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माँ की चुदाई पठन समय: 20 मिनट पढ़ा गया: 425 बार

संस्कारी विधवा मां का रंडीपना-30(Sanskari vidhwa maa ka randipana-30)

moodchangerboy

08 Apr 2016 को प्रकाशित

संस्कारी विधवा मां का रंडीपना-30(Sanskari vidhwa maa ka randipana-30)
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हिंदी चुदाई कहानी अब आगे-

मम्मी की नज़रें मेरे नग्न शरीर और नीचे अंगड़ाई लेते लंड पर टिक गई थी। उनके हाथ से बर्तन छूट कर ज़मीन पर गिर गया था, पर उन्हें उसका होश ही नहीं था। उनके चेहरे पर हैरानी, शर्म और एक अजीब सी तड़प के मिले-जुले भाव साफ़ नज़र आ रहे थे।

मैंने उनकी तरफ मुड़ कर देखा और जान-बूझ कर कोई हड़बड़ाहट नहीं दिखाई। अपनी जांघों पर तेल मलते हुए मैंने बहुत ही शांत आवाज़ में पूछा, “मम्मी, आप कॉफी लेकर आई थी? यह आवाज़ कैसी हुई?”

मम्मी हड़बड़ा कर अपनी नज़रें फेरने की कोशिश करने लगी, पर उनकी आँखें बार-बार मेरे गठीले शरीर और उस उत्तेजित अंग की तरफ ही जा रही थी। वो हकलाते हुए बोली, “वो… हाँ बेटा, मैं कॉफी लाई थी… पर तू… तूने दरवाज़ा क्यों नहीं लगाया?”

उनकी आवाज़ कांप रही थी। मैंने एक गहरी साँस ली और सोफे पर रखे तौलिए की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा, “अरे, शायद मैं भूल गया था। जिम की थकान इतनी थी कि बस शरीर की मालिश करने बैठ गया।” मैं जान-बूझ कर अपनी कमर पर धीरे-धीरे तौलिया लपेट रहा था, ताकि मम्मी आराम से मेरे लंड का पूरा नज़ारा ले सकें। तौलिया बांध कर जब मैं उनके पास जाने लगा, तो देखा कि मम्मी अपना चेहरा दूसरी तरफ किए खड़ी थी।

मैंने कहा, “मम्मी, आप इतनी घबरा क्यों रही हैं? आखिर माँ ही तो हैं आप मेरी!”मम्मी ने अपनी ओढ़नी को कस कर पकड़ लिया और नीची नज़रें किए हुए बोली, “बेटा, तू अब बच्चा नहीं रहा। तेरी बॉडी… एक मज़बूत मर्द में बदल गई है। माफ करना, मुझे इस तरह तेरे सामने नहीं आना चाहिए था।”

मम्मी की ये बात सुन कर मुझे समझ आ गया कि मेरा तीर एक-दम निशाने पर लगा है। जुनैद का नशा अब उनके सिर से उतरने लगा था और मेरा नशा उन पर चढ़ रहा था। मम्मी के हाथ से कॉफी का कप लेते हुए मैंने कहा, “ओहो मम्मा, कोई बात नहीं, इसे भूल जाइए!”

उसके बाद मैं तौलिए में ही मम्मी के साथ बैठ कर डिनर करने लगा। खाना खाते वक्त मैं देख रहा था कि मम्मी बार-बार मेरी चौड़ी छाती पर ही अपनी नज़रें टिका रही थी।

इसके बाद मम्मी अक्सर मुझसे बातें करने लगी थी। मेरे शॉप जाने से पहले वो मेरा लंच तैयार कर देती और शाम को घर आते ही मेरे लिए कॉफी तैयार रखती। एक रात मैं अपने बदन पर सिर्फ लुंगी लपेटे उनके साथ डिनर कर रहा था। मैंने देखा कि मम्मी बड़ी उदास बैठी थी और खाने के निवाले को एक टक घूर रही थी।

मैंने उनके हाथ पर अपना हाथ रखा, तो वो अचानक घबरा गई। मैंने पूछा, “मम्मी, क्या हुआ? आप कहाँ खो गई हैं?”

