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Behan Ki Chudai पठन समय: 20 मिनट पढ़ा गया: 655 बार

बड़ी बहन के साथ छुप-छुप कर बदन की आग बुझाई-3(Badi behan ke sath chhup chhup kar badan ki aag bujhayi-3)

sayko@07

24 Feb 2023 को प्रकाशित

बड़ी बहन के साथ छुप-छुप कर बदन की आग बुझाई-3(Badi behan ke sath chhup chhup kar badan ki aag bujhayi-3)
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भाई बहन सेक्स कहानी अब आगे-

बैंगलोर से आने के बाद मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा था। इस बार आते वक्त मैंने अपना हाथ स्पूजा दीदी के गुब्बारे पर बेझिझक रख प्रिया, और उन्होंने भी अपना हाथ मेरे लंड पर रख प्रिया था। वह एहसास बड़ा ही कमाल का था, मानो अब दुनिया में मुझे किसी और चीज़ की जरूरत ही नहीं थी। मेरी स्पूजा दीदी ने आखिरकार मुझे वह प्रिया था, जो मेरे लिए बहुत मायने रखता था।

वापस आने के बाद मैं हमेशा इसी इंतजार में रहता कि कब मम्मी-पापा बाहर जाएंगे और मुझे स्पूजा दीदी के साथ अकेले वक्त बिताने का मौका मिल सके। जब भी घर में कोई नहीं होता, मैं मौके का फायदा उठा कर उन्हें किस्स करने की कोशिश करता।

कई बार तो सिर्फ पंद्रह मिनट का भी मौका मिलता, तब भी मैं उन्हें अपनी बाहों में लेकर उनके होंठों पर अपने होंठ रख देता और उनके मुलायम, गरम गुब्बारों को दबाने से खुद को रोक नहीं पाता। स्पूजा दीदी भी हल्की मुस्कान के साथ मेरी शरारतें सह लेती, मानो उन्हें भी इन पलों का इंतजार हो।

कभी-कभी तो हालात ऐसे होते कि मम्मी-पापा ड्रॉइंग रूम में बैठ कर टीवी देख रहे होते और मैं किचन में खाना बनाने के बहाने चला जाता। वहां स्पूजा दीदी भी होती, और मैं पीछे से आकर उनके मुलायम गुब्बारों को दबा देता और उनके गालों या होंठों पर एक किस्स जड़ देता। वह थोड़ा चौंक जाती, लेकिन उनकी आंखों में छिपी चमक साफ बता देती कि उन्हें भी यह सब बुरा नहीं लगता।

एक-दो बार तो ऐसा भी हुआ कि जब वह बाथरूम में कपड़े धो रही होती, मैं चुपके से अंदर चला जाता और पीछे से उनके ब्लाउज के बटन खोलने लगता। वह थोड़ी घबरा कर पीछे मुड़ती, लेकिन मुझे देख कर सिर्फ हल्के से ‘शरारती’ कह कर मुस्कुरा देती। कभी-कभी मम्मी दरवाज़े पर आकर पूछ लेती कि इतना समय क्यों लग रहा है, तो दीदी बहाना बना देती कि कपड़े ज्यादा हैं या नल का पानी धीमा आ रहा है। उनके इन बहानों के पीछे छुपा हमारा राज़ मुझे और भी करीब खींचता था।

लेकिन इन सारे प्यारे और खूबसूरत पलों के बावजूद, स्पूजा दीदी अब भी मेरे साथ सेक्स करने से मना कर देती। वह कहती कि उन्हें अब भी दर्द का डर था, और वह उस कदम के लिए तैयार नहीं थी। मैं उनकी वजह समझता था, लेकिन मन में कहीं ना कहीं यह ख्वाहिश भी पल रही थी कि एक दिन वह खुद को तैयार कर लेंगी।

