कोई देख रहा है

लण्ड न माने रीत -11

लेखक: स्वप्न कांत शर्मा दिनांक: 04-09-2023 पठन समय: 10 मिनट

अब तक आपने पढ़ा..उसने थोड़ा गुस्से से मेरी तरफ देखा और अपनी चूत पर दोनों हाथ रखकर उँगलियों से बुर के दोनों कपाट पूरी चौड़ाई में खोल दिए।सुबह की रोशनी होने लगी थी.. खुली खिड़की से सुबह की सुनहरी धूप की पहली आरती सीधी आकर किरण की खुली चूत पर पड़ी।ऐसा मनमोहक मनभावन नज़ारा पहले कभी नहीं देखा था।उसकी गोरी-गोरी उँगलियाँ सांवली चूत के द्वार खोले हुए लण्ड की प्रतीक्षारत थीं। उसकी चूत का छेद भी स्वतः खुल सा गया था और छोटी ऊँगली जाने लायक बड़ा सुराख दिखाई दे रहा था और उसकी आँखों में भी आमंत्रण का भाव था।लड़की जब खुद अपने हाथों से अपनी चूत को खोल लेटी हो.. तो वो नज़ारा कितना दिलकश होता है.. यह मैंने उस दिन पहली बार जाना।मैंने बिना देर किये लण्ड को उसकी चूत में एक ही बार में पूरा पेल प्रिया।अब आगे…

‘सी…’ उसके मुख से निकला और वो मुझे अपने ऊपर से हटाने लगी।‘अब हट भी जाओ बड़े पापा… टाइम कम है… सिर्फ घुसाने और निकालने की बात हुई थी! आपने घुसा प्रिया, अब निकालो और मुझे जाने दो!’ वो बोली।

लेकिन एक बार लण्ड चूत में जाने के बाद कौन बिना झड़े निकालता है, मैंने भी किरण की बात अनसुनी करते हुए उसे स्पीड से चोदना शुरू किया और लगभग बीस मिनट बाद उसकी चूत में अपनी छूट भर कर अलग हट गया।

करीब सात बजे मैं नहा धोकर तैयार हो गया, कुछ ही देर बाद किरण चाय नाश्ता लेकर आ गई और मेरे सामने बैठ गई।वो भी नहा ली थी, खिड़की से आती सुबह की धूप में वो बहुत उजली उजली सी प्यारी प्यारी लग रही थी।

‘बड़े पापा, आप शहर पहुँच कर पहले कुछ नाश्ते का सामान, सब्जी वगैरह खरीद लेना क्योंकि यहाँ गाँव में तो कुछ ख़ास मिलता नहीं है।’ वो बोली।‘अरे वो तो ठीक है, तू अपनी इस ननद के बारे में कुछ बताने जा रही थी, वो क्या बात है?’ मैंने पूछा।‘अब कैसे बताऊँ बड़े पापा, बड़ी वैसी बात है…’ किरण कहती कहती रुक गई।

‘अब जल्दी बता न, कैसी क्या बात है?’ मैंने फिर पूछा।‘अच्छा ठीक है, आप ध्यान से सुनो, पूरी बात बताती हूँ।’ किरण ने बताना शुरू किया।‘ससुराल में हमारे घर में एक साउथ इंडियन परिवार किराये से रहता है, उन्हीं की बेटी है यह… वत्सला नाम है, इसके पापा एक बैंक में मैनेजर हैं। वत्सला अभी बारहवीं में पढ़ती है कान्वेंट स्कूल में!ये लोग हमारे घर में करीब एक साल पहले किरायेदार बनकर आये थे. शुरू के आठ नौ महीने तो सब ठीक चला! धीरे धीरे मुझे इस वत्सला के स्वभाव और गन्दी आदतों के बारे में पता चलना शुरू हुआ।’

‘अच्छा, पूरी बात खुलकर बताओ ना?’ मैं चहक कर बोला।‘बड़े पापा… सुनो तो सही आगे, आप टोकना मत!’ किरण बोली और उसने आगे बताना शुरू किया।