मम्मी ने खुद को संभालते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटा… तेरा काम कैसा चल रहा है?”

मैंने जवाब दिया, “मम्मी, काम अब अपने दम पर एक बार फिर से बढ़ा रहा हूँ, इसलिए मेहनत थोड़ी ज़्यादा बढ़ गई है। पर आप बताइए, आप क्या सोच रही थी?”

मम्मी बोली, “बेटा, मैं घर में अकेले रह कर बोर हो जाती हूँ। सोच रही हूँ कि तेरे साथ मैं भी शॉप पर चलूँ और तेरा हाथ बँटाऊँ!”

मैंने कहा, “ओहो मम्मा, आप क्यों तकलीफ उठा रही हैं? मैं अकेला सब संभाल रहा हूँ ना।”

मम्मी ने ज़ोर देते हुए कहा, “बेटा मैं देख रही हूँ, काम की वजह से तुझे सुबह बहुत जल्दी जाना पड़ता है। अब मैं भी तेरे साथ जाना चाहती हूँ।”

मैंने फिर समझाया, “मम्मी, आप घर संभालिए, मैं अकेला शॉप के लिए काफी हूँ।”

मेरी यह बात सुनते ही मम्मी ने गुस्से में मुँह फुला लिया और बोली, “तुम भी अब बिल्कुल अपने पिता जी की तरह बात करने लगे हो। वो भी कभी नहीं चाहते थे कि मैं शॉप पर जाऊँ, बस यही चाहते थे कि मैं घर संभालूँ!”

मम्मी गुस्से में उठ कर जाने लगी, तो मैं तुरंत उनके सामने खड़ा हो गया और उनके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, “ओहो मम्मा, आप तो गुस्सा हो गई! भला ऐसे कोई खाना छोड़ कर जाता है? ठीक है, अगर आपको मेरे साथ शॉप पर चलना है तो चलिए, पर मैं वहाँ आपको कोई काम नहीं करने दूँगा।”

मम्मी के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई और वो बोली, “तू बिल्कुल अपने पापा पर गया है, वो भी मुझे कुछ काम नहीं करने देते थे…”

मैंने खुशी से मम्मी को अपनी बाहों में भर लिया और कहा, “पापा की हर चीज़ और हर ज़िम्मेदारी को अब मुझे ही संभालना है, तो उनके जैसा तो मुझे बनना ही पड़ेगा ना?”

मम्मी मेरी नंगी पीठ पर अपने कोमल हाथ फेरते हुए और अपना सिर मेरे सीने पर टिका कर बड़ी उदास आवाज़ में बोली, “बेटा, तेरे पापा की हर चीज़ को संभालने के लिए सिर्फ उनके जैसा दिखना काफी नहीं है। तुझे एक मज़बूत और बहादुर मर्द बन कर उनकी हर कमी को पूरी तरह से भरना होगा।”

मैंने बड़े प्यार से मम्मी का चेहरा अपने सीने से उठाया और उनके माथे को चूमते हुए अपनी छाती और डोले फुला कर बोला, “मम्मी, क्या मैं उस जुनैद से भी ज़्यादा मज़बूत और ताकतवर नहीं लग रहा?”

मेरा यह सवाल सुनते ही मम्मी की धड़कनें तेज़ हो गई। उन्होंने एक बार फिर अपनी नज़रें उठा कर मेरी आँखों में देखा। उनके चेहरे पर अब कोई डर नहीं था, बल्कि एक औरत की वो दबी हुई चाहत साफ़ झलक रही थी।

अगले दिन, नाश्ता करने के बाद मैं तैयार होकर कमरे से बाहर आया और मम्मी की तरफ मुस्कुराते हुए पूछा, “मम्मी, आपको शॉप पर चलना था ना, आप अभी तक तैयार नहीं हुई?”

मम्मी झट से बोली, “बेटा, मैं तो तैयार ही हूँ!”