फिर एक दिन, जब वह बाथरूम में नहा रही थी, मैं चुप-चाप दरवाज़ा खोल कर अंदर चला गया। गर्म भाप से भरा माहौल और पानी की धार उनके बदन पर बह रही थी। उनका गोरा, मुलायम बदन पूरी तरह से भीगा हुआ था, पानी की बूंदें उनकी गर्दन से होते हुए उनके गोल, भरे हुए और हल्के गुलाबी निप्पलों वाले मुलायम स्तनों पर लुढ़क रही थी। उनका सपाट, चिकना पेट और उसके नीचे का घना, हल्का-सा काला जंगली इलाका पानी में भीग कर और भी आकर्षक लग रहा था। उनकी भीगी गर्दन से बहता पानी उनके कंधों और पीठ पर चमक रहा था, मानो हर बूंद मेरे भीतर आग लगा रही हो।

मैंने पीछे से धीरे से उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। अचानक हुए इस स्पर्श से वह हल्का-सा कांप गई और डर के साथ मेरी ओर देखने लगी। उनकी आंखें मेरी आंखों से मिली, और फिर होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभर आई, जैसे उन्होंने मेरे इस नज़दीकी को चुप-चाप मान लिया हो।

मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ उनके भीगे हुए, नरम और भरे हुए स्तनों पर रख दिए और हल्के-हल्के दबाने लगा। उनके होंठों से एक धीमी-सी सांस बाहर निकली, आंखें आधी बंद हो गई, और चेहरे पर हल्की-सी लाली फैल गई। उनके स्तन इतने मुलायम और गीले थे कि मेरी हथेलियों में मानो रेशम-सा बह रहा हो, गर्माहट और नमी का ऐसा एहसास जिसे छोड़ने का मन ही ना हो।

मैं उनके कान के पास झुक कर फुसफुसाया, “स्पूजा दीदी… तुम्हारे ये भीगे-भीगे सीने तो मुझे पागल कर रहे हैं… इन्हें मसलते हुए मेरा मन कर रहा है कि यहीं तुम्हें अपनी बाहों में कैद कर लूं।”

उन्होंने हल्के से सिर मोड़ कर, धीमी और कटी-कटी सांसों में जवाब प्रिया, उनकी आवाज़ में एक गहरी, गीली सी मादकता थी, “तो फिर कैद कर लो ना… देखूं, तुम्हारी कैद से कोई छुड़ा भी पाए या नहीं…” उनकी इस गंदी और उकसाने वाली बात ने मेरे सीने में आग भर दी। उनकी फुसफुसाहट का हर शब्द मेरे कान में ऐसे गूंज रहा था जैसे किसी ने गर्म सांस से भीतर तक जला प्रिया हो।

मैंने उनकी बात सुनते ही उन्हें हल्के से घुमाया, ताकि उनका सीना मेरी ओर हो जाए। पानी की बूंदें उनकी त्वचा पर मोतियों की तरह चमक रही थी, और मैं झुक कर उनके गीले, नरम स्तनों को अपने होंठों से सहलाने लगा। मेरा मुंह उनके गर्म, भीगे सीने पर घूम रहा था, और मैं बारी-बारी से उनके गुलाबी निप्पलों को चूस रहा था।

स्पूजा दीदी ने अपने कांपते हाथों से मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया और उंगलियां उनमें उलझा दी। वह कभी मुझे अपने करीब खींचती, तो कभी बालों में हल्के से खींच कर मुझे और पागल कर देती। धीरे-धीरे मैंने अपने दांतों से उनके निप्पलों को हल्के से काटना शुरू किया, जिससे वो लाल पड़ने लगे। उनके होंठों से तेज, मादक कराह निकलने लगी, जो बाथरूम की भाप और पानी की आवाज़ में भी साफ सुनाई दे रही थी।

मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। पता नहीं मैं क्या कर रहा था, बस उनके हर हिस्से को महसूस करना चाहता था। मैंने उनके कानों को हल्के से दांतों में दबाया, फिर गर्दन पर अपने होंठ रख कर हल्की काटने लगा। उनके शरीर में झुरझुरी दौड़ गई और वो आंखें बंद करके सिसकारी भरने लगी। मैंने उनके होंठों को अपने होंठों में कैद किया और गहराई से चूमते हुए हल्की काट लगाई।

