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पड़ोसन बनी दुल्हन-60 (अंतिम भाग )

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02 Aug 2014 को प्रकाशित

पड़ोसन बनी दुल्हन-60 (अंतिम भाग )
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जेठजी के यह शब्द मेरे लिए वज्राघात से कम नहीं थे। मुझे डर लगा की कहीं जेठजी की आँखों से पट्टी निकल तो नहीं गयी थी। पर मैं पूरी चुदाई के दरम्यान अच्छी तरह से देख रही थी। आँखों पर सख्ती से बंधी पट्टी वैसी ही थी। जेठजी मुझे माया ही समझ रहे थे क्यूंकि उन्होंने शायद माया के डर से छाया शब्द का इस्तेमाल किया था।

मैंने मेरे जेठजी का गरम वीर्य मेरी चूत में एक सैलाब की तरह उनके लण्ड के छिद्र में से फुटकर निकलते हुए महसूस किया। मेरी चूत की पूरी सुरंग मेरे जेठजी के गाढ़े वीर्य से भर गयी थी। जेठजी का लण्ड मेरी चूत में ही रखते हुए मैं फुर्ती से जेठजी के निचे लेट गयी और जेठजी को मेरे ऊपर चढ़ा दिया। मैं जेठजी का एक एक बून्द मेरी चूत में भर लेना चाहती थी।

जेठजी भी शिथिल हो कर मेरे ऊपर लेटे रहे जब तक उनके वीर्य की आखिरी बून्द निकल कर मेरी चूत में नहीं गयी। उसके बाद मुझे बड़ी राहत महसूस हुई जब मेरे जेठजी का अच्छा खासा भारी बदन मेरे ऊपर से हटा। जब तक औरत मर्द से चुदवाती रहती है, तब तक उसे मर्द का वजन महसूस नहीं होता। पर जैसे ही मर्द अपना वीर्य औरत की चूत में छोड़ देता है वैसे ही औरत को अपने ऊपर लेटे हुए मर्द का वजन महसूस होने लगता है।

मेरे बाजू में लेटते ही मेरे जेठजी ने मुझे खिंच पर अपने ऊपर ले लिया। मुझे कस कर जेठजी ने अपनी बाँहों में भर लिया और मुझे बेतहाशा चूमते हुए बोले, “अंजू बेटी, अब तो तुम और माया मेरी आँखों से पट्टी खोलो। तुमने पट्टी इतनी सख्त बाँधी है की मेरी आँखों में बड़ा दर्द हो रहा है।”

मेरे जेठजी को सुन कर मैंने माया की और देखा। मुझे लगा की उस समय अगर मुझे या माया को किसी ने छुरी से काटा होता तो खून की एक बूँद भी नहीं निकलती। मुझे लगा जैसे मेरा खून मेरी रगों में जम कर थम गया हो। हम दोनों ही कुछ बोलने के लायक नहीं थे।

मेरा सिर फट रहा था। मेरे पिता समान जेठजी से चुदवा कर मैंने बड़ा भारी गुनाह किया था। मैं मन ही मन में कचोट रही थी। अब मैं मेरे जेठजी से कैसे नजरें मिला पाउंगी? मैं तो मेरे जेठजी के सामने ना सिर्फ पूरी नंगी थी बल्कि उनके नंगे बदन पर उनके लण्ड को मेरी चूत में डलवा चुकी थी, और उनका वीर्य मेरे बदन पर बह रहा था। मैंने माया की और देखा। माया ने अपने हाथ लम्बे कर जेठजी की आँखों से पट्टी खोली।

जेठजी को अपनी आँखों को खोलते हुए कुछ कष्ट हुआ और कुछ देर तक वह इधरउधर आँखे झपकाते हुए हमें देखने की कोशिश करते रहे। कुछ देर बाद जब उन्होंने मुझे देखा तो दुबारा मुझे अपनी बाँहों में समेटते हुए बोले, “अंजू बेटी, माया, तुम दोनों मेरे करीब आओ तो।”

माया डरती हुई मेरे जेठजी के बाजू मैं बैठ गयी। जेठजी ने मुझे तो अपनी बाँहों से अलग ही नहीं किया। मेरे स्तनों को अपने हाथों में जकड़ कर दबाते हुए जेठजी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाते हुए कहा, “देखो, अंजू बेटी, तुम बच्चे लोग क्या समझते थे? मैं तुम्हारी चाल नहीं समझ पाउँगा? बेटे, तुम जिस कॉलेज में पढ़ रहे हो ना, मैं उस कॉलेज का प्रधान आचार्य हूँ। मैं तो तुम लोगों की चाल पहले से ही समझ गया था। मुझे माँ ने बताया था की वह संजू से बच्चे के बारे में बार बार कह रही थी।