मम्मी ने एक साधारण सूट-सलवार पहना हुआ था, जो पुराने फैशन का लग रहा था।

मैंने कहा, “क्या? आप ऐसे जाएँगी? ओहो मम्मा, आप शॉप की मालकिन हैं, वहाँ आपका रुतबा अलग ही दिखना चाहिए!”

मेरे काफी ज़िद करने पर मम्मी मुझे अपने कमरे में ले गई और अपनी अलमारी खोल कर बोली, “बेटा, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा, अब तुम ही इसमें से कुछ निकाल कर दो जो मैं पहन सकूँ।”

मैंने पूरी अलमारी खंगाली और एक घुटनों तक की “क्रॉप ड्रेस” निकाल कर उनके हाथ में थमा दी। उसे देख कर मम्मी उदास होकर बोली, “बेटा, ये फैशनेबल ड्रेसेस अब मुझे चुभन देती हैं।”

तब मैंने एक बेहद खूबसूरत साड़ी निकाली, जिसका रंग पिस्ता हरा था। उस ऑर्गेंज़ा फैब्रिक में एक हल्की सी चमक थी। साड़ी के किनारों पर बारीक सुनहरी कढ़ाई और ज़री का काम था, जो उसे एक शानदार लुक दे रहा था।

मम्मी उस साड़ी को देख कर मुस्कुराई और बोली, “बस दस मिनट दो मुझे, मैं अभी तैयार होकर आती हूँ!”

फिर मम्मी कमरे के अंदर बने बाथरूम में चली गई और मैं बेड पर बैठ कर उनका इंतज़ार करने लगा। कुछ देर बाद जब मम्मी बाहर आई, तो मैं उन्हें देखता ही रह गया।

मम्मी उस लग्ज़री साड़ी में गज़ब ढा रही थी। उनके ब्लाउज का डिज़ाइन बेहद खूबसूरत था, उसका डीप वी नेक आगे से गहरा था और पीछे से वह पूरा बैकलेस डोरी वाला था। उनके उभारों का आधा हिस्सा ब्लाउज से बाहर झाँक रहा था, जिसे देख आज मेरा मन और ईमान दोनों डोल रहे थे। सुनहरे कॉपर शेड के सिल्क फैब्रिक वाला वह ब्लाउज साड़ी के साथ एक शानदार कंट्रास्ट बना रहा था, जिसकी आस्तीनें कोहनी तक थी।

मम्मी मुस्कुराती हुई बाहर आ रही थी। उनके चेहरे पर इतने दिनों बाद ऐसी खुशी देख कर मुझे भी बहुत सुकून मिल रहा था।

मम्मी मेरे पास आकर बोली, “बेटा, ऐसे क्या घूर रहे हो? मैंने ज़्यादा देर तो नहीं कर दी?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “आज पक्का मेरी शॉप पर कस्टमरों की भीड़ लग जाएगी आपको देख कर!”

मम्मी शर्माते हुए बोली, “भला लोग मुझे क्यों देखेंगे?”

मैंने जवाब दिया, “क्योंकि आप लग ही इतनी सुंदर रही हैं!”

इसके बाद मम्मी आईने के सामने खड़ी होकर अपने बाल संवारने लगी। मैंने गौर किया कि उनकी कलाइयां सूनी थी। मैंने अलमारी से साड़ी से मैच करती हुई हरे रंग की चूड़ियाँ निकाली और उनकी कलाई पकड़ कर उन्हें पहनाने लगा। वो चूड़ियाँ उनकी कलाई पर बहुत फब रही थी।

मम्मी ने भावुक होकर मुझे गले लगा लिया और बोली, “राहुल, सच कहूँ तो आज तुम मुझे दूसरी बार एक नया जीवन दे रहे हो। मैं इस बार तुम्हें निराश नहीं करूँगी, अब मैं तुम्हारे साथ अपनी ज़िंदगी खुशियों से बिताना चाहती हूँ।”

मैंने उनकी पीठ सहलाते हुए कहा, “मम्मी, आपने मुझे कभी निराश नहीं किया। मेरी ही गलती थी कि मैंने आपकी ज़रूरतों का ख्याल नहीं रखा!”