अब मैं और भी बेकाबू होकर उनके होंठों को जोर से चूम रहा था, मेरी जीभ उनके मुंह में गहराई तक उतर रही थी। उसी दौरान, उनके हाथ अपने सीने पर चले गए, और वो खुद अपने स्तनों को दबाते हुए कराहने लगी, जैसे मेरे चुंबनों ने उनकी हर नस में आग लगा दी हो।

तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज आई। हम दोनों झट से अलग हो गए। स्पूजा दीदी का चेहरा जो पहले रोमांचक लग रहा था, वह बदलकर घबराया हुआ दिखने लगा। “स्पूजा, इतनी देर क्यों लग रही है?” मां की आवाज आई, “जल्दी से नहा कर बाहर आओ और काम करने में मेरा हाथ बटाओ।”

मां की आवाज सुनते ही स्पूजा दीदी ने झट से पानी का नल बंद किया और खुद को तौलिए में लपेट लिया। उनके चेहरे पर अब तक की लाली और घबराहट साफ झलक रही थी। मैंने उनकी ओर देखा, तो वो गहरी सांस लेते हुए दरवाजे की ओर बढ़ी।

“बस मां, अभी आ रही हूं,” उन्होंने धीमे और शांत आवाज में जवाब प्रिया, लेकिन उनकी आंखों में अभी भी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।

इस घटना के बाद, मैंने महसूस किया कि स्पूजा दीदी और भी सतर्क हो गई थी। वह मेरे पास आती, लेकिन अब हर समय चारों ओर नज़र दौड़ाती। बात-चीत में भी उनकी आवाज़ धीमी और संयमित हो गई थी। वह हंसी-मजाक में भी पहले जैसी खुल कर शामिल नहीं होती, मानो मन में हमेशा यह डर रहता हो कि कहीं कोई हमें देख या सुन ना ले। उनके हावभाव में अब एक गहरी सावधानी थी, जैसे हर पल अपनी रीमाओं को तय करके आगे बढ़ रही हो।

कभी-कभी, जब मैं उन्हें चूमने के लिए झुकता, तो वह मुस्कुरा कर मेरा चेहरा हल्के से पीछे कर देती। और जब मैं उनके सीने की ओर बढ़ने की कोशिश करता, तो वह मेरा हाथ थाम कर धीरे से रोक देती। वह कभी बहाना बना देती, तो कभी बात को बदल देती, जैसे चाह कर भी अब पहले जैसी नज़दीकी को पूरी तरह से अपनाने से बच रही हो।

यहां तक कि जब घर पर कोई नहीं होता और मम्मी पापा काम पर चले जाते, तब भी वह पूरी तरह सहज नहीं हो पाती। अगर मैं उनके और करीब आने की कोशिश करता, तो वह घबरा कर मना कर देती। उनके चेहरे पर डर साफ झलकता, मानो उन्हें हर समय किसी के अचानक आ जाने का डर सताता हो।

एक रात, जब सब सो चुके थे और घर में सन्नाटा था, मैं करवटें बदलता रहा। उस दिन उनकी दूरी ने मुझे बेचैन कर प्रिया था। आधी रात के करीब, मैं खुद को रोक नहीं सका और धीरे से उनके कमरे के दरवाजे तक पहुंच गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैंने हल्के से दरवाजा खटखटाया, यह उम्मीद करते हुए कि वह जाग रही होंगी और मुझसे बात करेंगी।

कुछ पल बाद, दरवाजा धीरे से खुला। वह सामने खड़ी थी, साधारण नाइट ड्रेस में, आंखों में हल्की नींद और चेहरे पर हैरानी के साथ। उस ड्रेस के पतले और मुलायम कपड़े के अंदर से भी उनके निप्पल साफ़ झलक रहे थे। उनकी छाती देख कर साफ पता चल रहा थी, उन्होंने अंदर ब्रा नहीं पहनी।