जब माया ने मुझे आँख पर पट्टी बाँध ने की बात की और फिर बच्चे के लिए बगैर प्रोटेक्शन से सेक्स की बात की तो मुझे दो से दो जोड़ ने में देर नहीं लगी। हाँ संजू की दिक्कत के बारे में मुझे पता नहीं था और वह मुझे तुम्हारी हरकतों से ही अंदाज लगाना पड़ा।”

जेठजी की बात सुन कर मेरा और माया का सिर शर्म से झुक गया। मैंने आँखें झुकाते हुए कहा, “जेठजी, मुझमें हिम्मत नहीं थी ऐसी बात करने की। आखिर आपने हमें अपने बच्चों की तरह पाला है।”

जेठजी ने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ कर मेरे गाल पर एक हलकी चुम्मी देते हुए कहा, “देखो अंजू, जब तक हम लाज का पर्दा रखते थे हमारे बिच कुछ दूरियां थीं, वह ठीक भी था। पर जब हम पर कोई विपदा आन पड़ती है तो हमें हमारे बिच की सारी दूरियां, चाहे वह लज्जा के कारण हों या फिर बड़े छोटे होने के कारण हों, उन्हें तोड़ कर एक साथ मिलकर उनको दूर करनी होगी।

काश तुम में से कोई भी अगर मुझसे सीधे बात करता तो मैं ना क्यों कहता? आखिर एक बात समझो। हमारा परिवार एक जुड़ा हुआ परिवार है और किसी भी आपत्ति में हम सब एक साथ हैं। जब आप ने मुझसे यह खेल रचाया तो फिर मैं भी आप के साथ इस खेल को खेल कर मजे लेना चाहता था।”

मैं मेरे जेठजी की नजरें से नजरें मिला नहीं पा रही थी। मैं जेठजी के पाँव से लिपट गयी। मैं अपनी आँखों में से आंसूं रोक नहीं पा रही थी। जेठजी ने मुझे अपने सीने से लगा कर कहा, “अरे बेटी, तुम्हारी जगह मेरे पाँव में नहीं। तुम्हारा स्थान मेरे ह्रदय में है। तुम मेरी बहु हो। बहु बेटी जैसी होती है। तुम पूछोगी, बेटी है तो फिर मैंने सेक्स कैसे किया? सेक्स भगवान की दी हुई देन है। हमारे समाज में कुछ पाबंदियां जरूर हैं, पर वक्त आने पर उन्हें तिलांजलि भी दी जा सकती है।”

मैं हैरान सी मेरे जेठजी की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी। जेठजी शायद मेरी उलझन को दूर कर मुझे तनाव मुक्त करने की कोशिश कर रहे थे।

जेठजी ने मेरी उलझन को समझते हुए अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “हमारे यहां एक गोत्र में शादी और चुदाई की मनाई है। मैं भी मानता हूँ की एक ही गोत्र में चुदाई नहीं होनी चाहिए।

तुम मेरे गोत्र की नहीं हो तो जो हमने किया वह परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए स्वीकार्य होना चाहिए। हम अगर एक दूसरे से प्यार करते हैं और हमारे बिच अगर कोई इर्षा, द्वेष का भाव नहीं है तो मैं मानता हूँ की अगर प्रबल इच्छा हो या जरुरत हो तो चुदाई करने में कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए। तुममें से कोई भी अगर मुझसे सीधा आ कर अपनी समस्या बताते तो मैं अपने आप ही तुम्हें यही रास्ता बताता जो तुम्हें माया ने बताया।”

माया ने देखा की मैं जेठजी के इतना सारा कहने पर भी काफी शर्मसार अनुभव कर रही थी। तब माया मेरे करीब आयी। मैं उस समय अपनी साड़ी के एक छोर को पकड़ कर अपने नंगे बदन को जेठजी से छिपाने की कोशिश कर रही थी। माया ने मेरी साड़ी को खिंच कर हटाई और दूर कोने में फेंक दी।