मेरी यह बात सुनते ही मम्मी ने मुझे और भी ज़ोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया। उनके भरे हुए बूब्स मेरी मज़बूत छाती से बुरी तरह दबे हुए थे। मम्मी जब भी सांस लेती, उनके उभारों की रगड़ और उनके टाइट निप्पल्स का अहसास मेरी छाती पर किसी चुंबन की तरह महसूस हो रहा था। कुछ देर तक वो इसी तरह मुझसे लिपटी रहीं, तो मैंने शरारत से कहा, “सविता जी, अब हमें शॉप पर भी चलना चाहिए, देर हो रही है!”

मम्मी झट से मेरी बाहों से अलग हुई और मुस्कुराते हुए बोली, “जी, बस एक मिनट… मैं अभी बाथरूम से होकर आई।”

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थोड़ी देर बाद हम शॉप पर पहुँच गए। मम्मी को मेरी सीट पर बैठा देख आज कस्टमर्स कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी ले रहे थे। कुछ लोग तो मन ही मन अंदाज़ा लगा रहे थे कि इतनी खूबसूरत महिला आखिर मेरी क्या लगती होगी।

शाम तक शॉप पर आज काफी अच्छी सेल हुई। जब हम घर लौट रहे थे और घर के थोड़े ही करीब पहुँचे थे, तभी मम्मी बोली, “राहुल, घर आने वाला है, क्या आज तुम्हें जिम नहीं जाना?”

मैंने थोड़ा हैरान होते हुए कहा, “ओहो, मैं तो बिल्कुल भूल ही गया था। खैर, अब तो घर आ ही गए हैं, जिम कल चला जाऊँगा।”

मम्मी ने ज़ोर देते हुए कहा, “जी नहीं, आपको आज ही जाना है! आप जिम जाइए, मैं यहाँ से अकेले घर चली जाऊँगी।”

जिम से लौटने के बाद जब मैं घर आया, तो देखा कि मम्मी घुटनों तक की रॉब वाली नाइटी पहने हुए थी। उन्हें देख मैं हल्का सा मुस्कुराया और फिर नहाने चला गया। नहाने के बाद जब मैं अपने कमरे में आया, तो देखा कि टेबल पर मेरे लिए मसाज तेल की बोतल और एक लूंगी पहले से रखी हुई थी।

मैं मन ही मन मुस्कुराया और खुद से कहा, “लगता है मेरी बरसों की तमन्ना पूरी होने वाली है। मम्मी के अंदर फिर से वही आग सुलग रही है, जिसे इस बार मेरा लंड ही शांत करेगा!”

मैंने कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला छोड़ दिया ताकि सविता मेरे लंड का नज़ारा ले सकें। फिर पूरी तरह नग्न होकर मैं अपनी बॉडी पर तेल की मालिश करने लगा। मैंने अपनी छाती पर तेल मल कर उसे पूरी तरह चिकना और चमकदार बना दिया।‌फिर अपनी मज़बूत जांघों पर तेल लगाते हुए धीरे-धीरे लंड पर आ गया। मैंने अपनी हथेली में ढेर सारा तेल लिया और लंड को मुठियाना शुरू कर दिया। कभी मैं लंड के सिपारे को सहलाता, तो कभी अपने मोटे अंडों पर तेल रगड़ता। मुझे ऐसा करते हुए काफी देर हो गई थी, तभी मुझे दरवाज़े के पास क़दमों की आहट और तेज़ होती साँसों की आवाज़ सुनाई दी। मैं समझ गया कि मम्मी दरवाज़े पर खड़ी होकर मुझे ही देख रही थी।

मैं दरवाज़े की तरफ देखे बिना ही लंड की मालिश करता रहा। मन ही मन मम्मी के नग्न बदन की कल्पना करते हुए मैंने अपने अकड़े हुए लंड को दरवाज़े की तरफ कर दिया, ताकि मम्मी उसे अच्छी तरह देख सकें।

थोड़ी ही देर में मेरी साँसें भारी होने लगी और मेरा लंड झड़ने की कगार पर पहुँच गया। तभी मम्मी ने बाहर से दरवाज़ा खटखटाया।

मम्मी बोली, “राहुल, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”

मैंने खुद को थोड़ा संभालते हुए कहा, “हाँ-हाँ, बस एक मिनट!”