मैं धीरे से अंदर चला गया। वह कुछ कदम पीछे हटी, उनके चेहरे पर उलझन और हल्का सा डर साफ झलक रहा था। कमरे में हल्की-सी अंधेरी थी और उनकी सांसों की आवाज़ उस सन्नाटे में और तेज़ सुनाई दे रही थी।

कुछ पलों तक हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। फिर उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद कर प्रिया, फिर मैंने अचानक आगे बढ़ कर उनको चुमना शुरु किया। उन्होंने मुझे मना नहीं किया। हमारे होंठ एक-दूसरे से चिपकने लगे। उनके गर्म सांसें तेज हो गई थी। जब मैं धीरे से उनका सीना छूने की कोशिश करने लगा, तो उन्होंने अपना हाथ मेरे सीने पर रख कर मुझे रोक प्रिया। मैं फिर भी हल्के से उनके सीने को दबाने की कोशिश करने लगा, लेकिन उन्होंने तुरंत मना करते हुए मुझे हल्का सा धक्का देकर पीछे कर प्रिया। उनकी आंखों में साफ था कि वह इस पल को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती।

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मैंने गहरी सांस लेते हुए उनसे धीरे से पूछा, “तुम ऐसे अजीब तरह से क्यों बर्ताव कर रही हो? पहले तो ऐसा नहीं था।” मेरे सवाल पर वह कुछ पल चुप रही, जैसे शब्द ढूंढ रही हो, फिर नज़रें झुका कर बोलीं, “बस… चीज़ें अब बदल गई हैं।” उनकी आवाज़ में झिझक और डर दोनों साफ महसूस हो रहे थे।

इसके बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, “हमें समझना होगा कि हमारा रिश्ता वैसा नहीं है जैसा होना चाहिए। हम भाई-बहन हैं… और जो कुछ भी बैंगलोर में हुआ, वो मेरी गलती थी। मैं नहीं चाहती कि हम फिर से वही गलती दोहराएं।”

मैं उनकी इस बात को समझ नहीं पा रहा था। जिस स्पूजा दीदी ने मुझे खुश करने के लिए मेरा लंड अपने मुंह में लिया था, वह अचानक इस तरह बर्ताव कर रही थी। जो कुछ भी शुरू हुआ था हमारी मर्जी से हुआ था और अब उसको रोकना मेरे बस में नहीं था। मैं सिर्फ उनके बदन को अपने बदन के ऊपर महसूस करना चाहता था।

मैंने एक बार फिर उनसे पूछा, “सच-सच बताओ, अब क्यों बदल गई हो?” लेकिन उन्होंने फिर वही कहा, “भाई-बहन के बीच ये गलत है। अगर मम्मी-पापा को पता चला, तो वो कभी हमें स्वीकार नहीं करेंगे।” उनकी आंखों में इस बार आंसू थे और कमरे का सन्नाटा और भी भारी हो गया।

उस रात के बाद से मैंने उनसे बात करना कम कर प्रिया। मैंने कोशिश की कि जितना हो सके, उन्हें नज़र-अंदाज़ करूं। वह भी मेरी चुप्पी को महसूस करती थी, लेकिन दोनों के बीच की दूरी बढ़ती चली गई। मैंने अब रसोई में जाना बंद कर प्रिया, जब वह खाना बना रही होती थी। जब वह बाथरूम में कपड़े धो रही होती, तो मैं पास भी नहीं जाता था। यहां तक कि खाने की मेज़ पर भी, अगर वह बैठी होती, तो मैं खाने से परहेज़ करता था।

कुछ दिनों बाद, मम्मी-पापा ने हम दोनों को बैठा कर पूछा, “सब ठीक है ना? तुम दोनों के बीच कुछ हुआ है क्या?” हमने एक-दूसरे की तरफ देखा और लगभग एक साथ कहा, “नहीं, सब ठीक है।” लेकिन हम दोनों जानते थे कि सच्चाई कुछ और थी।

