मेरा गला सूख चुका था, इसलिए मैं ससुर जी के हाथों से पानी पीने लगी। शादी के बाद पहली बार मैं उनके सामने बिना घूँघट के थी और उनके हाथों से पानी पी रही थी।
गला तर होने के बाद भी मेरी आँखें नम थी। मैं अभी भी सदमे में थी और सिसकते हुए फिर से उनके सीने से लिपट गई।
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ससुर जी मेरी पीठ सहलाते हुए बोले: “बहू घबराओ मत, मैं यहीं हूँ। मेरी इतनी प्यारी बहू होकर भी इतना डर रही हो?”
बाहर गाँव वालों का शोर अब थोड़ा कम हो गया था, पर मेरे दिल की धड़कन अब भी बहुत तेज़ थी। ससुर जी ने मेरे डर को भाँप लिया और मुझे सहारा देते हुए बेड पर लेटाने लगे। पर मैंने उन्हें इतनी मज़बूती से जकड़ रखा था कि उन्हें भी मेरे साथ ही बेड पर लेटना पड़ा।
हम दोनों साइड पोज़िशन में लेटे हुए थे। मेरा चेहरा ससुर जी के सीने से चिपका हुआ था और मेरा एक हाथ उनकी कमर के ऊपर था। ससुर जी का एक हाथ मेरे सिर पर और दूसरा मेरी कमर और कंधों को सहला रहा था। उनके सीने से चिपके होने के कारण उनकी मर्दाना खुशबू मेरे अंदर बस रही थी, जिसे मैं आँखें बंद किए महसूस कर रही थी।
मेरी कमर पर रखा ससुर जी का हाथ अब सरकते हुए मेरी नंगी पीठ पर आ गया था। वह कभी-कभी अपनी उंगलियों से मेरे बूब्स को भी टच कर रहे थे। उनके हाथों की छुअन से मेरे अंदर भीषण उत्तेजना पैदा हो रही थी। जैसे-जैसे डर कम हो रहा था, मैं ससुर जी के स्पर्श को गहराई से महसूस कर पा रही थी।
ससुर जी ने मेरी कमर सहलाते हुए नाइटी को गांड से ऊपर खिसका दिया था। जैसे ही उनकी हथेलियों ने मेरी नंगी और कोमल गांड को छुआ, मैं अंदर तक हिल गई। मेरे पूरे जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई। अब मैंने अपनी आँखें मूंदे ससुर जी के सीने से लिपटे हुए अपनी तेज़ साँसों को थोड़ा धीमा कर लिया।
थोड़ी देर बाद ससुर जी को लगा कि शायद मैं सो गई थी। वह अपने होंठों को मेरे चेहरे के करीब लाए और पहले मेरे माथे और फिर गालों को चूम लिया। उनकी गर्म साँसों को महसूस करके मैं और भी उत्तेजित हो गई और अब पूरी तरह होश में आ चुकी थी।
मैं उनकी बाहों में शर्म तो महसूस कर रही थी, पर मेरी भड़की हुई कामवासना इस पल का आनंद लेने पर मजबूर कर रही थी।
मुझमें कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं थी और मेरी इसी चुप्पी का फायदा उठा कर ससुर जी आगे बढ़ रहे थे। उनकी उंगलियाँ पीछे से मेरी जांघों के बीच पहुँच कर चूत के होंठों को रगड़ने लगी थी। महीनों बाद अपनी चूत पर किसी मर्द का स्पर्श पाकर मुझे अद्भुत आनंद मिल रहा था। हालाँकि मन के एक कोने में यह डर भी था कि मैं अपने ससुर के साथ यह सब कर रही हूँ, पर शरीर काबू से बाहर था।
रात के अंधेरे में ससुर जी जो मज़ा मुझे दे रहे थे, मैं उसके लिए महीनों से तड़प रही थी। मेरी चूत उनके मर्दाने हाथों के जादू से पूरी तरह गीली हो चुकी थी। रिश्ता गलत था, यह जानते हुए भी अब मैं उन्हें रोकना नहीं चाहती थी। मुझे ससुर जी का सख्त और गर्म लंड आगे से अपनी चूत पर साफ़ महसूस हो रहा था, जिसकी कठोर चुभन मुझे और भी मदहोश कर रही थी।
मैंने नींद का बहाना करते हुए अपनी जांघों को हल्का सा खोल दिया, जिससे ससुर जी का वह कठोर लंड मेरी चूत की फांकों के बिल्कुल करीब पहुँच गया। उस सख्त और मोटे लंड की छुअन ने मुझे पूरी तरह कामवासना के वश में कर दिया था। अब ससुर जी जो भी कर रहे थे, मैं उसे पूरी तरह स्वीकार कर रही थी।
ससुर जी का हाथ अब आगे की ओर बढ़ा और जैसे ही उन्होंने मेरी चूत की गीली फांकों को छुआ, उनकी साँसें थम सी गई। कुछ देर बाद ससुर जी ने हिम्मत जुटाई और मेरे होंठों पर एक गहरा और कामुक चुंबन किया। मेरे कोमल होंठों का रस उन्हें इतना भाया कि वह बार-बार मुझे चूसने लगे।
अब मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने अपने होंठ हल्के से खोल दिए ताकि वह मेरा रसपान कर सकें। ससुर जी एक हाथ से मेरी चूत को सहलाते हुए मेरे निचले होंठ को अपने दाँतों और होंठों के बीच दबा कर चूसने लगे। मैं बिना हिले, उनका साथ दिए बिना ही इस मीठे अहसास का मज़ा ले रही थी।