फिर मेरे हाथ में मेरे जेठजी के लण्ड को थमा कर बोली, “दीदी, अब मेरे पति आपके भी पति हैं। अब आपको मैं यहां से पूरी रात नहीं जाने देने वाली। आपको मैंने सौतन बना दिया है और मैं सौतन की तरह ही आपसे प्यार करुँगी। मेरे पति याने आपके जेठजी भी आपको अपनी पत्नी की तरह ही प्यार करेंगे और चोदेंगे भी।

आप भी जब तक उनके साथ सोती है तब तक उन्हें अपना पति ही समझो। जब आप यहां से जाओ तो वह फिर से आपके जेठजी बन जाएंगे। पर तब तक आप उनकी पत्नी और मेरी प्यारी सौतन ही रहोगी।”

माया की बात सुन कर जेठजी ने माया को अपनी बाँहों में भर लिया और बोले, “माया, ऐसा करना तो संजू के ऊपर अन्याय होगा। अगर अंजू आज रात मेरे साथ सोयेगी तो फिर तुम्हें आज रात संजू के साथ सोना पड़ेगा। आज रात तुम संजू के साथ सुहाग रात मनाओगी, आज रात तुम संजू से चुदवाओगी। बोलो तुम्हें मंजूर है?”

माया जेठजी की बात सुनकर आश्चर्य से उछल पड़ी। माया को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह अपनी बड़ी बड़ी आँखें पटपटाती हुई बोली, “क्या? आप क्या कह रहे हो जी? मुझे संजयजी के साथ सोना पड़ेगा? ऐसा क्यों?”

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जेठजी माया की पीठ सहलाते हुए बोले, “क्योंकी अब जब तुम और अंजू मेरे लिए एक सी ही हो तो फिर तुम और अंजू संजू के लिए भी एकसी ही होनी चाहिए। मतलब अगर अंजू यहां मेरे साथ सोयेगी, मुझ से चुदवायेगी तो उधर संजू के साथ तुम्हें भी सोना पड़ेगा, संजूभी तुम्हें चोदेगा। तभी तो हिसाब बराबर होगा ना? मैं नहीं चाहता की जब अंजू मेरे साथ हो तो संजू अकेला हो। बोलो मंज़ूर है की नहीं?”

मैंने माया की और देखा। माया ने कुछ उलझन से मेरी और देखा। मैंने उसे आँख मटका कर “हाँ” का इशारा किया। तब माया ने अपने पति और मेरे जेठजी की और दिखा और शर्माती हुई बोली, “मैंने आपका कहना ना माना हो ऐसा हुआ है कभी? अगर आप कहते हैं और अगर संजयजी और दीदी को एतराज ना हो तो मैं तो आपके हुक्म की गुलाम हूँ। आप जो कहोगे मैं वही करुँगी।”

जेठजी ने माया की और तीखी नज़रों से देखा और बोले, “नहीं ऐसे जबरदस्ती नहीं। मैं तुम्हारी तरह कोई खेल नहीं खेल रहा हूँ। मैं सीधे से पूछ रहा हूँ, क्या तुम संजू से चूदवाओगी?”

माया ने फिर से उसी तरह दृढ़ता से कहा, “देखिये जी आप मेरे प्राणधन हैं। मैंने अपना सारा जीवन आपको समर्पण कर दिया है। मैंने आप को अपना प्राणनाथ माना है और दीदी को अपनी बड़ी बहन। अगर आप चाहते हैं की मैं संजयजी के साथ सोऊँ, उनसे चूदवाऊं तो यह मेरा सौभाग्य होगा। मुझे संजयजी अगर स्वीकार करेंगे तो अपने आपको उनको सौंपने में मुझे ख़ुशी होगी। बताइये मैं क्या करूँ?”

जेठजी ने माया को अपने गले लगा कर कहा, “तुम नईनवेली दुल्हन सी तो सजी हुई ही हो। अपने कपडे ठीक से दुबारा पहनलो और ठीक से सज कर अभी संजू के कमरे में उसके साथ सोनेके लिए जाओ और उससे चुदवाओ। अगर संजू मना करे तो मुझे बताना।”

मैं भी मेरे जेठजी की और देखती ही रह गयी। माया धीरे से अपनी साड़ी सम्हालती हुई उठ खड़ी हुई और कमरे से निकल गयी। मैंने जेठजी के गले में अपनी बाँहें डालकर उनके होँठों को हलके से चूमते हुए पूछा, “मैं यह तो जानती थी की आप न्याय पसंद हैं, पर आप इतनी हद तक अपनी न्याय की दृढ़ता को ले जाएंगे यह सोचा नहीं था।” यह कह कर मैं जेठजी के लण्ड को हिलाकर उसे दुबारा सख्त करने की कवायद में लग गयी।