दो महीने बाद, घर पर स्पूजा दीदी के नाम एक लिफ़ाफ़ा आया। यह उनका जॉब जॉइनिंग लेटर था। बैंगलोर में जिस कंपनी में उन्होंने इंटरव्यू प्रिया था, वहां से उनकी सिलेक्शन हो गई थी।

खबर सुनते ही घर में खुशियों का माहौल छा गया। मम्मी-पापा के चेहरे पर गर्व और खुशी साफ झलक रही थी। उन्होंने स्पूजा दीदी को गले लगा कर आशीर्वाद प्रिया। मैं भी, अपनी उलझनों के बावजूद, उनके लिए खुश था। स्पूजा दीदी के चेहरे पर भी लंबे समय बाद सच्ची मुस्कान थी, मानो उनके जीवन में एक नई शुरुआत होने वाली हो।

इसके बाद, उन्होंने अपना सामान पैक करना शुरू कर प्रिया। अलमारी से कपड़े और ज़रूरी चीज़ें निकाल कर एक-एक बैग में रखने लगी। मम्मी-पापा भी उनके साथ बाज़ार गए, नए कपड़े और ज़रूरी सामान खरीदने। क्योंकि अब सिर्फ़ चार दिन बाद उन्हें बैंगलोर के लिए रवाना होना था।

आख़िरकार, वह दिन भी आ गया जब उन्हें बैंगलोर जाना था। सुबह-सुबह मैं उनके कमरे में गया, जहां वह अपने बैग बंद कर रही थी। जैसे ही उन्होंने बैग का चेन खींच कर बंद करने की कोशिश की, कपड़ों के बीच से उनकी ब्रा और पैंटी की एक झलक मिली। वह पल बहुत तेज़ी से बीत गया, लेकिन उस एक झलक में भी उनके शरीर की नरमाई और आकर्षण साफ महसूस हो रहा था।

वह झुक कर बैग को समेट रही थी, जिससे उनके बाल आगे की ओर लटक गए और उनकी खुशबू पूरे कमरे में फैल गई। मेरे दिल की धड़कन और तेज़ हो गई, लेकिन मैंने खुद को संभालने की कोशिश की, क्योंकि उस वक्त मम्मी-पापा घर में थे और माहौल अलग था।

मैंने उनकी ओर देखते हुए धीरे से कहा, “दीदी, जो कुछ भी हमारे बीच हुआ… उसके लिए मैं माफ़ी मांगना चाहता हूं।” मेरी आवाज़ में ईमानदारी और हल्का सा दर्द था। लेकिन मन ही मन मैं अब भी मानता था कि वो लम्हे कोई गलती नहीं थे, क्योंकि मैं सच में उनसे मोहब्बत करता था।

उन्होंने मेरी बात सुन कर कुछ पल चुप्पी साधी, फिर हल्के से मुस्कुराई, जैसे कोशिश कर रही हों कि सब कुछ सामान्य लगे। उन्होंने कहा, “तुम भी अजीब हो, सब भूल जाओ और वैसे ही रहो जैसे भाई-बहन रहते हैं।” उनकी आंखों में अपनापन तो था, लेकिन उसके पीछे एक दूरी भी साफ महसूस हो रही थी।

मैंने महसूस किया कि वो जान-बूझ कर मुझे सामान्य तरीके से ट्रीट कर रही थी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। वह मेरे साथ ऐसे पेश आ रही थी जैसे हम पहले सिर्फ़ भाई-बहन थे, और बस वही रिश्ता बाकी रहे।

आखिरकार, मैंने हिम्मत जुटा कर सीधे उनसे कह प्रिया, “दीदी, मैं आपसे प्यार करता हूं… वो प्यार जो सिर्फ़ भाई-बहन का नहीं है।” मेरी बात सुन कर वो मुझे कुछ देर तक देखती रही। उनके चेहरे पर हैरानी नहीं थी, बस एक गहरी सोच थी।