फिर मैंने फुर्ती से लूंगी उठाई और अपनी कमर पर लपेट ली। दरवाज़े के पास पहुँच कर मैंने कहा, “ओहो मम्मा, दरवाज़ा तो खुला ही था, आप फिर भी किसी मेहमान की तरह नॉक कर रही हैं?”

मैंने देखा कि मम्मी के हाथों में एक ट्रे है, जिसमें केसर और पिस्ते वाला दूध का गिलास और कुछ बादाम रखे थे। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान और थोड़ी घबराहट साफ़ नज़र आ रही थी। बिना मेरी तरफ देखे कमरे के अंदर आते हुए वह बोली-

मम्मी: “जब बेटा बड़ा हो जाता है, तो माँ को भी उसके कमरे में पूछ कर आना पड़ता है। लो, अब यह पिस्ते वाला दूध पियो और अपनी ताकत बढ़ाओ, इसे घटाने (हस्तमैथुन की तरफ इशारा) की कोशिश मत करो।”

मैंने थोड़ा मासूम बनते हुए कहा, “ओहो मम्मा, मैं इतना बड़ा भी नहीं हुआ कि आपको पूछ कर आना पड़े! और इस बादाम-केसर की क्या ज़रूरत है?”

मम्मी ने मेरी तेल से चिकनी और चमकती छाती पर हाथ फेरते हुए कहा, “वह तो मैं देख ही रही हूँ कि तुम अब कहाँ से कहाँ तक बड़े हो गए हो! यह सब खाने-पीने से ही तो असली मर्दानगी आएगी।”

मम्मी मेरी छाती सहलाते हुए अपने ही होंठों को आपस में रगड़ रही थी और उनकी नशीली आँखें मुझे देख रही थी। मैंने मौके का फायदा उठाया और अपना एक हाथ उनकी कमर पर डाल कर उन्हें अपनी छाती से चिपका लिया।

मम्मी के मुँह से एक हल्की आह निकली, “उफ़… आराम से!”

मैंने कहा: “आपको क्या लगता है, अभी मुझमें मर्दानगी कम है?”

मम्मी मुस्कुराते हुए शरारती अंदाज़ में बोली, “है, पर अभी उतनी नहीं…”

यह सुनते ही मैंने तुरंत नीचे झुक कर मम्मी को अपनी गोद में उठा लिया। मम्मी ने मेरे गले में अपनी बाहें डाल दी और डरने का झूठा नाटक करने लगी।

मम्मी बोली: “ओह बस-बस! मुझे पता चल गया कि तुम पूरे मर्द बन गए हो और अब किसी भी औरत को संभाल सकते हो!”

मैंने उन्हें गोद में लिए हुए ही अपने होंठ उनके होंठों के करीब लाकर कहा, “मुझे किसी और को नहीं, बस आपको संभालना है!”

मम्मी ने शर्माते हुए मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और एक गहरा किस्स करने के बाद बोली, “शॉप पर मुझे सिर्फ सविता ही कहा करो!”

फिर मैं मम्मी को गोद में लिए हुए ही हॉल में आ गया। रात का खाना खाने के बाद मम्मी ने मुझे एक गुड नाइट किस्स दिया और अपने कमरे में सोने चली गई। फिर रोज़ हम इसी तरह शॉप पर जाने लगे। मुझसे ज़्यादा कस्टमर्स अब मम्मी से ही डील करना पसंद करते थे। रोज़ शाम को जब मैं जिम से लौटता, तो मम्मी मेरे कमरे में पहले से ही मालिश का तेल, लूंगी और बादाम-पिस्ते वाला दूध तैयार रखती थी।