ससुर जी मेरी करारी और ताज़ी जवानी का पूरा लुत्फ उठा रहे थे और मैं भी पूरी तरह लुट जाना चाहती थी, पर बस एक शर्म और रिश्ते की झिझक की वजह से चुप थी। मैंने आज तक अपने पति के साथ बिस्तर पर भी खुद को इतना गर्म महसूस नहीं किया था, जितना आज अपने पिता समान ससुर जी के साथ महसूस कर रही थी।
मेरी चूत अपना काम-रस ससुर जी की उंगलियों पर छोड़े जा रही थी। मैं होश में हूँ, इसका उन्हें पता ना चले, इसलिए मैंने अपनी सिसकारियों को दबा रखा था। ससुर जी लगातार मेरे दोनों होंठों को चूस रहे थे, तभी अचानक मेरी बच्ची रोने लगी। बच्ची की आवाज़ सुनते ही ससुर जी एक-दम शांत पड़ गए, पर उनके होंठ अभी भी मेरे होंठों से चिपके हुए थे। अब हम दोनों की ही साँसें रुक गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, बच्ची सिसक रही थी।
जब बच्ची ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, तो ससुर जी ने धीरे से अपने होंठ अलग किए और मेरी गीली चूत से भी अपना हाथ बड़े प्यार से हटा लिया। मेरे अंदर अब भी यह हिम्मत नहीं थी कि उन्हें अपने जगे होने का पता चलने दूँ। ससुर जी मेरे जिस्म से अलग हो गए थे। जब काफी देर हो गई और बच्ची मेरा दूध ढूँढने के लिए मेरी पीठ पर हाथ-पैर मारने लगी, तो मुझसे और नहीं रहा गया।
मैं बड़े आराम से करवट बदलते हुए नाइटी के ऊपरी हिस्से से अपना एक उभरा हुआ बूब्स बाहर निकाल कर बच्ची के मुँह में लगा देती हूँ। ससुर जी मेरी पीठ के पीछे बिल्कुल शांत लेटे हुए थे। अब शायद उन्हें थोड़ी झिझक और शर्म महसूस हो रही थी, वह अपनी साँसों को रोके हुए थे—शायद वह यही सोच रहे थे कि मैं अभी भी नींद में हूँ।
मेरी चिकनी और गोरी गांड पूरी तरह नंगी पड़ी थी। मैं मन ही मन चाह रही थी कि ससुर जी फिर से मेरे पीछे चिपक जाएँ, पर वह दोबारा करीब आने से कतरा रहे थे। मैं ससुर जी के उस मोटे और फौलादी लंड से पूरी तरह तृप्त होना चाहती थी; अपनी चूत में महीनों से लगी इस आग को अब और जलने नहीं देना चाहती थी।
मेरी चूत से रिसता हुआ कामरस मेरी जांघों को भिगो रहा था, पर ‘ससुर जी आओ और मेरी प्यास बुझाओ’—यह कहने की मुझमें हिम्मत नहीं हो रही थी।
मेरी चुदास अब और भी भड़क चुकी थी, मैं बस ससुर जी के मर्दाने और कठोर शरीर के नीचे बिछ जाना चाहती थी। काफी देर बीत चुकी थी और बच्ची भी अब दूध पीते-पीते नींद के आगोश में जा चुकी थी।तभी ससुर जी बेड पर आहिस्ता से हिलते हैं। उनके हिलने मात्र से मेरे मन में खुशी की एक लहर दौड़ गई, यह सोच कर कि अब ससुर जी फिर से मेरे करीब आएँगे।
पर अगले ही पल मेरी उम्मीदों पर पानी फिर गया। मेरे दिल की धड़कन थम सी गई और साँसें तेज़ हो गई। मैं खुल कर यह नहीं कह सकती थी कि मैं कितनी चुदासी हो रही हूँ। अब समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ? मेरी आँखें पूरी तरह खुल चुकी थी और कमरे में हल्का अंधेरा छाया हुआ था। मैंने बड़े आराम से अपनी गर्दन घुमा कर देखा—ससुर जी बेड से उतर रहे थे।
मैं उन्हें रोकने के लिए कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। मैं उन्हें अपने डर के लिए नहीं, बल्कि अब अपने जिस्म की गर्मी शांत करने के लिए रोकना चाहती थी।
मेरा अंतर्मन बार-बार कह रहा था— ‘डिंपी, रोक ले उन्हें! उनके पास वह मजबूत और कठोर लंड है जिसे लेकर तेरी चूत शांत हो जाएगी। कुछ कर डिंपी, कुछ कर!’
पर मेरे अंदर की चुदासी औरत अभी भी रिश्ते की उस आखिरी सीमा को लांघने का साहस नहीं जुटा पा रही थी।
तो दोस्तों, अब सवाल यह है कि क्या डिंपी की बेकाबू वासना मर्यादा की इस दीवार को तोड़ कर ससुर जी को रोक पाएगी? क्या उस रात उस कमरे में ससुर के फौलादी लंड और बहू की प्यासी चूत का मिलन होगा? यह जानने के लिए मेरी इस कहानी के अगले भाग का इंतज़ार करें।
जिस तरह मेरी पाठक डिंपी ने मुझ पर भरोसा करके अपनी यह बेहद निजी और उत्तेजक कहानी मेरे साथ साझा की है, उसी तरह आप भी अपनी कहानियाँ और अनुभव मुझे भेज सकते हैं। मुझे नए लोगों से जुड़ना और उनके राज़ जानना बेहद पसंद है।
उम्मीद करता हूँ कि डिंपी और उसके ससुर की यह दास्तां आपको पसंद आ रही होगी। अपना फीडबैक मुझे ईमेल पर ज़रूर दें, मुझे आपके जवाबों का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!support@mohakkisse.com धन्यवाद।