धीरे से उन्होंने कहा, “मुझे पता है तुम ऐसा महसूस करते हो… लेकिन मैं तुम्हारी बड़ी बहन हूं, और इस नज़रिए से यह सही नहीं है।” उनकी आवाज़ में सख़्ती नहीं, बल्कि समझ और अपनापन था, मानो वो मेरे दिल को ठुकराना नहीं चाहतीं, बस उसे सही दिशा देना चाहती हों।

मैंने उनकी ओर देखते हुए गहरी सांस ली और कहा, “एक बात है जो मैं हमेशा अपने अंदर दबा कर रखता आया हूं… आज मैं वो सब कह दूंगा।” मेरी आवाज़ में सच्चाई थी और दिल की धड़कनें तेज़ हो चुकी थी।

“मैंने कभी आपको अपनी बड़ी बहन की तरह नहीं देखा। ना तब, और ना अब… मैंने हमेशा आपको उसी तरह चाहा है जैसे एक लड़का किसी लड़की को चाहता है।” मैं बोलते-बोलते रुक गया, लेकिन मेरी आंखें सब कुछ कह रही थी।

“मैंने हमेशा तुमसे प्यार किया है… और ये कभी नहीं बदला,” मैंने धीरे से कहा। मेरी आवाज़ में डर भी था और उम्मीद भी, जैसे मैं उनके जवाब से अपनी पूरी दुनिया तय होने का इंतज़ार कर रहा हूं।

कुछ मिनटों तक कमरे में अजीब-सी खामोशी पसरी रही। वो बिना कुछ कहे बस नीचे ज़मीन को देखती रही, मानो अपने भीतर के विचारों से जूझ रही हो। फिर अचानक उन्होंने एक गहरी सांस ली, अपना बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई। मैं उनके बिस्तर पर बैठा रहा, जैसे मेरे पैरों ने ज़मीन पकड़ ली हो। दरवाज़ा खुला और बंद हुआ, और मैं बस उनकी जाती हुई परछाई को देखता रह गया।

इस बार उनके साथ पापा भी थे, उन्हें बैंगलोर ले जाने के लिए। मुझमें इतनी भी ताकत नहीं बची कि मैं नीचे जाकर उन्हें जाते हुए देख पाता। मैं उसी बिस्तर पर बैठा रहा, घंटे बीतते गए। दीवार पर लटकती घड़ी की सुइयां धीमी, बेरहम चाल से चल रही थी, और कमरे में सन्नाटा हर मिनट और गहरा हो रहा था।

लगभग एक घंटे बाद, मेरा मोबाइल अचानक चमका। स्क्रीन पर उभरते नाम को देखते ही मेरे अंदर जैसे कोई हलचल सी हुई। वह उनका मैसेज था।

मैंने कांपते हाथों से फोन खोला, “सॉरी,” उन्होंने लिखा था, “मुझे पता है, मैं हमेशा तुम्हारी बड़ी बहन रही हूं… और इसी वजह से मैं डरती थी। लेकिन सच ये है कि मैं भी वही महसूस करती हूं जो तुम करते हो। हमारा रिश्ता सिर्फ शब्दों या खून के रिश्ते का नहीं रहा, हमने एक-दूसरे को उस तरह महसूस किया है जैसे कोई और नहीं कर सकता। मैंने खुद को रोका क्योंकि मैं डर रही थी, लेकिन जब हम फिर मिलेंगे… मैं तुम्हारी हर चाहत, हर ख्वाहिश पूरी करने के लिए तैयार रहूंगी।”

उनके शब्दों ने मेरे भीतर की सारी खामोशी तोड़ दी, डर, चाहत, और उम्मीद एक साथ मेरे अंदर उमड़ आए।अगर अगला पार्ट चाहिए तो मेल करें

अगला भाग पढ़े:-बड़ी बहन के साथ छुप-छुप कर बदन की आग बुझाई-4

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