कुछ ही दिनों में हमारी आमदनी बहुत अच्छी होने लगी। जब भी मैं किसी बड़े क्लाइंट से डील करने के लिए मम्मी को साथ लेकर जाता, तो वो डील हमें मिल ही जाती थी। घर वापस आकर हम दोनों खुशी से एक-दूसरे को बाहों में भर लेते और किस्स करते। कभी-कभी तो मेरे नहाने के बाद मम्मी खुद कमरे में आती और अपने हाथों से मेरे शरीर पर तेल की मालिश करने लगती थी।

मम्मी के चेहरे पर अब एक बार फिर से खुशी का निखार आ गया था। अब वो मुझे शॉप पर राहुल बेटा कहने के बजाय राहुल जी कह कर और आप बुला कर बात करने लगी थी।

एक बार ऐसे ही हमें एक बड़े क्लाइंट से डील करने के लिए आगरा जाना पड़ा।सुबह के निकले-निकले क्लाइंट के साथ मीटिंग करते हुए हमें शाम के 8 बज गए। काम खत्म होने के बाद एक बड़े रेस्टोरेंट में नाश्ता करते हुए।

मम्मी बोली, “राहुल जी, अब और नहीं… बहुत थकान हो गई है। बस मुझे इस बात की खुशी है कि आपको यह डील मिल गई।”

मैंने अपने हाथों से उन्हें पिज़्ज़ा का एक टुकड़ा खिलाते हुए कहा, “यह डील तो मुझे मिलनी ही थी। क्योंकि आप जो मेरे साथ थी। थोड़ा और खाइए, फिर हमें घर के लिए भी निकलना है।”

मम्मी ने थकी हुई आवाज़ में कहा, “राहुल जी, मुझे नहीं लगता कि मैं अभी इतना लंबा सफर तय कर पाऊंगी।”

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्यों ना फिर हम आज रात किसी बड़े होटल में रुक जाएं?”

होटल की बात सुनते ही मम्मी के चेहरे पर एक कातिल मुस्कान छा गई। उन्हें देख कर ऐसा लगा जैसे वो मन ही मन यही चाह रही थी।

फिर मैं मम्मी को लेकर एक आलीशान होटल पहुँचा। मम्मी मुझसे थोड़ा दूर खड़ी थी और मैंने रिसेप्शन पर जाकर कमरे की बात की।

रिसेप्शनिस्ट ने हमें देख कर कहा, “सर, अभी हमारे पास सिर्फ एक ही कमरा खाली है और वह भी फर्स्ट क्लास हनीमून बेडरूम है। अगर आप कहें तो बुक कर दूँ?”

मैंने मन ही मन मुस्कुराते हुए हामी भर दी। कमरे का दरवाज़ा खोलते ही मम्मी के चेहरे पर एक कामुक और शर्मीली मुस्कान उतर आई।

मम्मी ने पलट कर मेरी आँखों में देखा, तो मैंने पूछा, “मम्मी, कैसा लगा आपको मेरा यह इंतज़ाम?”

मम्मी ने अपनी एक उंगली मेरे होंठों पर रख दी और बड़े प्यार से बोली, “सिर्फ सविता!”

मैंने मम्मी को अपनी बाहों में समेटा और उनके होंठों पर एक जोरदार किस्स किया। मम्मी कुछ देर तक मेरी बाहों से लिपटी रही और फिर फ्रेश होने के लिए बाथरूम चली गई। मैंने बाहर अपने सारे कपड़े उतार दिए और सिर्फ एक फ्रेंच अंडरवियर में खड़ा होकर आईने में अपने शरीर को निहारने लगा। थोड़ी देर बाद जब मम्मी बाथरूम से बाहर आई, तो उन्हें देखते ही मेरी आँखें फटी की फटी रह गई…

इसके आगे क्या हुआ, वह मैं आपको अगले भाग में बताऊंगा। मैं उम्मीद करता हूँ कि आप सभी को मेरी कहानी पसंद आ रही होगी। जिन भी पाठकों ने मुझे ईमेल किया है, मैं उन्हें दिल से शुक्रिया कहना चाहता हूँ।

अभी तक की कहानी आपको कैसी लगी दोस्तों, अपना फीडबैक मुझे ज़रूर दें!support@mohakkisse.com

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