मेरी ससुराल में पति के अलावा सिर्फ सास ससुर हैं जो निचली मंजिल पररहते हैं। यह वत्सला और उसके माँ बाप बीच की मंजिल पर रहते हैं और मेरा कमरा सबसे ऊपरी मंजिल पर है।फिर मैंने अपने सेक्स संबंधों में बहुत सावधानी बरतनी शुरू कर दी, हम जो भी करते, वो एकदम अँधेरे में आधी रात के बाद ही करते।

एक दिन की बात है, उस दिन मेरा जन्म दिन था, मेरे पति ने मेरे नीचे के बाल अपने हाथों से शेव किये और मुझे नहला कर सोफे परबैठा प्रिया और मेरे पांव भी उठा कर सोफे पर रख दिए और वो फर्श पर बैठ कर मेरी चिकनी चूत चाटने लगे।मैं भी आनन्दित होने लगी और मस्ती में उनके बालों को सहलाने लगी।

अचानक फिर मुझे बाहर कोई आवाज सुनाई दी जैसे किसी ने गहरी सांस या सिसकारी ली हो।उस समय कमरे की बत्ती जल रही थी, खिड़की पर पर्दा भी नहीं था और दरवाजे की चिटकनी भी खुली हुई थी. मैं सांस रोक कर सुनने लगी…फिर वैसी ही आवाज दुबारा आई।तब मैंने अपने पति को अपने पास से हटाया और उन्हें चुप रहने का इशारा कर जल्दी से उनकी लुंगी अपने ऊपर डाली और तेजी से बाहर निकली।बाहर आकर अँधेरे में देखा तो एक साया सफ़ेद शर्ट पहने भागने ही वाला था, मैंने फुर्ती से उसका हाथ पकड़ लिया और उसे पहचाननेकी कोशिश करने लगी।‘छोड़ो न भाभी, माफ़ कर दो मुझे!’ यह वत्सला थी, मुझे उस पर बहुत क्रोध आ रहा था, मैं उतनी रात को कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करनाचाहती थी तो मैं उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए उसे ऊपर छत पर ले गई और उसे चार पांच चांटे जड़ दिए, फिर बत्ती जला करदेखा तो वो सामने से पूरी नंगी थी, उसने अपने पापा की सफ़ेद शर्ट अपने ऊपर डाल रखी थी, सामने के पूरे बटन खुले हुए थे। न ब्रा न चड्डी… पूरी नंगी थी अन्दर से!जो हाथ मैंने उसका पकड़ रखा था वो मुझे चिपचिपा सा लगा उसकी उँगलियाँ देखीं तो मैं समझ गई कि वो मेरे कमरे में झांकती हुई अपनी चूत में ऊँगली कर रही थी और आहें भर रही थी।उसकी जाँघों पर से भी उसकी गीली चूत का पानी बह रहा था।

उतनी रात को मैंने ज्यादा कुछ बोलना ठीक नहीं समझा और उसे चेतावनी देकर छोड़ प्रिया कि अगर उसने फिर कभी वैसी हरकत की तो उसके पापा से शिकायत कर उसे अपने घर से निकाल दूंगी।

उस दिन के बाद फिर उसने मेरे कमरे में कभी नहीं झाँका, मैं भी आश्वस्त हो गई कि चलो लड़की सुधर गई।फिर एक दिन की बात, मैं दोपहर में सब काम से निपट कर आराम कर रही थी कि वत्सला आकर मेरे बगल में लेट गई और भाभी भाभी कह कर बातें करने लगी।मैंने भी उससे बात करने में कोई बुराई नहीं समझी और उससे बतियाने लगी।

धीरे धीरे उसका मेरे पास आना बढ़ता गया, अब वो मुझे छेड़ने भी लगी… कभी मुझसे लिपट जाती, कभी अपना घुटना मेरी चूत पररगड़ने लगती कभी मेरे मम्मे छेड़ देती।बड़े पापा, मैं उसकी उम्र के उस पड़ाव को अच्छी तरह से समझती थी इसलिये मैं उसकी इन हरकतों को हल्के में लेती।धीरे धीरे हम दोनों में ननद भाभी का सा रिश्ता बन गया और एक दूसरे को छेड़ना और नाजुक अंगों को सहलाना लगभग रोज की बात हो गई।