जब माया संजयजी के कमरे में पहुंची तब संजयजी के कमरे का किवाड़ खाली बंद था। माया ने हल्का सा धक्का दिया तो किवाड़ खुल गया। कमरे में अन्धेरा था। माया ने जैसे कमरे प्रवेश किया तब कमरे में बत्ती जल उठी। संजयजी बिस्तर में से उठ गए और माया को देख कर चौंक कर बोल उठे, “माया, मेरा मतलब भाभीजी आप?”

माया बिना कुछ बोले हमारे पलंग के पास जा कर खड़ी हुई। संजयजी बड़े ही अचरज से माया की और स्तब्ध हो कर देखते रहे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था की माजरा क्या था। माया ने संजयजी का हाथ थामा और उन्हें खिंच कर पलंग के ऊपर से उठाकर संजयजी से लिपटते हुए बोली, “संजयजी, मैं आपके साथ आज सुहागरात मनाने के लिए आयी हूँ।”

संजयजी पूरी तरह आश्चर्यचकित हो कर माया को कुछ देर तक चुपचाप देखते रहे। फिर उन्होंने माया को अपनी बाँहों में भर कहा, “अच्छा! अब मैं समझा। आप लोगों का खेल भाई साहब ने पकड़ लिया लगता है। यह भाई साहब का न्याय है। तभी मैं सोचूं, की यह सब चक्कर क्या है।”

जैसे ही माया संजयजी की आहोश में लिपट कर उनको अपने होंठ चूमने के लिए दे बैठी, संजयजी ने माया को चूमते हुए कहा, “भाई साहब किसी का भी एहसान अपने ऊपर कभी रखते नहीं है। आज उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया।”

कहने की जरुरत नहीं की मुझे और माया को समय चलते हुए बच्चे हुए। माया को एक सुन्दर बेटी हुई और मेरे एक स्वस्थ और लंबा चौड़ा बेटा हुआ। हमारे घर में फिर से उत्सव का माहौल बन गया। उसके बाद मेरे जेठजी का ट्रांसफर कहीं और हो गया और माया और जेठजी हम से दूर चले गए। पता नहीं शायद यह तबादला जेठजी ने ही करवाया था क्यूंकि शायद वह मेरे और उनके संबंधों की किसी को भनक ना लगे यह चाहते थे।

मेरे जेठजी जान गए थे की अगर हमारे दोनों के परिवार एक साथ रहे तो बार बार मेरा मन जेठजी से चुदवाने को करेगा। मैं अपने आप को रोक नहीं पाउंगी और जेठजी को डर था की कहीं वह बात खुल ना जाए। माता और पिता जी को इस बात की भनक ना लगे इसी के लिए जेठजी बड़े चिंतित थे। इसी के कारण शायद उन्होंने अपना तबादला करवा दिया था।

फिर भी जब हम जेठजी को मिलने जाते थे तब मैं जेठजी के साथ और माया मेरे पति संजयजी के साथ ही सोती थी। मैं और माया दोनों भाइयों की सांझा बीबियाँ बन गयीं थीं। हम उस व्यवस्था से बहुत खुश थे।

किसी कानून और पुलिस की जरुरत ही नहींअगर दुनिया में सभी प्यार मोहब्बत से चले।जो हसीना का हो मन जाए उसकी बाँहों मेंकभी तुम्हारी कभी मेरी भी बाँहों में पले।।

नाहो गीला ना कोई शिकवा ना कोई इर्षानाहो लड़ाई नाही जलना ना कोई स्वामी।सभी गले से गले मिल के सब को प्यार करेंना यह तेरा ना वह मेरा ना कोई बदनामी।।

क्या मिलेंगे हमारे दिल से दिल कभी ऐसेहमारी बीबियाँ दोनों की दुलारी होंगी।हमारे बच्चे भी होंगे हमारे दोनों केजो है सांझी हमारी सम्पदा सारी होंगी।।

वसुधैव कुटुम्बकम।

THE END

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Aap sab ke emails receive hue mujhe. Feed back ke liye thanks so much. Yeh meri story ka part-2 ab likhne ja raha hu dosto

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