बड़े पापा, फिर उस दिन तो गजब ही हो गया, मैं दोपहर में लेटी आराम कर रही थी कि वत्सला आकर मुझसे लिपट गई, बोली- भाभी भाभी, देखो एक मस्त चीज दिखाऊँ आपको!फिर उसने अपने मोबाइल में से वो नंगी लड़कियों की गन्दी फिल्म मुझे दिखाना शुरू कर दी। उस फिल्म में दो भारतीय लड़कियाँ हिंदी में गन्दी गन्दी बातें करते हुए एक दूसरी से नंगी लिपटी हुई थी और कभी एक दूसरी के दूध मसलती, चूसतीं, कभी एक दूसरे की चूत चाटने लग जातीं।

वो सब मैंने पहली बार देखा सुना, मुझ पर भी वासना का नशा चढ़ गया फिर हम दोनों कब पूरी नंगी हो गई और एक दूसरी की चूत चाटने लगी… मुझे पता ही नहीं चला।जब वत्सला और मेरी चूत से रस की फुहारें छूट पड़ीं तब जाकर होश आया मुझे।बहुत पछतावा भी हुआ पर तब क्या हो सकता था।

धीरे धीरे हम दोनों में यही खेल चलने लगा और जब भी मौका मिलता, हम दोनों शुरू हो जाती।फिर हम दोनों एक दूसरी से बहुत खुल गई, वो मुझसे मेरे पति के साथ चुदाई की बातें पूछती कि जब चूत में लण्ड जाता है तो कैसा लगता है वगैरह वगैरह!मैं भी उससे सब शेयर करने लगी।मैं जब उससे सचमुच की चुदाई में आने वाले आनन्द का वर्णन करती तो उसकी आँखें नशीली हो जातीं और उसकी चूत बहुत गीली हो जाती और फिर वो मुझसे अपनी चूत में ऊँगली करवाती।

बड़े पापा, बस इतनी कहानी है मेरी ननद रानी की!अभी जब मैं यहाँ आ रही थी तो वो बोली कि ‘आप जाओ, एक दो दिन बाद मैं भी आपके गाँव आऊँगी…’ क्योंकि उसने भी गाँव कभी नहीं देखा था।

किरण की पूरी बात सुनकर मुझे वत्सला के साथ अपनी जुगाड़ फिट होने की पूरी पूरी सम्भावना नज़र आने लगी और मैं मन ही मन प्रसन्न हो उठा, ज़िन्दगी बहुत मेहरबान हो रही थी मुझ पर, पता नहीं किस जन्म के पुण्य उदय हो रहे थे मेरे!किसी साउथ इंडियन लड़की को तो मैंने पहले कभी नहीं चोदा था, वो सेक्सी भी थी और बारहवीं में पढ़ रही थी…

‘ठीक है गुड़िया, मैं अब जाता हूँ, बस का टाइम हो रहा है। हाँ, तू वत्सला को फोन कर दे कि मैं उसे लेने स्टेशन पर आ रहा हूँ।’ मैं बोला।

किरण ने मेरे ही सामने वत्सला को फोन कर प्रिया और बोली कि मेरे अंकल तुझे स्टेशन पर रिसीव कर लेंगे, चिंता मतकरना।मैंने भी वत्सला और किरण दोनों के फोन नम्बर लेकर सेव कर लिए और बस पकड़ने चल प्रिया।

मित्रो, ‘लण्ड न माने रीत’ की कथा यहीं तक कह कर मैं समाप्त करता हूँ।और हाँ, इस कहानी को पढ़ कर मुझे बहुत सारे पाठक पाठिकाओं के मेल मिले और यथा संभव मैंने सबको उचित उत्तर भी प्रिया।यहाँ पर भी मुझे खट्टे मीठे कमेंट्स पढने को मिले!आप सबका धन्यवाद।

मैं वत्सला को रिसीव करने स्टेशन गया…फिर आगे क्या क्या हुआ? ये सब बातें मैं अपनी अगली कहानी में विस्तार से लिखूंगा जो किसी नये शीर्षक से प्रकाशित होगी।support@mohakkisse.com